कविता "जीवन कलश"

जीवन के अनुभवों पर, मेरे मन के उद्घोषित शब्दों की अभिव्यक्ति है - कविता "जीवन कलश"। यूं, जीवन की राहों में, हर पल छूटता जाता है, इक-इक लम्हा। वो फिर न मिलते हैं, कहीं दोबारा ! कभी वो ही, अपना बनाकर, विस्मित कर जाते हैं! चुनता रहता हूँ मैं, उन लम्हों को और संजो रखता हूँ यहाँ! वही लम्हा, फिर कभी सुकून संग जीने को मन करता है, तो ये, अलग ही रंग भर देती हैं, जीवन में। "वैसे, हाथों से बिखरे पल, वापस कब आते हैं! " आइए, महसूस कीजिए, आपकी ही जीवन से जुड़े, कुछ गुजरे हुए पहलुओं को। (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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Sunday, 19 October 2025

राह दिखाए रब

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आश लिए कितने, गिनता अपनी ही आहें, घिरा किन विरोधाभासों में, जाने मन क्या चाहे, कभी उमड़ते, जज्बातों के बादल, कभी, सूना सा आंचल! बंधकर, कितनी...
Saturday, 12 October 2019

नदी किनारे

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डूब कर खिलते हैं, कुछ फूल, नदी किनारे, सूख कर बिखरते हैं धूल, नदी किनारे। एक विरोधाभास, दो मनोभाव, एक निरंतर बहती नदी, दो प्रभाव, इच...
6 comments:
Saturday, 5 January 2019

जब तुम गए

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यद्यपि अलग थे तुम, पर सत्य न था ये... निरंतर मुझसे परे, दूर जाते, तुम्हारे कदम, विपरीत दिशा में, चलते-चलते, यद्यपि, तुम्हें दूर-द...
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पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा
Chennai, Tamilnadu, India
मैं, एक आम व्यक्ति, बिल्कुल आप जैसा ही। बस लगाव है भावनाओं से, एक जुड़ाव है संवेदनाओं से। महसूस करता हूँ, तो कलम चल पड़ती है और जन्म लेती है, एक नई रचना। मेरी नवीनतम रचनाओं की जानकारी हेतु, आप इस ब्लॉग को फॉलो करें। इसकी सूचना आप मेरे WhatsApp / Contact No. 9507846018 के STATUS पर भी पा सकते हैं।
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