My Proud: Daughter's Contribution

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Monday, 29 February 2016

उदास शाम

ढ़ल रही अब शाम, आज कांतिहीन उदास,
भूला सा भ्रमित मैं, आज खुद अपने पास!

छिटक गई है डोर जैसे उस चिर विश्वास की,
टूट गई है साँस ज्यूँ उर के हास विलास की!

धुंध में सहमी सी है अाज शाम उदास क्लांत,
कितना असह्य अब ये एकाकीपन का एकांत!

घुटन सी इन साँसों में, मन कितना अशांत,
अवरोध सा ऱक्त प्रवाह में. हृदय आक्रान्त ।

हौले हौले उतर रहा, निर्मम तम का अम्बार,
अपलक खुले नैनों में, छुप रहा व्यथा अपार।

सौ-सौ संशय मन में, लेकिन शाम है उदास,
टूट है वो धागा जिसमें मेरी आस्था मेरी आस|

Sunday, 28 February 2016

किस तारे में?

अम्बर के धुंधले गहरे अंधियारे में,
देखती हैं आँखे उस सुंदर तारे में,
बिछड़ा मुझसे जो इस जीवन में,
मिट चुके हैं स्वर जिसके शून्य में,
खो गई जिसकी निशानी धूलि में।

गाता है अब वो पार उस अंबर से,
स्वर जिसके मिटे नहीं इस मन से,
हृदय कंपित अब भी उस स्वर से,
धूल कण सा उड़ता वो मानस में,
स्वर गुम हुई है जाने किस तारे में।

था इस सूने जीवन का आधार वो,
इक पल में छूटा कैसे हाथों से वो,
कहते हैं सब  रहता अंबर पार वो,
कभी दिखता है किसी तारे में वो,
तलाशता हूँ अंबर का मैं तारा वो।

लाखों तारे टकते ऱोज इस अंबर मे,
धूलकण बन वो जाने किस तारे में,
संगीत गुमशुम जाने किस शून्य में,
नीर नीर सी छलकी इन  आँखों में,
जाने रहता है वो अब किस तारे में।

पक रहा मानव

जीवन की भट्ठी में पक रहा मानव।

न जाने किस स्वर नगरी में मानव,
हैं बज रहा यूँ ज्यूँ तेज घुँघरू की रव,
कुछ राग अति तीव्र, कुछ राग अभिनव।

न जाने किन पदचिन्हों पर अग्रसर,
पल पल कितने ही मिश्रित अनुभव,
संग्रहित कर रहा इन राहों पर मानव।

कुछ अकथनीय और कुछ असंभव,
कुछ खट्टे मीठे और कुछ कटु अनुभव,
क्या जीवन इस बिन हो सकता संभव?

जीवन की भट्ठी में पक रहा मानव।

होली तुम संग

प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से,

रंग जाऊंगा जीवन तेरा, खुशियों की रंगों से,
सूखेगी न चुनरी तेरी, सपनों की इन रंगों से,
चाहतें भर दूंगा जीवन मैं, अपने ही रंगों से।

प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से।

जनमों तक ना छूटेगी, ऐसा रंग लगा जाऊंगा,
तार हृदय के रंग जाएंगे, दामन में भर जाऊंगा,
आँखें खुली रह जाएंगी, सपने ऐसे सजाऊंगा।

तेरे सपनों की रंगों से, जीवन की फाग खेलूंगा।
प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से।

Saturday, 27 February 2016

तुम ही तुम हो नजरों मे

नजरों का धोखा नहीं, मेरी हकीकत हो तुम।

तुम ही तुम हो नजरों मे,
साँसों में हो तुम धड़कन में,
चांदनी सी तुम आओ जीवन में।

चाँदनी सी रौशन हो, मेरी हकीकत हो तुम।

तरसी है ये मन की जमीं,
मैं हूँ कही और दिल है कहीं,
आओ तुम सिमट जाऊँ तुम मे कहीं।

दूर तुम मुझसे नहीं, मेरी हकीकत हो तुम।

जनमों से तुम आँखों मे हो,
अब कहीं तुम मुझको मिले हो,
जीवन की राहों मे अब बस तुम ही हो।

जनमों की आरजू हो, मेरी हकीकत हो तुम।

इंतजार सदियों का

इंतजार सदियों का, जानम इस जनम भी रहा!

तुम हर जनम मिले हर जनम दूर रहे,
जनम जनम के है दिलवर ये सिलसिले,
अबकी ये शिकवा रहा तुम अजनवी से लगे।

इंतजार सदियों का, जानम इस जनम भी रहा!

तुमसे ही रिश्ता मेरा जनम जनम का रहा,
तुझको फिकर ना मेरी जनमो जनम से रहा,
अबकी जनम तुमको मुझसे शिकायत है क्या?

इंतजार सदियों का, जानम इस जनम भी रहा!

दूर से मैं तुमको जनमों से देखा करूँ,
तुझको खबर ना मगर तेरा इंतजार करूँ,
अबकी तू ले ले खबर ना मैं शिकायत करूँ।

इंतजार सदियों का, जानम इस जनम भी रहा!

Friday, 26 February 2016

मै रुक जाता!

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

प्रिये, तुम मेरी आस, तुम जन्मों की प्यास,
प्यास बुझाने जन्मों की तेरी पनघट ही मैं आता,
मैं राही तेरी राहों का, और कहीं मैं क्युँ जाता,
राह देखती तुम भी अगर, मैं भी तेरा हो जाता।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

तुमसे ही चलती ये सांसे, तुमपर ही विश्वास,
सासें जीवन की लेने तेरी बगिया ही मैं आता,
टूटे हृदय के इस मृदंग को तेरे लिए बजाता,
गीत मेरे तुम भी सुन लेती, तो मैं तेरा हो जाता।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

कह देती तुम गर, बात कभी अपने मन की,
उम्मीद लिए यही मन में, मैं तेरी राह खडृ़ा था,
दामन उम्मीद का मैंने, कहाँ कभी छोड़ा था,
यूँ ही चल पड़ा था मैं, तुमने भी कब रोका था।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

मंजिलें और हैं!

