Tuesday, 29 November 2016

मेरी स्मृतियाँ

अविस्मरणीय सी कुछ स्मृतियाँ......
या शीतल सुखदायी, या हों अति-दुखदायी,
अविस्मृत,अक्षुण्ण अनंत काल तक रवाँ,
बिसारे बिसरती है ये कहाँ?

अंश कुछ स्मृतियों के रहते हैं बाकि......
या मीठी हो ये स्मृतियाँ, या हों ये खट्टी!
स्मृति कुछ ऐसी ही हूँ मैं भी,
है बहुत मुश्किल भुला देना, यूँ ही मुझको भी!

माना, पत्थर सी शक्ल है हृदय की तेरी,
पर कहीं शेष रह न गई हों यादें मेरी?
टटोल लेना अपनी हृदय को तुम.....
निशान मेरी स्मृति के तुम पाओगे वहाँ भी!

आड़ी-टेढ़ी लकीरों सी पत्तों पर अंकित,
ये पल पल सूख सूख गहराएँगी होकर अमिट,
मानस पटल जब कुरेदोगे तुम ....
उभर आएँगी दबी सी मासूम स्मृतियाँ मेरी!

अक्षुण्ण हूँ हर पल तेरे मन में मैं,
अभिन्न तुझसे हूँ, तेरी यादों की तरंग में हूँ मैं,
साँस -साँस जीता हूँ मैं तुझमें....
झुठला ना पाओगे, स्मृति बिसार न पाओगे मेरी!

Friday, 25 November 2016

वृत्तान्त

अटूट लड़ी हो इस जीवन वृत्तान्त की तुम,
अर्धांग सर्वदा ही जन्म-जन्मातर रही हो तुम,
न होते कंपन इस हृदय के गलियारों में,
उभर कर न आती तस्वीर कोई इन आखों में,
न लिख पाता वृत्तान्त मैं जीवन की राहों के,
मेरे पिछले जीवन की ही कोई अटूट कड़ी हो तुम....

लिख जाता हूँ मैं कितने ही पन्ने तेरी लय पर,
अनलिखे कितने ही कोरे पन्ने, फिर होते हैं मुखर,
विह्वल हो उठते हैं शब्दों के भाव इन पन्नों पर,
शक्ल फिर तेरी ही उभर आती है लहराकर,
अर्धांग मेरी, तुम सिमट जाती हो वृत्तान्त बनकर,
मेरे अगले जन्म की कड़ी, कोई लिख जाती हो तुम...

सीधा सा मेरा वृत्तान्त, बस तुम से तुम तक,
इस जन्म पुकार लेता हूँ बस तुम्हे मैं अन्नु कहकर,
गीतों की गूँजन में मेरे, बजते हैं तेरे ही स्वर,
तैरती आँखों में तेरी, जब निखर उठती है तस्वीर मेरी,
प्रेरित होता हूँ मैं वृत्तान्त नई लिख जाने को तब,
जन्म-जन्मांतर की कोई लड़ी सी बन जाती हो तुम...

तिथि: 24/11/2016...
(हमारे शादी की 24वीं सालगिरह पर अर्धांग को सप्रेम)

Saturday, 19 November 2016

हुई है शाम

हुई है शाम, प्रिये अब तुम गुनगुनाओ........!

लबों से बुदबुदाओ, तराने प्रणय के गाओ,
संध्या किरण की लहर पर, तुम झिलमिलाओ,
फिर न आएगी लौटकर, ये शाम सुरमई,
तुम बिन ये गा न पाएगी, प्रणय के गीत कोई,
गीत फिर से प्रणय के, तुम वही दोहराओ,

हुई है शाम, प्रिये अब तुम गुनगुनाओ........!

ऐ मन के मीत मेरे, तुम पंछियों सी चहचहाओ,
सिमटती कली सी, तुम लजाती दुल्हन बन आओ,
फिर लौट कर न आएगी, ये शाम चम्पई,
तुम बिन कट न पाएगी, ये रुत, ये प्रहर, ये घड़ी,
तराने मिलन के लिखकर, तुम राग में सुनाओ,

हुई है शाम, प्रिये अब तुम गुनगुनाओ........!

चाँद तारों से मिलने, तुम भी फलक पे आओ,
रूठो ना मुझसे यूँ तुम, दिल की पनाहों में आओ,
झूमकर फिर ना चलेगी, लौटी जो पुरवाई,
तुम बिन न खिल सकेगा, फलक पे चाँद कोई,
प्रणय के तार छेड़कर, अनुराग फिर जगाओ,

हुई है शाम, प्रिये अब तुम गुनगुनाओ........!

