Tuesday, 24 March 2026

गुजरते हुए लम्हे

वो जो, गुजर रहा था लम्हा,
वो जो कुछ भी घटित हो रहा था वहां,
वही कह गया, ये इक दास्तां,
क्या मुझसे था वास्ता?

वो जो, गुजर रही थी पवन,
वो जो, गंध-विहीन हो रही थी उपवन,
वहीं, शून्य को ताकते नयन,
क्या था, ये कथन?

शायद, सब हो रहे थे तन्हा,
ले चला था सब, वो जाता सा लम्हा,
उकेर कर, वो कदमों के निशाँ,
कुछ रख गया वहां?

वो जो, कहीं मोड़ ले रुख,
वो जो, बता जाए, क्या था वो रुत?
बने हैं कैसे, इतने सारे बुत!
कैसा था, वो दुःख?

वो जो, दे दे कोई विवरण,
वो जो, छूकर, यूँ गुजर जाए पवन,
समझ पाए, ये गमगीन मन,
क्या कुछ था कारण?

वो जो, गुजर रहा ये लम्हा,
वो जो, पुनः घटित हो रहा ये यहां,
उकेरेगी मन पर कोई निशाँ,
कल वे, बनेंगी दास्तां!

Tuesday, 17 March 2026

प्रकृति से दूर

कल-कल, निश्छल, सी ये नदियाँ,
छल-छल, अविरल, बहती जाती सदियाँ,
निरंतर, इक प्रवाह यहाँ,
पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!

आंखें मींचें, रह जाता हूँ, खोया सा,
मध्य कहीं, व्यस्तताओं में, बीतता है दिन,
सांझ ढले, व्याप जाती ये रात!

मुलूर- मुलूर, सुबहो, झांकती हमें,
कुछ उदास सी, ताकती शाम की किरणें,
खामोशी में, सुला देती ये रात!

वो प्रस्फुटन, फिर, ले आती घुटन,
अनुत्तरित ही, रह जाते, उनके सारे प्रश्न,
संवादविहीन, कट जाती रात!

खत्म कहां, प्रश्नों का, सिलसिला,
इक मैं ही, प्रथम किरणों से, ना मिला,
प्रश्नोत्तर, भुला जाती ये रात!

कितनी पास, रही मेरे, ये प्रकृति,
मुझको छूकर, गुजरती रही, संस्रीति,
असंवेदन, बनाती रही रात!

पल-पल, इक, हलचल सी यहाँ,
हर-पल, हो विकल, बुलाती रही सदियाँ,
युग करती इंतजार यहाँ,
पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!

Sunday, 8 March 2026

कुछ साथ में

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

रेत में लिपटी, लंबी ठंड सी रात में,
इस धूप में, उन उम्मीदों की बरसात में,
अनबुझ से, जज्बात में,
तेरी चुप-चुप सी, हर बात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

जाने कब टूटे, इन सांसों के, लय,
वश किसका, जाने कब हो जाए प्रलय,
बैठा, बस उम्मीदें बांधे!
साधे, इन सांसों को साथ में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

संग गिन लेंगे, गिनती के धड़कन,
वक्त से चुन लेंगे, सीमित हैं जो कंपन,
फैलाए, राहों में दामन,
यूँ भर लेंगे रंग, हर हालात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

शायद, इन राहों में रह जाऊं पीछे,
इक डोर, भीगी जज्बातों के संग खींचे,
मैं आऊंगा, पीछे-पीछे,
मिलने तुझसे ही, उस रात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

पिरोए संग, तेरे नैनों ने जो सपने,
एकाकी से मेरे पल, लगे थे यूँ हँसने,
उसी क्षण की बात में,
भिगोएंगे, खुद को बरसात में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

पिघलेंगे, बर्फ जमी एहसासों के,
आह, निकल आयेंगे, दबी सांसों से,
उभरेगी, तेरी तस्वीर,
देखूंगा तुझको ही, एकांत में!

कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

Sunday, 1 March 2026

निःसंग

मन निःसंग, दौड़े, दिशाहीन किस ओर,
कोई ठौर कहां, उस छोड़!

आ, दो पल, बैठ जरा संग मेरे,
कह दे, अंतः क्या तेरे,
कर, दो बात,
मैं अज्ञानी, इक निस्पृह प्राणी,
तू, सस्पृह रातों की रानी,
ये, स्याह रात,
भटका ले जाए ना, कहीं और!