अवकाश नौकरी से मिली, जिन्दगी से नहीं,
जिन्दगी तो अब शुरू, थके मेरे कदम नहीं।

अभी थका नहीं हूँ मैं, उमर अभी ढ़ली नहीं,
बढ़ती हुई दीवानगी, उम्र की अभी शुरू हुई।

थक जाते हैं वो, जिनमें चाह जीने की नहीं,
रुक जाते हैं वो कदम, लड़खड़ाते जो नहीं।

जीवन की मुश्किलों से, जो कभी लड़ा नहीं,
थक गया वो शख्स, जो राह टेढ़ी चढ़ा नहीं।

थकते नहीं वे कदम, हिम्मत जिनके पास है,
मंजिलों पे पहुचोगे तुम, हौसला गर साथ है।

नसें अभी है तनीं हुई, वानगी अभी शुरू हुई,
सपने अधूरे जो मेरे, बनेगी वो हकीकत मेरी।

तकदीर

तकदीर! 
खेल क्या से क्या दिखाती है तक्दीर ये,
रहती है उम्र भर साथ साथ तक्दीर ये,
छल आप ही से कर जाती है तक्दीर ये।

बेपनाह चाहते इस तकदीर को हम और आप,
उम्र भर हाथों की लकीरों मे ये साथ साथ, 
लेकिन, करवटें बदल सो जाती है ये चुपचाप।

हवाओं की भी अजब सियासते हैं यहाँ,
तकदीर की बुझी राख को भड़का देती यहाँ,
कही चमकते तकदीर को बुझा देती ये हवा।

कुछ इस तरह तकदीर को अपनाया है मैंने,
पेशानी की लकीरों मे इसको बिठाया है मैंने,
जो तकदीर में नहीं, उसे भी बेपनाह चाहा है मैंने..!

Thursday, 25 February 2016

तुुम मैं होती, मैं तुम होता

कभी सोचता हूँ!
मैं मैं न होता, तेरा आईना होता!
तो क्या क्या होता इस मन में?
क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में?

तुम देखती मुझमें अक्श अपना,
हर पल होती समीक्षा जीवन की मेरी,
तेरे आँसूँ बहते मेरी इन आँखों से,
तुम हँसती संग मैं भी हँस लेता,
रूप तेरा देखकर कुछ निखर मैं भी जाता,
मेरा साँवला रंग थोड़ा गोरा हो जाता।

कभी सोचता हूँ!
तुम तुम न होती, मेरी प्रतीक्षा होती!
तो क्या क्या घटता उस पल में?
क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में?

द्वार खड़ी तुम देखती राह मेरी,
मैं दूर खड़ा दैेखता मुस्काता,
इन्तजार भरे उन पलों की दास्ताँ,
तेरी बोली में सुनता जाता,
खुश करने को तुम्हें वापस जल्दी आता,
मैं पल पल इंतजार के तौलता।

कभी सोचता हूँ! तुुम मैं होती, मैं तुम होता....

एक बार जो तुम कह देती

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

प्रिये, तुम मेरी आस, तुम जन्मों की प्यास,
प्यास बुझाने जन्मों की तेरी पनघट ही मैं आता,
मैं राही तेरी राहों का, और कहीं मैं क्युँ जाता,
राह देखती तुम भी अगर, मैं भी तेरा हो जाता।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

तुमसे ही चलती ये सांसे, तुमपर ही विश्वास,
सासें जीवन की लेने तेरी बगिया ही मैं आता,
टूटे हृदय के इस मृदंग को तेरे लिए बजाता,
गीत मेरे तुम भी सुन लेती, तो मैं तेरा हो जाता।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

कह देती तुम गर, बात कभी अपने मन की,
उम्मीद लिए यही मन में, मैं तेरी राह खडृ़ा था,
दामन उम्मीद का मैंने, कहाँ कभी छोड़ा था,
यूँ ही चल पड़ा था मैं, तुमने भी कब रोका था।

प्रिये, एक बार जो तुम कह देती, तो मैं रुक जाता!

अनुभव मीठे हो जाते!

अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते।
राह सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते।

उबड़ खाबर इन रास्तों पर,
दूभर सा लगता जीवन का सफर,
पीठ अकड़ सी जाती यहाँ,
टूट जाते है अच्छे-अच्छों के कमर।

सफर सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते।
अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते।

टेढे मेढे रास्ते ये जीवन के,
अनुभव कुछ खट्टे मीठे मिलेजुले से,
तीते लगते कुछ फल बेरी के,
दाँत कटक जाते हैं अच्छे-अच्छों के।

अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते।
सफर सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते।

गीत वही तुम दोहराओ ना!

मन मेरा मुखरित कर जाती, संगीत नई तुम जब गाती।

मन मेरा आज विकल गीत कोई तुम गाती,
गीत वही मैं सुन लेता जो तुम मन से गाती,
राग मुखर मैं भी करता जो तुम संग दुहराती,
गीत मधुर मैं गा पाता जो तुम संग संग गाती।

मन मेरा पुलकित हो जाता, आज संगीत कोई तुम गाती।

मेरे जीवन की वीणा है अब हाथों मे तेरे,
कितने ही मधु संगीत संग संग हमने हैं छेड़े,
तुम गाती जो संगीत मन खिल उठते मेरे,
आज कोई गीत नई, संग दोहराओ तुम मेरे।

मन मेरा पुलकित कर जाओ, गीत कोई तुम छेड़ो ना।

जीवन, मरण, कुछ दोनों के ही हैं हम साथी,
इस वीणा की संगीत अधूरी गीत कोई तुम गाती,
आरम्भ तुम्ही से जीवन का अंत तुम्ही कर जाती,
उदास पलों मे जीवन के गीत वही तुम दोहराती।

जीवन को तुम मुखरित कर दो, संगीत मेरे संग छेड़ो ना।

बूँद एक स्पर्श कर गई

बूँद एक स्पर्श कर गई,
रूह के अन्त:स्थ को छू गई,
स्निग्ध मन के तार छेड़ गई,
इक रेशमी एहसास दे गई।

बूँद वो नन्ही सी कितनी,
सुकोमल पंखुड़ी सी जितनी,
क्षण भर की ही उम्र उसकी,
इच्छाएँ भरी मन में कितनी।

टूट टूट बिखरती धरा पर,
बूँद बूँद आह्लादित होती पर,
कलियों संग बूँद रही निखर,
खुले तृण के केश हो प्रखर।

बूँद बूँद मिल बनती सरिता,
अस्तित्व विलीन कर खुश होती,
मिट जाती प्रकृति प्रेम में वो,
बूँद बूँद अब लब्जों की कविता।

Wednesday, 24 February 2016

जीवन कलश.....विशेष कामना


(साथियों, "जीवन कलश" के इस BLOG पर यह मेरी 300 वीं रचना है। इसे सफल बनाने और मुझे प्रोत्साहित करते रहे के लिए अनेकों धन्यवाद)

आपका आशीष मिला ............💦💕💕

आपका प्रेरणाशीष शिरोधार्य,
प्रशंसा पाता रहूँ करता रहूँ यह कार्य,
योग्य खुद को बनाऊँ, रहूँ आपको स्वीकार्य।

