Friday, 18 September 2026

काली चादर

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
उकेर जरा, ये काली चादर,
मुंह फेर इधर, देख तमस के बाहर,
जागी कितनी ये रात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
बातों में, कुछ ताने ही दे,
उमस भरे, सारे अफसाने कह दे,
पिघल पड़े जज्बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
नींद नहीं, तो सपने ही दे,
धड़कन को, सपनों में हंसने तो दे,
रुकी-रुकी हर बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
बिन बातों के, जीवन कैसा,
जीवंत एहसासों बिन,आंगन कैसा,
जगाए, ऐसी ही बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात।

Saturday, 8 August 2026

मैं अनभिज्ञ


कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?

यूं, लफ़्ज़ों का हिलना, शब्दों का बहना,
यूं, अश्क छलकना,व्यर्थ रहा, 
इतना कुछ कहकर भी, 
बाकि था, कितना कुछ कहना!

कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?

यूं महसूस हुआ, सदियों की कोई वर्जना,
उस ठहरे से, बादल की गर्जना, 
आ टकराई हो, मुझसे,
और, अनभिज्ञ रहा मैं कितना!

कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?

मै हतप्रभ, सुनता रहा शब्दों का झुनझुना,
व्यथा गढ़े, ‌‌शब्दोऺऺऺ की अभिव्यऺजना,
ना-समझी की, हद थी,
रहा शेष, कितना कुछ सुनना!

कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?

Monday, 27 April 2026

मौन बहाव

जो होती नदिया, मौन कहीं, बह जाती,
उन्मादित सी, क्यूँ बहती मैं?
अंकपाश मेरे, लिपटे पतझड़ के पात कई,
खोई उनसे, फूलों की बात कई!

कौन कहे, उनसे, बिखरे कितने आंगन,
उन्माद ही, ले उजड़े दामन,
उफनते सैलाबों में, जागे ग़म के रात कई,
बेमोल रहे, सोये जज्बात कई!

उस पर, नदियों का उत्श्रृंखल सा बहना,
यूँ विलास, विरहा पर करना,
झकझोर जाती है, टूटे वीणा के तार कई,
उभार जाती है, मन में पीर नई!

जरा रख दे, मरहम, किसी के गम पर,
दे दे किसी के, दुख में साथ,
बज उठेंगी, जर्जर वीणा में, सरगम नई,
यूँ हंस कर, उभरेंगे संवाद कई!

जो होती झौंका, मचल कहीं, बह जाती,
छू जाती, दुखती तन को मैं,
हर लेती, हर व्याधित मन के पीर कई,
फिर सुनती, मन की कूक नई!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 22 April 2026

अतिशयोक्ति

मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!

अनुभूत, करूं मैं जिनको,
चेतना, उन्हें कर जाती है अतिरंजित,
अभिव्यंजित, करता उनको मन,
यूँ, मनोभावों की युति,
बन जाती, इक अतिशयोक्ति!

मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!

निर्बाध, बहते रहते भाव,
ये अनुभूतियां, कब हो पाती नियंत्रित,
भीगे ही रहते, मन के दोनों तट,
छलके, नैनों से संप्रेषण,
बन ही जाती, अतिशयोक्ति!

मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!

द्वैत नहीं, वो इक अद्वैत,
बस, बांट जाती है, उन्हें अनुभूतियां,
अतिरंजित कर जाती हैं, चेतना,
यूँ, बढ़ जाते हैं संशय,
बनती जाती है, अतिशयोक्ति!

मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!

Saturday, 18 April 2026

महज स्पंदन!

महज, कोरा सा अनुभव है, 
या है, कल्पनाओं में पिरोया, कोई छुअन,
या कहीं, मूर्त होता, कोई सत्य,
या, सिर्फ इक स्पंदन!

कैसे, छिड़ते हैं खुद ये तार,
क्यूँ, उस पल, ये मन, हो उठता है, बेजार,
ये गगन, होता क्यूँ मेघाच्छादित,
क्यूँ, जगता ये स्पंदन!

स्पंदन, ज्यूँ, सहचर हैं मेरे,
यूँ, विरह, मिलन, बिछड़न, तड़पन के घेरे,
ठौर कहीं ना, पल भर पाए मन,
जागे, जब ये स्पंदन!

उजले, उन यादों के पल,
उथले-उथले, बहते, जज्बातों के हलचल,
ज्यूँ बहती, इक सरिता कलकल,
हैरां, करते ये स्पंदन!

संभालूं, किन जज्बातों कोे,
याकि, उन कल्पनाओं से, हो जाऊं रूबरू,
भले थोड़ी ही, उनसे हो गुफ्तगू,
सताए, ना ये स्पंदन!

अनुभव, ना हो महज कोरा,
छुअन, ना हो सिर्फ कल्पनाओं में पिरोया,
और, मूर्त कहीं, हो जाए, सत्य,
मधुर, लगे ये स्पंदन!

Friday, 3 April 2026

उत्सुक हूँ बेहद

उत्सुक हूँ बेहद.....

सफर के, किसी, मोड़ तक,
शायद कहीं दे जाए, कोई, महज एक दस्तक,
आए कोई, मेरे दर तक,
ठहर जाए यहीं, उमर भर तक!

उत्सुक हूँ बेहद.....

बंधनों के, नाजुक, डोर पर,
जताए कोई, पुरकाशिश हक, मेरे वजूद पर,
चले संग, इस सफर पर,
थाम ले दामन, लगें ठोकरें गर!

उत्सुक हूँ बेहद.....

उस अंजान को, दे दूँ हक,
ना हो हद, इस यकीन का, ना हो कोई शक,
मेरी इस, दहलीज तक,
रोज वो दें, महज एक दस्तक!

उत्सुक हूँ बेहद.....

जगाए, यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!

उत्सुक हूँ बेहद.....

Monday, 30 March 2026

कल्पना

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!

ऐसा लगता है, जैसे, वो बैठे हैं मुकर कर,
ओढ़े, स्मृतियों की एक चादर,
और, अपनी ही इक परिप्रेक्ष्य, में घिरकर,
दूर हैं वो, जरा, नाराज होकर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

फेहरिस्त, लंबी शिकायतों की, खोलकर,
बोलती है, कुछ भी न बोलकर,
शिकन माथे की, बयां करती हैं, उभरकर,
यकीन, कैसे करूं मैं तुम पर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

मुक्त हुई कब, कल्पनाओं में कैद होकर,
मुक्त, मैं भी विचरती, यूँ अगर,
होती बन कर हकीकत, राह में साथ गर,
निहारती, खुद को संवार कर !

कल्पनाओं से, गुजर कर......

सुनकर, उसकी बातें, हुआ मैं निरुत्तर,
विलीन थे शब्द मेरे, आह पर,
मैंनें, दुःख ही दिए, उनमें यूं रंग भरकर,
दूर वे कितने, मेरे संग होकर!

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!