Saturday, 31 December 2016

गतवर्ष-नववर्ष

बीत चला है अब गतवर्ष,
कितने ही मिश्रित अनुभव देकर,
आश-निराश के पल कितने ही,
ले चला वो दामन में अपनी समेटकर।

जा रहा वो हमसे दूर कही,
फिर ना वापस आने को,
याद दिलाएगा हरपल अपनी वो,
बीते लम्हों की भीनी सी सौगातें देकर।

रुनझुन करती आई थी वो,
पहलू में हर जीवन के संग खेली वो,
कहीं रंगोली तो कहीं ठिठोली,
कितने ही रंगों संग हो ली वो हँसकर।

सपने कितने ही टूटते देखे उसने,
अपनों का संग कितने ही छूटते देखे उसने,
पर निराश हुआ ना पलभर को भी वो,
नवजीवन ले झूमा फिर वो आशा की थुन पर।

अब गले लगाकर नववर्ष का,
सहर्ष स्वागत कर रहा है गतवर्ष,
विदाई की वेला में झूम रहा वो,
कितने ही नव अरमानों को जन्म देकर।

Friday, 30 December 2016

मधुक्षण ले फिर आओ तुम

प्रिये, तुम फिर से आओ मधु-क्षण लेकर इस पल में....
है सूना सा मेरे हृदय का आँगन ,
है आतुर यह चिन्हित करने को तेरा आगमन...
यह अनहद अनवरत प्रतीक्षा कब तक?
लघु जीवन यह, लंबा ....इंतजार...!
मधुक्षण ले तुम आ जाओं फिर एक बार !

क्युँ मुझको है एक हठीला सा विश्वास?
तुम्हारा निश्चय ही आने का ,
बेबस मन है क्युँ हर पल अकुलाहट में,
चू पड़ते हैं क्युँ इन आँख से आँसू .........
क्युँ तुमसे है मुझको अनहद प्यार....?
मधुक्षण ले तुम आ जाओं फिर एक बार !

तुम घन सी लहराओं एक बार !
आतुर हैं मेरी भावनाओं के बादल ..
माधूर्य बरसाने को तुम पर,
समर्पित हूँ मैं पूर्णतः तुमको साधिकार !
मधुक्षण ले तुम आ जाओं फिर एक बार !

हर आहट पर होता है मुझको ....
बस तुम्हारे आने का भ्रम,
खुली ये खिड़की, खुला ये आंगन,
और दो आँखें हैं नम...
बस शेष इतना ही  आभार.................!!!
मधुक्षण ले तुम आ जाओं फिर एक बार !

यदि कहूँ मैं तुम हो ...
मेरे मधुक्षण की माधूर्य मधुमिता,
अतिरेक न होगा ये तनिक भी, हो गर तुमको विश्वास,
तुम चाहो तो आकर ले लेना....
मेरी इन सिक्त बाहों का हार.......
मधुक्षण ले तुम आ जाओं फिर एक बार !

Thursday, 29 December 2016

आहत संवेदना

घड़ी सांझ की सन्निकट है खड़ी,
लग रहा यूँ हर शै यहाँ बिखरी हुई है पड़ी,
अपना हम जिसे अबतक कहते रहे,
दूर हाथों से अब अपनी ही वो परछाई हुई।

विरक्त सा अब हो चला है मन,
पराया सा लग रहा अब अपना ही ये तन,
बुझ चुकी वो प्यास जो थी कभी जगी,
अपूरित सी कुछ आस मन में ही रही दबी।

थक चुकी हैं साँसे, आँखें हैं भरी,
धूमिल सी हो चली हैं यादों की वो गली,
राहें वो हमें मुड़कर पुकारती नही,
गुमनामियों में ही कहीं पहचान है खोई हुई।

संवेदनाएँ मन की तड़पती ही रही,
मनोभाव हृदय के मेरे, पढ ना सका कोई,
सिसकता रहा रूह ताउम्र युँ ही,
हृदय की दीवारों से अब गूँज सी है उठ रही।

बीत चुका भले ही वक्त अब वो,
पर टीस उसकी, आज भी डंक सी चुभ रही,
अब ढह चुके हैं जब सारे संबल,
काश ! ये व्यथा हमें अब वापस ना पुकारती !

शिकायतें ये मेरी आधार विहीन नहीं,
सच तो है कि सांझ की ये घड़ी भी हमें लुभाती,
गर संवेदनाएँ मेरी भावों को मिल जाती,
तब ये सांझ की घड़ी भी हमें भावविभोर कर जाती!

Friday, 16 December 2016

दूर वहाँ

न है कोई, इक मेरे सिवा उस भूल-भुलैया के उस पार..

हाथों से जैसे छिटकी थी वो रश्मि-किरण सी,
ज्युँ दूर गगन में वापस जाता हो पाखी,
दूर होता रहा मैं उससे जितना,
उसकी यादें सिमटती रही उतनी ही पास भी.....