कृपा सरस्वती की बरसती रहे,
आपके घरों में भी सरस्वती हँसती रहें,
प्रगति के उच्च शिखरों मे आप नित चढ़ते रहे।

आपका जीवन समुज्जवल हो,
धन धान्य सुख से जीवन कलश पूर्ण हो,
सफलता की नई सीढ़ियाँ आपको मिलती रहे।

मैं युँ ही सांसों पर्यन्त लिखता रहूँ,
मेरी रचनाएँ जीवन की कलश बन निखरे,
मार्गदर्शन करें ये सबका, मेरा जीवन सफल करे।

मैं सीधी राह का राही

राह मुड़ती भी है कहीं, मुझको ये पता न था,
तंग राहों होकर ये दिल, आज तक गुजरा न था,
चाल कैसी चल रहे दोस्त, मुझको ये पता न था,
मैं सीधी राह का राही, ठोंकरों का मुझे गुमाँ न था।

एक साजिश पल रही थी, दोस्तो के दिल में कही,
दोस्त नायाब मिलते रहे, जो दुश्मनों से कम नही,
शह पे शह खाते रहे, दोस्तों की मेहरबानी से ही,
मैं सीधी राह का राही, पर दोस्तों पे अब यकीं नहीं।

टेढ़े मेढ़े इन रास्तों से, जिन्दगानी मेरी गुजरती रही,
दोस्तों से जख्म खाए, दुश्मनी किसी से की नहीं,
चाल मेरी एक सी, नफरत दिल में कभी पली नहीं,
मैं सीधी राह का राही, जीवन की मुल्यों पर मुझे यकीं।

वजूद आपका

शायद! इक ख्वाब बन के रहते हो तुम मुझमें ही कहीं।

तुम मुझमें ही खिलती हो इक फूल बनकर कहीं,
वजूद तेरा कहीं और है मुझको पता नहीं,
साया मेरा दिखने लगा है कुछ आप सा ही।

शायद! वो वजूद है आपका जो ढ़ल रहा मुझमें ही कहीं।

तेरा अक्श अब्र सा पिघल रहा मुझमें ही कहीं,
हर शैं खुशबु-ए-हिजाब मे डूबी है आपके ही,
रंगत मेरी दिखने लगी है कुछ आप सी ही।

शायद! आपकी खुश्बु गुजर रही है मुझमें ही कहीं।

खोह ये अजीब सी

चले जा रहे हैं हम, न जाने किस खोह में,
बढी़ जा रही जिन्दगी, न जाने किस खोज में,
है ये यात्रा अनंत सी, न जाने किस ओर में।

मंजिलो की खबर नहीं, न रास्तों का पता,
ये कौन सी मुकाम पर, जिन्दगी है क्या पता,
यात्री सभी अंजान से, न दोस्तों का है पता।

खोह ये अजीब सी, रास्ते कठिन दुर्गम यहाँ,
चल रहें हैं सब मगर, इक बोझ लिए सर पे यहाँ,
पाँव जले छाले पड़े, पर रुकती नही ये कारवाँ।

एक पल जो साथ थे, साथ हैं वो अब कहाँ,
एक एक कर दोस्तों का, अब साथ छूटता यहाँ,
सांसों की डोर खींचता, न जाने कौन कब कहाँ।

दिशा है ये कौन सी, जाना हमें किस दिशा,
भविष्य की खबर नहीं, गंतव्य का नहीं पता,
असंख्य प्रश्न है मगर, जवाब का नहीं पता।

कण मात्र है तू व्योम का, इतने न तू सवाल कर,
तू राह पकड़ एक चल, उस शक्ति पे तू विश्वास कर,
हम सब फसे इस खोह में, चलना हमें इसी डगर।

मुक्ति मिलेगी खोह से, तू चलता रहा अगर,
ईशारे उस पराशक्ति के, तू समझता रहा अगर,
खिलौने उस हाथ के, जाना है टूट के बिखर।

Tuesday, 23 February 2016

यादों मे ढ़ल रही शाम

रुत शाम की आज फिर से घिर आई,
घटाएँ यादों की घिरकर, फिर मन पे हैं छाई,
ढूंढती हैं नजरे अब दूर तलक,
ये फैली है आज कैसी मीलों तक तन्हाई।

मन बावरा भ्रमर सा उड़ रहा अब,
बाग की हर कली से पूछता उनका पता बस,
सिमट रही घुंघट मे हर कली,
मन भ्रमर उदास मलिन हो रहा अब।

कतारों में जल गईं हैं अब हर तरफ रौशनी सी,
जल रही जो मेरे लिए, है वो दीप कौन सी, 
ढ़ल रही सांझ मन मे टीस लिए,
यादों में ढ़ल रही ये घड़ी उदास सी।

शाम कुछ यहाँ कुछ वहाँ

हुई है शाम दोनो तरफ, कुछ यहाँ भी और वहाँ भी,
पल रहे अरमान दोनों तरफ, इक यहाँ और इक वहाँ भी,
सिलसिले तन्हाईयों के अब हैं,
 कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी।

इक सपना पल रहा यहाँ, एक पल रहाँ वहाँ भी,
नींद आँखों से है गुमशुदा, कुछ यहाँ और कुछ वहाँ भी,
धड़कनें की जुबाँ अब बेजुबाँ हैं,
 कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी।

ख्वाब आँखों मे पल रहे हैं, कुछ यहाँ और कुछ वहाँ भी।
बजती है मन में शहनाईयाँ, अब यहाँ और वहाँ भी,
गीत साँसों मे अब बज रही है,
 कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी।

कतारें रौशनी की अब, कुछ यहाँ भी कुछ वहाँ भी।
इंतजार उस पल का, अब यहाँ भी वहाँ भी,
शाम ढल रही अब तुम बिन,
 कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी।

रूठी कविता

लगता है हाथ पकड़ रखा हो किसी ने जैसे,
ताले लगा दिए गए हों जड़ विवेक पर जैसे,
धुंधली सी शाम कुम्हला रही है जैसे,
तन्हाई मे हाथों से दामन छूटा हो जैसे,
कविता मेरी आज रूठ गई है मुझसे जैसे।

वक्त की पावंदियों मे घुट गया हो दम जैसे,
पास रखी हो कलम पर सूखी हो स्याही जैसे,
कुम्हलाई शाम तिलमिला रही हो जैसे,
पहलू मे आकर वो रो पड़ी हो जैसे,
कविता मेरी आज रूठ गई है मुझसे जैसे। 

Monday, 22 February 2016

चश्मा बदल के देखिए

चश्मा बदल के देखिए, है दुनियाँ अलग सी यहाँ,
हर शख्स निराला जगत में, हर शख्स अनोखा यहाँ,
कमी तुझको दिखेगी कहीं, शायद तुझ में ही यहाँ।