मन निःसंग, दौड़े, दिशाहीन किस ओर,
कोई ठौर कहां, उस छोड़!

फैले, इच्छाओं के, विस्तृत वन,
घेरे, मायाजाल सघन,
वियावान रन,
इक्षाओं लिप्साओं में, तू लिप्त,
हो कहां, अभिलाषा तृप्त,
अधूरी ये बात,
बहला ले जाए ना, कहीं और!

मन निःसंग, दौड़े, दिशाहीन किस ओर,
कोई ठौर कहां, उस छोड़!

वो, अंतहीन, मायावी विस्तार,
लघु, ये मेरा संसार,
कितना बेजार,
करता हर क्षण, तेरा इंतजार,
यूँ भाए ना, एकाकीपन,
बेगानी ये बात,
फुसला ले जाए ना, कहीं और!

मन निःसंग, दौड़े, दिशाहीन किस ओर,
कोई ठौर कहां, उस छोड़!

Friday, 27 February 2026

गिला

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

झांकता, कभी खिड़कियों से,
जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,
शाख की, रंगीनियों से,
पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,
झूलती, उनकी पत्तियों से,
कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!
पता ही ना चला....

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

ठहरा रहा, ये पथिक राह में,
खोया ही रहा, कामनाओं की प्रवाह में,
उस शाम की, चाह में,
समेटे अंतःघुटन को, अपनी आह में,
पास थे, पर दूर कितने,
कब वो संग आए, कब रूठकर वो दूर हो चले!
पता ही ना चला....

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

Sunday, 15 February 2026

खोता सुध

सुध, खोता जाता हूँ....

हैरान कर देते हो, इस बुत को,
यूँ, पल पल, बुनते हो, मुझमें खुद को,
उलझता सा, जाता हूँ,
शर्माता हूँ,
फिर, खुद पर इतराता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

समझ सकूं ना, कैसी ये भाषा!
चंचल उन नैनों की, सांकेतिक परिभाषा,
इंगित, क्या अभिलाषा!
कैसी आशा!
जागृत, खुद में पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

फुर्र हो चले, सुधि के वो क्षण,
हो चले अनियंत्रित, हृदय के ये धड़कन,
अंतः, गहराता इक सावन,
लहराता घन,
बरसता, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

इक बुत ही था, अब जिंदा हूँ,
अंजाने, धड़कन और साँसों में बंधा हूँ,
लिपटा, उनकी ही धागों में,
एहसासों में,
सिमटा, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

Friday, 6 February 2026

सब्र

क्यूँ हो जाती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
क्यूँ  सांझ ढले, होती है ये किरणें निस्तेज,
क्यूँ होता है, नज़दीकियों में, दूरियों सा एहसास,
क्यूँ खुद ना मिलूँ, तब, कभी मैं अपने पास,
क्यूँ, इन हालातों में, रखूँ कोई आश।

कैसा ये विचलन, कैसी उलझी ये पेचीदगियां,
इन हालातों में, बढ़ाऊं कैसे नजदीकियाँ!
बदलते से पलों के दरमियां, किनसे रखूँ दूरियाँ!
हर ओर उठता धुआं, ओझल होता आसमाँ,
समझाये कौन, मुझको ये बारीकियां!

बस, एक सब्र है, शायद वो भी, न हो हताश,
खुद भी कहाँ, इस पल, मैं अपने पास,
कहीं उन्हीं दूरियों में गुम, कुछ ढूंढता बदहवास,
पाने को आसमाँ, खोने को कुछ न पास,
संभल मन, धर धीर, हो न यूँ निराश!

बन एक सहेली, संग-संग खेले आश निराश,
ज्यूँ एक पहेली, समझ न आये खास,
लुभावन होता, कभी ये सांझ सा ढलता आंगन,
स्मृतियों के क्षण, पुलकित होता ये मन, 
तभी हो प्यारा, वही तन्हा सा घन।

यूँ ही होती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
यूँ ही सांझ ढले, होती ये किरणें निस्तेज,
यूँ फिर होगा, दूरियों में नज़दीकियों का एहसास,
यूँ खुद से मिल लेना, तन्हाईयों में पास,
क्यूँ, इन हालातों में, तू खोये आश।