Thursday, 17 November 2016

तराना प्रणय का

सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का....

गाएँ कैसे इसे हम, अब तुम ही हमें ये बताना,
ढ़ल रही है शाम, तुम सुरमई इसे बनाना,
अभी सहने दो मुझको, असह्य पीड़ा प्रणय का,
निकलेगी आह जब, इसे धुन अपनी बनाना।

सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का....

अभी गाऊँ भी कैसै, मैं ये तराना प्रणय का,
आह मेरी अब तक, सुरीली हुई है कहाँ,
बढ़ने दो वेदना जरा, फूटेगा ये तब बन के तराना,
तार टूटेंगे मन के, बज उठेगा तराना प्रणय का।

सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का....

कभी फूटे थे मन में, वो तराने प्रणय के,
लिखी है जो दिल पे, आकर रुकी थी ये लबों पे,
एहसास थी वो इक शबनमी, पिघलती हुई सी,
कह भी पाऊँ न मैं, दिल की सब बातें किसी से।

सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का....

छेड़ना ना तुम कभी, फिर वो तराना प्रणय का,
अभी मैं लिख रहा हूँ, इक फसाना हृदय का,
फफक रहा है हृदय अभी, कह न पाएगा आपबीती,
नगमों में ये ढ़लेंगे जब, सुनने को तुम भी आना।

सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का....

Monday, 14 November 2016

चुपचाप

हाँ, बस चुपचाप ....

चुपचाप ....जब आँखों की भाषा में कोई,
गिरह मन की खोलता है चुपचाप,

चुपचाप .... जब साँसों की लय पर कोई,
हृदय की धड़कन गिनता है चुपचाप,

चुपचाप ....जब कदमों की आहट पर कोई,
बेताबी दिल की सुन लेता है चुपचाप,

चुपचाप ....अंतःस्थ प्यार का बादल यूँ ही,
क्षितिज से उमड़ पड़ता है चुपचाप,

चुपचाप ....जब दिल की आँखों से यूँ ही,
कुछ शर्माकर वो देखते है चुपचाप,

चुपचाप .... ये मेरा छोटा सा घर  यूँ ही,
संसार मेरा बन जाता है चुपचाप।

हाँ, बस चुपचाप ....

आ पास मेरे

आ पास मेरे ...पल दो पल, आ पास मेरे।

फिरा लूँ ऊँगली,
तेरे गुलाबी आँखों पर,
लाल लाल उन होठों पर,
लहराते इन गेसुओं पर,
चुरा लूँ झील से तेरे,
नैनों का काजल,
आ पास मेरे ...पल दो पल, आ पास मेरे।

गुलाब के फूलों सा,
महका तेरा बदन,
झूम उठी प्रकृति सुन,
छम-छम की सरगम,
बजा लूँ होकर विह्वल
रूनझुन तेरी पायल,
आ पास मेरे ...पल दो पल, आ पास मेरे।

सूरज संग किरण,
बादल संग बिजली,
हम जी रहे जैसे,
फूलों संग तितली,
तस्वीर तेरी आँखों में,
रहती हर पल,
आ पास मेरे ...पल दो पल, आ पास मेरे।

कुछ तो कहो

कुछ तो कहो मेरे अर्धांग.....

सिले से लब, भीगे से दो नैन,
चुप न रहो कहो मेरे अर्धांग,
लब हिलने दो कह दो वृतान्त,
कुछ बोलो........

सिंदूर का भरम, बिंदी में हम,
देह पत्र तुम, मैं हूँ कलम,
गम न सहो ऐ मेरे मृगान्त,
कुछ पिघलो.......

भौंहें तनी सी , नयन के तेवर,
कमर प्रत्यंचा सी, अनोखे जेवर,
मुझसे कहो कुछ मेरे सर्वांग,
कुछ दो लो........

कुछ तो कहो मेरे अर्धांग.....

कशिश

कुछ तो है कशिश बातों मे तेरी, जो खींच लाई है मुझे...

घूँघरुओं की मानिंद लगते हैं शब्द तेरे,
दूर मंदिर में जैसे कोई कर रहा हो स्वर वंदन,
सुर मधुर सा कोई गाने लगी हो कोयल,
वीणा के तार कहीं झंकृत हुए हों अचानक ऐसे,
कि जैसे छम से आ टपकी हों बारिश की बूँदें!

कुछ तो है कशिश बातों मे तेरी, जो खींच लाई है मुझे...

आत्माओं के संस्कार की प्रकट रूप है वाणी,
सरस्वती के वरदान का इक स्वरूप है वाणी,
वाणी में किसी के यूँ ही होता नहीं इतना मिठास,
कशिश किसी की शब्दों में आता नहीं चुपचाप,
यूँ ही कोई, किसी का बनता नहीं तलबगार।

कुछ तो है कशिश बातों मे तेरी, जो खींच लाई है मुझे...

Sunday, 13 November 2016

शायद

भूल जाना तुम, वो शिकवे-शिकायतों के पल....

शायद! इक भूल ही थी वो मेरी!
सोचता था कि मैं जानता हूँ खूब तुमको,
पर कुछ भी बाकी न अब कहने को,
न सुनने को ही कुछ अब रह गया है जब,
लौट आया हूँ मैं अपने घर को अब!

शायद! यूँ ही थी वो मुस्कराहटें!
खिल आई थी जो अचानक उन होंठो पे,
कुछ सदाएँ गूँजे थे यूँ ही कानों में,
याद करने को न शेष कुछ भी रह गया है जब,
क्या पता तुम कहाँ और मैं कहाँ हूँ अब!

शायद! वो एक सुंदर सपन हो मेरा!
जरा सा छू देने से, कांपती थी तुम्हारी काया  ,
एक स्पर्श से सिहरता था अस्तित्व मेरा,
स्थूल सा हो चुका है अंग-प्रत्यंग देह का जब,
जग चुका मैं उस मीठी नींद से अब!

शायद! गुम गई हों याददाश्त मेरी!
या फिर! शब्दों में मेरे न रह गई हो वो कशिश,
या दूर चलते हुए, विरानों में आ फसे हैं हम,
या विशाल जंगल, जहाँ धूप भी न आती हो अब,
शून्य की ओर मन ये देखता है अब!

शायद! छू लें कभी उस एहसास को हम!
पर भूल जाना तुम, वो शिकवे- शिकायतों के पल....
याद रखना तुम, बस मिलन के वो दो पल,
जिसमें विदाई का शब्द हमने नहीं लिखे थे तब,
दफनाया है खुद को मैने वहीं पे अब!

भूल जाना तुम, वो शिकवे- शिकायतों के पल....

Friday, 11 November 2016

अतीत

तट पे आज खड़ा ये जीवन,
ताकता उस तट को,
छोड़ आया अतीत वो जिस तट,
फिर ये नाव बही क्यूँ उस तट को।

कह रहा है अब अतीत मेरा,
मेरे वर्तमान से आकर,
हो न सका जो तेरा,
क्यूँ रह गया तू उसका ही होकर।

अतीत में तब खोया था तू ने,
खुद से ही खुद को,
हो न सका हासिल लेकिन,
कुछ भी तो जीवन-भर तुझको।

अब सामने खड़ा अतीत तेरा,
वर्तमान की राहों को घेरे,
कच्चे धागों से मन को ये फेरे,
क्या तोड़ पाएगा तू इस बंधन को?

Thursday, 10 November 2016

सिहरन

सिहर सिहर कर ....
आज अधरों से फूटी है दो बात,
चुप-चुप ज्युँ ....
गई हो रौशनी छिप छिप कर आई हो रात,
विवश हुए हम इतने बदले हैं ये कैसे हालात।

सिमट सिमट कर  ....
रह गई अब इस मन की अभिलाषा,
विलख-विलख ज्यूँ,
रोई हो बदली और आकाश हुआ हो प्यासा,
विवश हुए हम इतने छूट चुकी दामन से आशा।

बहक बहक कर  .....
क्षितिज पर छाई है भरियाई सी शाम,
सहम-सहम ज्यूँ,
खोये से है हम और नदी का तट हो निष्काम,
विवश हुए हम इतने भीगे-भीगे नैन हुए हैं नम।।

अतीत हूँ मैं

अतीत हूँ मैं बस इक तेरा, हूँ कोई वर्तमान नहीं...
तुमको याद रहूँ भी तो मैं कैसे,
मेरी चाहत का तुझको, है कोई गुमान नहीं,
झकझोरेंगी मेरी बातें तुम्हें कैसे,
बातें ही थी वो, आकर्षण का कोई सामान नहीं।

मेरी आँखों के मोती बन-बनकर टूटे हैं सभी,
सच कहता हूँ उन सपनों में था मुझको विश्वास कभी,
सजल नयन हुए थे तेरे, देखकर पागलपन मेरा,
अब हँसता हूँ मैं यह कहकर "लो टूट चुका बन्धन मेरा!"
अतीत के वो क्षण, अब मुझको हैं याद नहीं।