तू होगा ग्यानी बड़ा, गुरूर होगा खुदपर तुझको,
जग में भरे पड़े एक से एक नही मालूम तुझको,
चश्में की आड़ से निकलकर तू देख खुद को।

ग्यान, विद्या, धन, सम्मान, धीरज, सहनशीलता,
गुण हैं ये सभी उस विवेकशील शौम्य मानव के,
बदलते नही वो चश्मा तस्वीर नई देखने को।

कर्मपथ की ओर

तू नैन पलक अभिराम देखता किस ओर,
देख रहा वो जगद्रष्टा निरंतर तेरी ओर,
इस सच्चाई से अंजान तू देखता किस ओर।

तू कठपुतली है मात्र उस द्रष्टा के हाथों की,
डोर लिए हाथों मे वो खीचता बाँह तुम्हारी,
सपनों की अंजान नगर तू देखता किस ओर।

निरंकुश बड़ा वो जिसकी हाथों में तेरी डोरी,
अंकुश रखता जीवन पर खींचता डोर तुम्हारी,
उस शक्ति से अंजान तू सोचता किस ओर।

कर्मों के पथ का तू राही नैन तेरे उस ओर,
कर्मपथ पर निश्छल बढ़ता चल कर्मों की ओर,
मिल जाएगी तेरी मंजिल उस द्रष्टा की ओर।

निर्वाण की कठिन यात्रा

निर्वाण की अकल्पित कठिन यात्रा,
पल पल तय कर रहा इन्सान,
राह कठिनतम इस जीवन की,
लक्ष्र्य कर्म के यहाँ महान,
निर्वाण की राह चलता जा रहा इन्सान।

पल भर रूक सोचता मन में,
निर्वाण मिलेगा पर कैसे जीवन में,
लक्ष्य क्या साधने होंगे राहों में,
कितने विष पड़ेंगे जीवन के पीने,
निर्वाण पाएगा क्या तन इस जीवन में?

तन और मन में द्वंद चल रहा निरंतर,
तन कहता तू राह मोह की पकड़,
मन कहता तू जीवन की माया के संग चल,
विवेक पिस रहा मध्य इस अन्तर्द्वन्द के,
इच्छाएँ मन और तन की भारी निर्वाण पर।

नियंत्रण इन इच्छाओं पर करता,
राह निर्वाण की तय कर रहा इन्सान,
जीवन की इस महा-कर्मक्षेत्र में,
लघु इच्छाओं को तज, साधे लक्ष्य को,
यह कठिन यात्रा पल पल कर रहा इन्सान।

निःस्तब्ध रात्रि वेला

नि:स्तब्ध रात्रि 
अन्ध तिमिर अलबेला,
चाँदनी सौं नभ
रंजित सुसमित यह वेला,
विकल प्राण दो 
मिलने को आतुर ।

पूरित पूर्णिमा
मुखरित सी छवि,
बिखरी नर्म सी चाँदनी,
निखरी निखरी,
मलिन मुख काँति।

लहरों के घर,
 जा रही सर्द सी रौशनी,
इन लमहों में,
 छू रही हैं सर्द सी हवायें
तन्हा सा मन,
तन्हा लग रहे अब अपने साये
याद कोई तब आए.....

Sunday, 21 February 2016

खुशियों के ढ़ेह

खुशियों के ये पल अन-गिनत इस जीवन में,
बार बार उठती ढ़ेह सी आती जाती जीवन मे,
इस पल को चुन चुन कर दामन मे हम भर ले,
हम-तुम जी-भर खुलकर इस पल मिल ले।

बस झणिक पल दो पल की हैं ये खुशियाँ,
लहर-लहर ढ़ेह की बस मिटने को बनती यहाँ,
इस ढ़ेह सी क्या जाने हम कहाँ और तुम कहाँ,
कुछ कह सुन लें पल-भर साथ थोड़ा बह लें।

उल्लास के ये दो पल हैं जीवन की निधियाँ,
करुणा की नन्हीं बूँदों सी पलती हैं खुशियाँ यहाँ,
पल पल जीवन बीतता तू इस पल जी ले यहाँ,
इक दिन मुरझाना है इस पल तो खिल लें यहाँ।

इक लम्हा मधुर चाँदनी

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

फलक पे मुखरित चाँद ने, डाला है फिर से डेरा,
चलो आज तुम भी वहाँ, हम कर लें वहीं बसेरा,
गुजर रही है दिल की कश्ती उस चाँद के पास से,
तुम आज बैठी हों क्युँ, यहाँ बोझिल उदास सी।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

फलक निखर मुखर हुई, चाँद की चाँदनी के संग,
 कह रही है ये क्या सुनो, आओ जरा तुम मेरे संग,
निखर जाए थोड़ी चांदनी भी नूर में आपके सनम,
इक लम्हा मधुर चाँदनी, तेरे मुखरे पे निहारूँ सनम।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

प्रखर चाँदनी सी तुम छाई हो दिल की आकाश पे,
मन हुआ आज बाबरा, छूना चाहे तुझको पास से,
दिल की कश्ती भँवर में तैरती सपनों की आस से,
तुम चाँद सम फलक पे छा जाओ मीठी प्रकाश से।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

ये किस मुकाम पर जिन्दगी

ए जिन्दगी, इन रास्तों का पता अब तू ही मुझको बता। 

ये किस मुकाम पर आ पहुँची है जिन्दगी,
 न अपनों की खबर न मजिलों का हेै पता, 
सहरा की धूल मे कहीं, खो गई हर रास्ता,
चँद सांसे ही बची अब, आपसे ही वास्ता।

अंतहीन मरुभूमि सी, लग रही ये जिन्दगी,
धूल सी जम गई समुज्जवल सोच पर मेरे,
संकुचित सिमट रहे, अब दायरे विश्वास के,
मुकाम अब ये कौन सी जिन्दगी के वास्ते।

रेखाएँ सी खिची हुई, हर तरफ यहाँ वहाँ,
अंजान इन रास्तों पर कदम रखें तों कहाँ,
अक्ल जम सी गई हैं, देख कर विरानियाँ,
ये किस मुकाम पर ले आई मेरी रवानियाँ।

ए जिन्दगी, इन रास्तों का पता अब तू ही मुझको बता। 

Saturday, 20 February 2016

पिंजड़ा जीवन का

पिंजड़ा सामने खड़ा दिख रहा जीवन का,
कारावास इस जीवन की, तुझे खुद होगी झेलनी,
दीवार इस कारागार की, तू तोड़ नही पाएगा,
लिखा जो भी भाग्य में तेरे, सामने खुद ही आएगा।

व्यर्थ जाएगी युक्ति तेरी सारी मुक्ति की,
अवधि इस कारावास की, तुझको खुद पूरी है करनी,
कर्मों के अंबार लगे हैं, सामने जीवन के तेरे,
राहें भाग्य के रेखा की तेरी, कर्मो के रश्ते ही गुजरेगी।

मुँह फेर नही सकता तू जीवन के कर्मों से,
आजीवन ये कठोर कारावास सश्रम झेलनी है तुझको,
पुरस्कार या दंड? परिणाम यही पर तू पाएगा, 
मुक्ति तुझको इस पिंजरे से, तेरा "जीवन कलश" दे पाएगा।

आह सिमटती मन में

आह सिमटती मेरी मन की गहराई में रोती सकुचाई!