उस अंतिम छोर में अब कोई प्रतीक्षारत नहीं,
ना ही इस मोड़ में भी है कोई,
मैं रहा सदैव एकाकी, बूढ़ा बरगद, सिमटती नदी,
विलीन हुए सब सांध्य कोलाहल,
उड़ गए सुदूर जैसे सारे प्रवासी पाखी।

पिघली है बर्फ़ फिर इन वादियों में,
या फिर दिल में जगी है कोई आस पुरानी,
गोधूलि बेला,सिंदूरी आकाश, तुलसी तले जलता दीप,
वही अनवरत झुर्रियों से उभरती हुई,
तेरी मेरी जीवन की अनन्त अधुरी सी कहानी।

सपाट से हो चले वो तमाम स्मृति कपाट
अपने आप जब हो चलें हैं बंद,
तब अंतरपट खोले वो करती हो इंतजार
उस नव दिगंत असीम के द्वार,
शायद चलती रहे निरंतर यह असमाप्त अन्तर्यात्रा !

पर कोई तो नहीं मेरे लिए उस भूल-भुलैया के उस पार..

Monday, 5 December 2016

प्रत्याशा

बस है उसे इक प्रत्युत्तर की आशा,
लेकिन गहराती रही हर पल उस मन में इक निराशा,
हताश है अब वो मन और हतप्रभ जरा सा...

सुबहो-शाम आती है जब कोई आवाज,
प्रतिध्वनि जब कोई, मन पर दे जाती है दस्तक,
जाग पड़ती है उस मन की सोई सी प्रत्याशा,
चौंक उठता है वो, मन मे लिए इक झूठी सी आशा...

उसे बहुत देर तक, दी थी उसने आवाज,
सूखे थे कंठ हलक तक, रहा पुकारता वो अंत तक,
भौचक्की आँखों से अब निहारता आकाश,
लेकिन छूट चुका है धीरज, टूट चुकी है अब आशा.....

पहुँच ना सकी वो ध्वनी, उन कानों तक,
या थिरकते लब उसके शायद कर न सकी थी बातें,
या रह गई थी अनसुनी उसकी शिकायतें,
लेकिन है उस मन में, अब भी इक अटूट भरोसा....

बस है उसे अब भी, इक प्रत्युत्तर की आशा,
भले गहराती रहे कितनी उस मन में पलती निराशा,
बस है वो मन हताश थोड़ा और हतप्रभ जरा सा...

Sunday, 4 December 2016

क्या महज कल्पना?

क्युँ मैं हर पल सोचता हूँ बस तुमको ही,
यह जानकर भी कि तुम महज इक कल्पना नहीं,
इक स्वर, इक रूप साकार सी हो तुम,
जागृत सपनों में रची बसी मूर्त स्वरूप हो तुम,
विचरती हो कहीं न कहीं इन्ही हवाओं में,
गाती हो धुन कोई इन्ही फिजाओं में,
फिर भी, न जाने क्यूँ ढूंढता हूँ मैं तुम्हें ख्यालों में!

क्यूँ ये मन सोचता है हर पल तुझको ही सवालों में?

लगता है कभी, जैसे बिखरे से होंगे बाल तेरे,
रख न पाती होगी खुद अपना ख्याल तुम,
गुम सी हो चुकी हो, उलझनों में जिंदगी की कहीं,
पर तुम परेशानियाँ अपनी बयाँ करती नही,
संभालकर दामन के काटें रख रही हो सहेजकर,
पर...! क्यूँ मैं करता हूँ हर पल तेरी फिकर?

क्यूँ! बस तुझको ही, ये मन सोचता है हर पल इधर?

रब से मैं मांग लेता हूँ, बस तेरी ही खैरो-खबर,
दुआएँ तुझको मिले, नजरें तू फेरे जिधर,
बिखरी हुई तेरी जिन्दगी, बस पल में यूँ ही जाए सँवर,
मिल जाए तुझको हर परेशानियों के हल,
सँवरती ही रहो, जब भी ख्यालों में तुम करो सफर,
फिर सोचता हूँ मैं, अधिकार क्या है मेरा तुम पर?

क्यूँ! ये मन तुझको सोचकर, बस करता है तेरी फिकर?

खामोशियों के छंद

स्तब्ध निशान्त सा है ये आकाश,
स्निग्ध खामोश सी है ये समुन्दर की लहरें,
गुमसुम सी मंद बह रही ये हवाएँ,
न जाने चाह कौन सी मन में दबाए,
तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो....

कहना ये मुझसे चाहती हैं क्या,
निःस्तब्ध सी ये मन में सोचती है क्या,
खोई है कहाँ इनकी गतिशीलता,
यहाँ पहले न थी कभी इतनी खामोशियाँ,
तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो....

शायद बात कोई इनके मन में है दबी,
या ठेस मुझसे ही इसकी मन को है लगी,
चुपचाप अब वो क्युँ रहने लगी,
नासमझ मैं ही हूँ, ना मैं उसकी मन को पढ़ सका,
तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो....

कुछ वजह! मैं भी जान पाता अगर,
मन में है उसके क्या? ये लग जाती मुझको खबर,
मनाने को बार-बार जाता मैं उसकी डगर,
पर गहरा है राज ये, मिन्नतें करूँ तो मैं किधर,
तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो....

ऐ आकाश! तू बादलों की चादर बिछा,
ऐ लहरें! तू आ मचल मेरी पाँवों को दे भीगा,
ऐ हवाएँ! तू राग कोई मुझको सुना,
मन की गिरह खोल दे अनकही मुझको सुना,
अब तो कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो....