जो होती नदिया, मौन कहीं, बह जाती,
उन्मादित सी, क्यूँ बहती मैं?
अंकपाश मेरे, लिपटे पतझड़ के पात कई,
खोई उनसे, फूलों की बात कई!
कौन कहे, उनसे, बिखरे कितने आंगन,
उन्माद ही, ले उजड़े दामन,
उफनते सैलाबों में, जागे ग़म के रात कई,
बेमोल रहे, सोये जज्बात कई!
उस पर, नदियों का उत्श्रृंखल सा बहना,
यूँ विलास, विरहा पर करना,
झकझोर जाती है, टूटे वीणा के तार कई,
उभार जाती है, मन में पीर नई!
जरा रख दे, मरहम, किसी के गम पर,
दे दे किसी के, दुख में साथ,
बज उठेंगी, जर्जर वीणा में, सरगम नई,
यूँ हंस कर, उभरेंगे संवाद कई!
जो होती झौंका, मचल कहीं, बह जाती,
छू जाती, दुखती तन को मैं,
हर लेती, हर व्याधित मन के पीर कई,
फिर सुनती, मन की कूक नई!

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 29 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteअथ स्वागतम शुभ स्वागतम