आह अगर सुन लेगा कोई तो होगी रुशवाई,
यही सोच कर मैं होठों को सी लेता हूँ,
पी जाता हूँ आँसुओं को, मै चुप रह जाता हूँ, 
मन की बात कटोरे मे मन के ही रख लेता हूँ।

आह सिमटती मेरी मन की गहराई में रोती सकुचाई,
व्यथा हृदय की फिर भी, मैं आहों को कह जाता हूँ,
ध्वनि होठों के कंपन की आहों में भर देता हूँ 
चुप रह जाता हूँ मैं, आँखों के आँसू पी लेता हूँ।

आह सिमट जाती फिर मन की गहराई में रोती सकुचाई!

मैं एक अनछुआ शब्द

मैं अनछुआ शब्द हूँ एक!
किताबों में बन्द पड़ा सदियों से,
पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के,
कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में,
एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे।

एक शब्द की विशात ही क्या?
कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की,
शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी,
शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी,
भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी।

एक शब्द ही तो हूँ मैं!
पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही,
कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की,
कौन पूछता है बंद पड़े उन शब्दों को?
कोलाहल जग की क्या कम है सुनने को?

अनछुआ शब्द हूँ रहूँगा अनछुआ!
इस दुनियाँ की कोलाहल दे दूर अनछुआ,
अतृप्त अनुभूतियों की अनुराग से अनछुआ,
व्यक्त रहेगी अस्तित्व मेरी "जीवन कलश" में अनछुआ,
अपनी भावनाओं को खुद मे समेट खो जाऊँगा अनछुआ।

Friday, 19 February 2016

सोचता हूँ कि आज क्या लिखूँ?

सोचता हूँ कि आज मैं क्या लिखूँ?

रास्तों के धूल लिखूँ या पत्थरों के फूल लिखूँ,
जिन्दगी के प्रश्न लिखूँ या जिन्दगी को जवाब लिखूँ,
नग्मा ए नज्म लिखूँ या कुरान ए आयत लिखूँ,
तुमसे शिकवा लिखूँ या तुम्हारी शिकायत लिखूँ,
लिखने को कुछ नया आज मिल रहा नही!

सोचता हूँ कि आज मैं क्या लिखूँ?

रात के ख्वाब लिखूँ या दिन के गुलाब लिखूँ,
पत्तियों की सरसराहट लिखूँ या आपकी घबराहट लिखूँ,
चांदनी रात लिखूँ या स्याह अंधेरी रात लिखूँ,
अपने जज्बात लिखूँ या आपके ख्वाब लिखूँ,
लिखने को कुछ नया आज मिल रहा नही!

सोचता हूँ कि आज क्या लिखूँ?

बाग के फूल लिखूँ या गूलाब के कांटें लिखूँ,
पंछियों की चहचहाहट लिखूँ या पाँव की आहट लिखूँ,
सूखते पत्तों पे लिखूँ या खिलते गुलाब पे लिखूँ,
आपकी याद लिखूँ या आपका भूलना लिखूँ,
लिखने को कुछ नया आज मिल रहा नही!

सोचता हूँ कि आज क्या लिखूँ?

मदहोश मन

ये दिलकश मदहोशियों के पल,
दायरों में दिल के मची है आज हलचल
सुरमई साँझ खिल रही आज मचल।

मदहोश हो रहा आज मेरा ये मन,
कौन से बंधन मे बंध रहा आज ये मन,
खींच रहा किस डोर से ये बंधन।

मदहोशियों की चादर फैली यहाँ,
बदले बदले से आज मौसमों की दास्ताँ,
महकी सी हर दिशा आज है यहाँ।

अन्जाना सा ये दिलकश बंधन,
अन्जान राहों पे जाने किधर चला ये मन,
मदहोश धड़क रहा आज ये मन।

आँधियाँ

आँधियाँ ये कैसी चली,
उड़ा ले गया जो आँशियाँ,
टूटकर चमन की शाख से,
डालियाँ बिखरी हुई यहाँ।

पेड़ पत्ते विहीन हुए,
उजड़ा पत्तों का आशियाँ,
बिखरकर मन की बस्ती से,
मानव निस्तेज पड़ा यहाँ।

रोक लो उन आँधियोे को,
नफरतें फैलाती जो यहाँ,
उजाड़कर इन बस्तियों को,
तोड़ते है फिर बागवाँ।

ये बेचारा दिल

ये अपना दिल न होता बेचारा,
गर जिन्दगी की राहों मे न आपसे मिला होता,
फलसफे चुन चुन कर रुशवाईयों के,
कागजों पे न आज लिख रहा होता।

ये अपना दिल न होता बेचारा,
गर सादगी पे आपकी ये न मर मिटा होता,
समुन्दर की बार बार उठती लहरों से,
पता आपका न आज पूछ रहा होता।

ये अपना दिल न होता बेचारा,
गर रूह की गहराईयों में न आपको बिठाया होता,
चूर चूर हो चुके इस दिल के हर टुकड़े से,
नाम आपका ही न आ रहा होता।

जननी जन्मभूमि भारत

जननी जन्मभूमि हूँ मैं,
आहत हूँ थोड़ी सी, थोड़ी विचलित हूँ मैं,
सदियों से कुठाराघात कई दुश्मनों के सह चुकी हूँ मैं,
टूटी नहीं अभी तक संघर्षरत हूँ मैं।

भारत की माता हूँ मैं!
जानती हूँ सदियों से हमपे जुल्म कई होते रहे,
गोलियों से मेरे वीर सपूतों के हृदय छलनी होते रहे,
पर आहूति देकर ये, रक्षा मेरी करते रहे।

कर्मवीरों की धरती हूँ मैं!
अभिमान हूँ कोटि कोटि हृदयस्थ जलते दीप की,
गौरव हूँ मैं जन जन के संगीत की,
बिखरूंगी लय नई बन, विश्वविजय गीत की।

जननी जन्मभूमि हूँ मैं, भारत माता हूँ मैं।

Thursday, 18 February 2016

तिरंगा शिरमौर भारत की शान

तिरंगे की शान मे बर्दाश्त न होगी गुस्ताखी हमें,
शिरमौर भारत की मान-सम्मान-गौरव सुरक्षा,
 लेनी अब अपनी हाथों में हमें!

