Sunday, 8 March 2026

कुछ साथ में

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

रेत में लिपटी, लंबी ठंड सी रात में,
इस धूप में, उन उम्मीदों की बरसात में,
अनबुझ से, जज्बात में,
तेरी चुप-चुप सी, हर बात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

जाने कब टूटे, इन सांसों के, लय,
वश किसका, जाने कब हो जाए प्रलय,
बैठा, बस उम्मीदें बांधे!
साधे, इन सांसों को साथ में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

संग गिन लेंगे, गिनती के धड़कन,
वक्त से चुन लेंगे, सीमित हैं जो कंपन,
फैलाए, राहों में दामन,
यूँ भर लेंगे रंग, हर हालात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

शायद, इन राहों में रह जाऊं पीछे,
इक डोर, भीगी जज्बातों के संग खींचे,
मैं आऊंगा, पीछे-पीछे,
मिलने तुझसे ही, उस रात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

पिरोए संग, तेरे नैनों ने जो सपने,
एकाकी से मेरे पल, लगे थे यूँ हँसने,
उसी क्षण की बात में,
भिगोएंगे, खुद को बरसात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

पिघलेंगे, बर्फ जमी एहसासों के,
आह, निकल आयेंगे, दबी सांसों से,
उभरेगी, तेरी तस्वीर,
देखूंगा तुझको ही, एकांत में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

3 comments:

  1. आपकी कविताएं हमेशा ही हृदयास्पर्शी होती हैं सर... यह कविता भी जीवन से भरी है...इतनी व्यवस्तता के बाद भी ऐसी गहरी कविताएं लिखना सामान्य बात नहीं... धन्यवाद क्योंकि इससे मुझे भी प्रेरणा मिलती है...

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