मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!
अनुभूत, करूं मैं जिनको,
चेतना, उन्हें कर जाती है अतिरंजित,
अभिव्यंजित, करता उनको मन,
यूँ, मनोभावों की युति,
बन जाती, इक अतिशयोक्ति!
मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!
निर्बाध, बहते रहते भाव,
ये अनुभूतियां, कब हो पाती नियंत्रित,
भीगे ही रहते, मन के दोनों तट,
छलके, नैनों से संप्रेषण,
बन ही जाती, अतिशयोक्ति!
मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!
द्वैत नहीं, वो इक अद्वैत,
बस, बांट जाती है, उन्हें अनुभूतियां,
अतिरंजित कर जाती हैं, चेतना,
यूँ, बढ़ जाते हैं संशय,
बनती जाती है, अतिशयोक्ति!
मन: उद्बोधन, यूँ हो जाते अभिव्यंजित!
अनुभूतियां, अतिरंजित!