वो दुश्मन गद्दार है जो कहता,
भारत मेरा देश नहीं,
मैं कहता सरजमीं-ए-भारत,
स्वाभिमान है मेरा,कोई खेल नहीं!

गद्दार हैं वो! जिनके दिल,
सरजमीं-ए-हिंदुस्तान में रहते नहीं,
युगों- युगों से जयचन्द जैसे,
गद्दारों की इस देश में चली नही।

शिरोधार्य शिरमौर देश का स्वाभिमान हमें,
अरमानों की बलि देकर,
इसकी रक्षा करनी होगी हमें, 
तिरंगे की शान मे बर्दाश्त न होगी गुस्ताखी हमें,
देश द्रोही अफजल जैसे गद्दारों के,
सर कलम करनी होगी हमें।

शिरमौर भारत की मान-सम्मान-गौरव सुरक्षा,
 अब लेनी अपनी हाथों में हमें!

सपनों के भारत को लगी नजर

मेरे सपनों के भारत को लग गई किसकी नजर?

सोंच हो चुकी है दूषित आज सत्तालोलुपों की,
सत्ता के भूखे उस महा दानव की,
साधते स्वार्थ अपना रोपकर वृक्ष वैमनस्य की।

महादानव हैं वो पर दाँत नही दिखते उसके,
खतरनाक विषधर विष भरे सोंच उनके,
दूषित कर देते ये सोंचविचार निरीह भोले मानस के।

चंद पैसों की खातिर बिक जाते यहाँ ईमान,
देश समाज धर्म का फिर कहाँ ध्यान,
आम जन मरे या जले, बढ़ता रहे इनका सम्मान।

सत्ता लोलुपता इनकी देशभक्ति से ऊपर,
देश की बदहाली, दुर्दशा से ये बेखबर,
खुशहाल आवो हवा को लग गई इनकी बुरी नजर।

मेरे सपनों के भारत को लग गई किसकी नजर?

Wednesday, 17 February 2016

गौरैय्या तू चुप क्युँ?

गौरैय्या रे तू आज चुप क्युँ,
मौन तोड़ कुछ कह दे तू,
क्या हुआ जो रूठ गया वो,
संगा संबंधी था छोड़ गया वो।

छोटी सी तो दुनिया है तेरी,
सुख और दुख दोनो तेरे साथी,
जीवन संगी के संग प्रीत लगा तू,
बहाने खुशी के ढूंढ़ नया तू।

तिनके नए पुराने तू चुन ले,
बसेरा सुन्दर सा तू बुन ले,
चीं चीं वाणी मे तू गाता जा,
नए दोस्त संबंधी तू बनाता जा।

गुलशन मंद तेरी वाणी बिन,
झुरमुठ उदास तेरी चीं चीं बिन,
मेरी मन में तू इक आस जगा,
गौरैय्या तू चुप क्युँ गीत कोई गा।

देश की दुर्दशा

चैतन्य चित्त का चंचल चेतक,
हिनहिना रहा आज चित्त के भीतर,
आकुल प्राण आज उस कर्मवीर के ,
सहम रहा देश की विवशता पर।

चेतक है वो जानता कर्म करना,
निष्ठा कर्म की रक्षा में सर्वस्व झौंकना,
सजल हुए नैन आज उस चेतक के,
रो रहा देश की बिखरती दशा पर।

जान न्योछावर की थी उस चेतक ने,
अपनी राणा और मेवाड़ की अधिरक्षा मे,
चैतन्य चित्त चिंतित आज उस चेतक के,
हिनहिनाता देश की दुर्दशा पर।

सूखा पत्ता


गिरा डाल से टूट कर इक सूखा पत्ता,
अस्तित्व अपने बिंब की तलाशता वो सूखा पत्ता!

जीता था जिन्दगी कभी वो झूमकर,
कोमल मृदुल एहसास सासों में लेकर, 
हौसले बुलंद उमड़ते अरंमानों पे चढ़कर,
झंझावात आँधियों की चली ये कैसी,
टूटकर डाली से बिखरा वो पत्ता।

अस्तित्व अपने बिंब की तलाशता वो सूखा पत्ता!

बिछड़ गया वो अपने प्रियतम से,
क्षुधा प्यास पिपास मिटती थी जिससे,
जीवन की अटूट गाँठ जुड़ी थी जिस वृक्ष से,
रो रहा शायद मन आज उस वृक्ष का भी,
प्रीत की डोर टूटी थी उस पत्ते की।

गिरा डाल से टूट कर वो सूखा पत्ता,
अस्तित्व अपने बिंब की तलाशता वो सूखा पत्ता!

अनबुझी प्यास

अंकुरित अभिलाषा पलते एहसास,
अनुत्तिरत अनुभूतियाँ ये कैसी प्यास?

अन्तर्द्वन्द अन्तर्मन अंतहीन विश्वास,
क्षणभंगूर निमंत्रण क्षणिक क्या प्यास?

पिघलते दरमियाँ छलकते आकाश,
अनकहे निःस्तब्ध जज्बात कैसी मौन प्यास?

अमरत्व अभिलाषा स्मृति अविनाश,
अंकुरित अनुभूति अनुत्तरित अनबुझी प्यास?

उम्मीद की शाख

नाउम्मीद कहाँ वो, उम्मीद की शाख पर बैठा अब भी वो।

एक उम्मीद लिए बैठा वो मन में,
दीदार-ए- तसव्वुर में न जाने किसके,
हसरतें हजार उस दिल की,
ख्वाहिशें सपने रंगीन सजाने की।

एक प्यासा उम्मीद पल रहा वहाँ,
तड़पते छलकते जज्बात हृदय में लिए,
नश्तर नासूर बने उस दिल की,
हसरतें पतंगों सी प्रीत निभाने की।

एक उम्मीद विवश बेचैन वहाँ,
झंझावात सी अनकही अनुभूतियाँ मन में लिए,
निःस्तब्ध पुकार दिल मे उसकी,
चाह सिसकी की प्रतिध्वनि सुनाने की।

नाउम्मीद कहाँ वो, एक उम्मीद लिए बैठा अब भी वो।

पानी की लकीरों से कब तकदीर बनता है!

