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Tuesday, 24 March 2026

गुजरते हुए लम्हे

वो जो, गुजर रहा था लम्हा,
वो जो कुछ भी घटित हो रहा था वहां,
वही कह गया, ये इक दास्तां,
क्या मुझसे था वास्ता?

वो जो, गुजर रही थी पवन,
वो जो, गंध-विहीन हो रही थी उपवन,
वहीं, शून्य को ताकते नयन,
क्या था, ये कथन?

शायद, सब हो रहे थे तन्हा,
ले चला था सब, वो जाता सा लम्हा,
उकेर कर, वो कदमों के निशाँ,
कुछ रख गया वहां?

वो जो, कहीं मोड़ ले रुख,
वो जो, बता जाए, क्या था वो रुत?
बने हैं कैसे, इतने सारे बुत!
कैसा था, वो दुःख?

वो जो, दे दे कोई विवरण,
वो जो, छूकर, यूँ गुजर जाए पवन,
समझ पाए, ये गमगीन मन,
क्या कुछ था कारण?

वो जो, गुजर रहा ये लम्हा,
वो जो, पुनः घटित हो रहा ये यहां,
उकेरेगी मन पर कोई निशाँ,
कल वे, बनेंगी दास्तां!

Tuesday, 22 March 2016

रुत मिलने की आई (होली विशेष)

रुत मिलने की आई आँचल को लहराने दो।

बरसी है आग इन घटाओं से आज,
छलके हैं जाम इन बूदों के साथ,
भीगा भीगा सा तन सुलग रहा क्युँ आज,
बहका सा मन होली में आँचल को भीग जाने दो।

रुत मिलने की आई जुल्फों को बिखर जाने दो।

मस्त हवाएँ गुजर रही हैं तुमको छूकर,
बिखरे है ये लट चेहरे पर झूमकर,
आँखों में उतरा है जाम आज छलक कर,
उलझा हूँ मैं जुल्फो में जाम नजरों से पी लेने दो।

रुत मिलने की आई आज मुझको बहक जाने दो।