जीवन के चलने में खुद जीवन ही घिसता है,
घिस घिस कर ही पत्थर नायाब हीरा बनता है,
पिट पिट कर ही साज मधुर धुनों में बजता हैं।

सभ्यता महान बनने में एक-एक युग कटता है,
बूंद-बूंद जल मिलकर ही सागर अपार बनता है,
पल-पल खुद में जलकर समय अनन्त बनता है।

कूट-कूट कर ही पत्थर शिलालेख बनता है,
तिल तिल जलकर मोम रौशन चराग बनता है,
पानी की लकीरों से कब कहाँ तकदीर बनता है?

जीवन के चलने मे खुद जीवन ही घिसता है।

Tuesday, 16 February 2016

जब जब तुम मिले

सांझ ढ़ले सुरमई बातों के सिलसिले,
मधुमई आवाज की उन गाँवों में हम चले,
चाँद मे नहाई सी रात अब साथ ढ़ले।

रात ढ़ले छुईमुई सी यादों के सिलसिले,
अन्तस्थ हृदय की उन धड़कनों से हम मिले,
अन्तर में कुम्हलाई सी अब याद ढ़ले।

जीवनदीप ढ़ले मधुमई यादों के सिलसिले,
मधुप्रीत की इस नैया मे तुम संग कुछ देर चले,
मनप्रांगण खिल आई जब जब तुम मिले।

बसंत ने ली अंगड़ाई

अंजुरी भर भर अाम रसीली मंजराई,
वसुधा के कणकण पर छाई तरुनाई,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।

रूप अतिरंजित कली कली मुस्काई,
प्रस्फुटित कलियों के सम्पुट मदमाई,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।

कूक कोयल की संगीत नई भर लाई,
मंत्रमुग्ध होकर भौंरे भन-भन बौराए,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।

Monday, 15 February 2016

बिखरी जुल्फे

अगर वो कहें तो उनकी बिखरी लटे मैं सँवार दूँ,
झुकी हुई सी यें पलकें,जरा इनको निहार लूँ,
मद्धिम पड़ रही है चांदनी, रौशन चराग कर लूँ।

रूप उस साँवरी का अभी, जी भर के देखा नही,
अंधेरों मे अब जिन्दगी ढलती जा रही यूँहीं,
चेहरे से जुल्फें हटा दूँ, रातो मे रौशनी भर लूँ।

जज्बातों की आँधियाँ उठ रही हैं यहाँ अभी,
मुझको संभाल लो, मैं आज वश में नही,
चेहरों से उठा दूँ नकाब, रौशन अरमान कर लूँ।

पत्ते डालियों के है हरे, सूखे अभी तक ये नही,
चढ़ान पर उम्र है जिन्दगी अभी रुकी नही,
निहारता रहूँ तेरा चेहरा, संग तमाम उम्र चल लूँ।

स्वर्ण सम बालूकण

हे मानव, इस जीवन मरु मे स्वर्णकण सम निखरो तुम।

स्वर्णकण सी चमक रही, बालूकण मरुस्थल के,
कड़कती तेज प्रखर धूप ज्वाला में जल जल के।
हे मानव, जीवनमरु में बालू सम निखरो जल के।

अकित हुई मरुस्थल स्वर्ण सी बालू की आभा में,
शोभित हो कर बिखर रहे स्वर्णकण चहु दिशा में,
हे मानव, स्वर्णकण सी बिखरो जीवन की राहों में।

उठी वेग से आंधी, धूलकण बिखरी स्वर्णकण बन,
बरस रही फेनिल स्वर्ण सी, उड़उड़ कर बालूकण।
हे मानव, तुम उड़ो मरूजीवन के स्वर्णकणों सम।

हे मानव, इस जीवन मरु मे स्वर्णकण सम निखरो तुम।

कठिन परिभाषा जीवन की

मान लो मेरी, परिभाषा बड़ी कठिन इस जीवन की!

बोझ लिए सीधा चलना सधे पैरों भी है भारी,
प्राणों का यह विचलन, सबल मन पर भी है भारी,
मौन वेदणा सहता सहनशील मानव इस जीवन की।

हिलते मिलते थे जीवन कभी एक डाल पे,
भार असह्य बोझ की थी उस निर्बल डाल पे,
कल्पना नहीं टूटेगी कभी, बोझ से डाली जीवन की

जिज्ञासा सशंकित आँखों में भविष्य की,
कुहासा छटती नही, जीवन के इस फलक की,
परिभाषा हो चुकी कठिन, इस उलझी जीवन की।

मान लो मेरी, परीक्षा लेता वो बड़ी कठिन जीवन की!

कल किसने देखा

वो बस कल की बातें करता रहता नादान,
पल-पल रंग बदलती दुनियाँ से बेखबर वो इंसान,
जीवन तो बस इस पल है, कल से हम सब अंजान।

कल किसने देखा है, कल से किसकी पहचान,
पल में यहाँ बदलता मौसम, बदल जाते पल में इंसान,
पल मे धरा बदलती कक्षा, जानकर भी वो अंजान।

घूमता कालचक्र का पहिया, मांग रहा बलिदान,
सर्वस्व निछावर कर इस पल में, गर बनना तुझे महान,
तलाश किस अनन्त की तुझको, तू कोरा अंजान।

स्पर्शानुभूति

स्पर्श किया किसी ने दामन,
पीठ के पीछे से चुपके से,
कौंधी कहीं तब मेरी चितवन,
महसूस हुआ जैसे कंधों पर,
अपनी सी गर्माहट किसी ने रख दी।

उस स्पर्श मे कैसा अपनापन,
चल पड़ा परिमल का झोंका,
गूँजी पड़ीं फिर खिलखिलाहट,
टूक-टूक होकर बिखरा सन्नाटा,
निखरे होठ जब मर्माहट उसने रख दी।

स्पर्श किया था उसने जीवन,
स्पर्शानुभूति की सिलवटे मन में,
हृदय मंदार मंद मंद मुस्काता,
नींव रिश्तों की रखी तनमन में,
सिलसिले ख्वाबों के बनी हकीकत सी।

इस पल

वो बस कल की बातें करता रहता नादान,
पल-पल रंग बदलती दुनियाँ से बेखबर वो इंसान,
जीवन तो बस इस पल है, कल से हम सब अंजान।

कल किसने देखा है, कल से किसकी पहचान,
पल में यहाँ बदलता मौसम, बदल जाते पल में इंसान,
पल मे धरा बदलती कक्षा, जानकर भी वो अंजान।

घूमता कालचक्र का पहिया, मांग रहा बलिदान,
सर्वस्व निछावर कर इस पल में, गर बनना तुझे महान,
तलाश किस अनन्त की तुझको, तू कोरा अंजान।

Sunday, 14 February 2016

"अविनाशी बंधन"

(पूजनीय नाना नानी...की मोहक स्मृति में समर्पित)

स्मृति पटल पर अंकित वो बनकर एहसास,
अविनाशी मानस पटल मे जो, वो अविनाश,
विनाश न हो जग में जिसका, वो अविनाश,
बांधता "अविनाशी बंधन" में, वो अविनाश!

अभिमान वो हमारा उनसे कुल की पहचान,
अधिष्ठाता मर्यादा का, सत्कर्मो की वो खान,
निष्ठाकर्म, लग्नकर्म, अनुशासन का वो प्रेमी,
वो अविनाश, हम सब की आन, बान, शान।

कितने ही दूरदूर हों इनकी लड़ियों के मोती,
कसक एक दूजे की पल पल दिल में बढ़ती,
शरुआत हर सुबह उनकी यादों से ही होती,
उनकी स्मृति की क्षणों के संग शाम बीतती।

प्रार्थना करूँ हर पल उस अविनाशी ईश्वर से,
बढ़ता रहे कुलवृक्ष निकलती रहे नई कोपलें,
निरंतर बढ़ती रहे मानमर्यादा कुल की हमसे,
गौरवांवित हों हम महिमा-मंडित अविनाश।

अभिलाषा पल की

प्रिय, युग-युग की चाह पूरी कर लेता इक पल में।

चाह अनन्त पलते इस मन में, 
घड़ियाँ बस पल दो पल जीवन में,
चाह सपनों की हसीन लड़ियों से, 
सजाता जीवन की घड़ियों को संग तेरे।

प्रिय, युग-युग की चाह पूरी कर लेता इस पल में।

आज मोहक इस वेला में,
सुधि फिर लेती मन में इक आशा,
अरमान कई सजते इस तन मन में,
जीवन संध्या प्रहर पलती कैसी अभिलाषा?

प्रिय, युग-युग की चाह पूरी कर लेता इक पल में।

डूब रहा मन अनचाही चाहों में,
सुख सपनों के नगरी की प्रत्याशा,
झंकृत हो रहा अनगिनत तार मन में,
जीवन की इस वेला में ये कैसी अभिलाषा?

प्रिय, युग-युग की चाह पूरी कर लूँ इक पल में।

Saturday, 13 February 2016

मूक जेहन

मूक जेहन वाणी विहीन,
भाषा जेहन की आज अक्षरहीन,
परछाईयों मे घिरा, परछाईयों से होता व्याकुल।

परछाईं एक सदियों से जेहन में,
अंगड़़ाई लेती मृदुल पंखुड़ी बन।

मिला जीवन मे बस दो पल वो,
यादें जीवन भर की दे गया वो।
मृदुल स्नेह की चंद बातो में ही,
सौदा उम्र भर का कर गया वो।

जेहन की गहराई मे शामिल वो,
स्मृति की छाँव पाकर रहता वो।

अंकित स्मृति पटल पर अब वो,
मन उपवन की वादी मे अब वो,
जेहन की स्मृतिगृह मे रहता वो,
मंद-मंद सासों में मदमाता। वो।

यादों की परछाईयों मे घिरा जेहन,
स्मृति स्नेह में रम व्याकुल अब वो।

कहती भी क्या वाणी विहीन अक्षरहीन भाषा उसकी?
 मूक जेहन आज भी वाणी विहीन,
भाषा जेहन की आज अब भी अक्षरहीन,
परछाईयों मे घिरा, परछाईयों से ही व्याकुल जेहन।

आँखों का भरम


जानता हूँ तुमको जनमों से, तुम जानो या न जानो।

कई जन्मो पहले तुम मिले थे मुझको,
हम बिछड़े, फिर मिले हम, दुनिया से गुजरे, 
युग बीते, जन्म बदले, शक्ल बदले,
लगती ये बात पर आजकल की ही मुझको।

जानता हूँ कई जनमों से तुम्हे, तुम मानो या न मानो।

डोर कैसी जो खीचती तेरी ओर मुझको,
बिछड़े जन्मों पहले, फिर मिले हो तुम मुझको
आँखों में ये भरम कैसी, जो शक्ल बदले?
जन्मों-जन्मो से मिलते रहे तुम युंही मुझको।

जनमों जनमों का ये बंधन, तुम मानो या न मानो।

संध्या प्रेम

संध्या दिन की बाहों में अटकी सी,
जाने की विवश रुकने की चिन्ता में भटकी सी,
मंद पवन रोकती राहें लट सहलाती संध्या की।

संध्या की सासें प्रीत मे अटकी सी,
धीमी धवल मद्धिम रौशन राहों मे भटकी सी,
चंचला रात्रि संध्या प्रेम में डूबी मदमाई सी।

संध्या स्वप्न सम सुंदर चटकी सी,
अब डूब रही रात की आगोश में मतवाली सी,
रूप-मधु रात्रि की संध्याप्रीत मे निखरी सी।

स्वर नए गीत के गा

धीर रख! स्वर नए गीत के गा, चल मेरे साथ अब।

रहता था आसमाँ पर एक तारा यही कहीं,
गुजरा था टूट कर एक तारा कभी वहीं,
मिलते नही वहाँ उनकी कदमों के निशान अब,
रौशनी है प्रखर, पर दिखती नही राह अब।

भटक रहे हैं हम किन रास्तों पे अब?
दिखते नही दूर तक मंजिलों के निशान अब,
अंतहीन रास्तों मे भटका है अब कारवाँ,
बिछड़ी हुई हैं मंजिले, भटकी हुई सी राह अब।

बेसुरी लय सी रास्तों के गीत सब,
बजती नही धुन कोई भटकी हुई राहों में अब,
आरोह के सातों स्वर हों रहे अवरुद्ध अब,
धीर रख! स्वर नए गीत के गा, चल मेरे साथ अब।

सरस्वती वंदन

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।

सरस्वती  मंत्र 
प्रथमं भारती नाम द्वितीयं तु सरस्वती l 
तृतीयं शारदा देवी चतुर्थ हंसवाहिनी l
 पंचम जगतीख्याता षष्ठं   माहेशवरी तथा l 
सप्तमं तु कौमारी अष्टमं ब्रह्माचारिणी  l 
नवमं विद्याधात्रीनि दशमं वरदायिनी l 
एकादशं रूद्रघंटा द्वादशं भुवनेश्वरी l 
एतानि द्वादशो नामामि य: पठेच्छ्रुणयादपि l 
नच  विध्न भवं तस्य मंत्र सिद्धिकर तथा l

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृताया। वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभि र्देवैः सदा वन्दिता । 
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

(जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं जिनके हाथ में वीणादण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूरण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥)

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्हस्ते 
स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्वन्दे 
तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥2॥

(शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान् बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ..... जाने.... कितने ही पलों का... उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ.... तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध...

विगत 30 दिनों की सर्वाधिक चर्चित रचनाएँ