क्या जानो तुम कि एक विवशता से है प्रेरित...
जीवन सबका, जीवन मेरा और तेरा !
पर यह विवशता कब तक रौंदेगी जीवन को भी,
हो जाएंगे आँखों से ओझल जीवन के ये पृष्ठ सभी,
नव-यौवन की ये हलचल, हो जाएंगी खाक यहीं।

अपनाने में तुमको मैंने अपनेपन की परवाह न की,
पर क्रंदन सुनकर भी मेरी, तूने इक आह न की,
आह मेरे अब उभरे हैं बनकर गीत,
पर दुनिया मेरे गीतों में अपनापन पाए भी तो क्या?
बोल मेरे उन गीतों के, रह जाने हैं बस यहीं।

अतीत हूँ मैं बस इक तेरा, हूँ कोई वर्तमान नहीं.....

एक और इंतजार

रहा इस जनम भी, एक और अंतहीन इंतजार....!
बस इंतजार, इंतजार और सदियों का अनथक इंतजार!

इंतजार करते ही रहे हम सदियों तुम्हारा,
कब जाने धमनियों के रक्त सूख गए,
पलकें जो खुली थी अंतिम साँसों तक मेरी,
जाने कब अधखुले ही मूँद गए,
इंतहा इंतजार की है ये अब,
तुमसे मिलने को पाया हमने ये जन्म दोबारा...

रहा इस जनम भी लेकिन एक और अंतहीन इंतजार...!

गिन न सके अनंत इंतजार की घड़ियों को हम,
चुन न सके वो चंद खुशियाँ उन राहों से हम,
दामन में आई मेरी बस इक तन्हाई,
और मिला मुझको मरुभूमि सा अंतहीन इंतजार,
और कुछ युगों का बेजार सा प्यार,
हां, बस ..  कुछ युगों का एक और इंतजार.....।

किया इस जनम भी हमनें एक और अंतहीन इंतजार..!

ये युग तो ऐसे ही बस पल में बीत जाएंगे,
तेरी यादों में हम युगों तक ऐसे ही रीत जाएंगे,
भूला न सकोगे जन्मों तुम मुझको भी,
इंतजार तुझको भी बस मेरी ही,
मिटा सकोगे ना तुम भी ये रेखाएँ हाथों की
मृत्यु जब होगी सामने आएंगे याद तुम्हें बस हम ही......

इस जनम तुमको भी है एक और अंतहीन इंतजार....!

शायद तब होगी अंत मेरी ये इंतजार,
जब होगी अपनी इक अंतहीन सी मुलाकात,
व्योम मे उन बादलों के ही पीछे कहीं,
तब साधना होगी मेरी सार्थक,
पूजा होगी मेरी तब सफल,
युगों युगों के इंतजार का जब मिल जाएगा प्रतिफल.....

पर, रहा इस जनम भी, एक और अंतहीन इंतजार....!
बस इंतजार, इंतजार और सदियों का अनथक इंतजार!

Monday, 7 November 2016

अतिरंजित पल

हैं कितने सम्मोहक ये, उनींदे से अतिरंजित पल......

कतारें दीप की जल रही हर राह हर पथ पर,
जन-सैलाब उमर आया है हर नदी हर घाट पर,
हो रहा आलोकित, अंधियारे मन का प्रस्तर।

हैं कितने मनभावन ये, उनींदे से अतिरंजित पल......

मंद-मंद पुरवैयों संग घुमर रहा नभ पर बादल,
बिखेरती किरणें सिंदूरी वो सूरज अब रहा निकल,
हो रहा सुशोभित, लाल-पीत वर्णों से मुखमंडल।

हैं कितने आकर्षक ये, उनींदे से अतिरंजित पल......

प्रकाशित है नभमंडल, प्राणमयी हुए हैं मुखरे,
कली-कली मुस्काई है, रंग फूलों के भी हैं निखरे,
हो रहा आह्लादित, विहँस रहे हैं हर चेहरे।

हैं कितने मनमोहक ये, उनींदे से अतिरंजित पल......

Friday, 4 November 2016

चाहो तो

चाहो तो पढ़ लेना तुम वो पाती,
हवाओं के कागज पर लिखकर हमनें जो भेजी,
ना कोई अक्षर इनमें, ना हैं स्याही के रंग,
बस है इक यादों की खुश्बू चंचल पुरवाई के संग।

चाहो तो रख लेना तुम वो यादें,
घटाओं की चुनरी में कलियों संग हमने जो बाँधे,
ना कोई पहरे इन पे, ना शिकवे ना रंज,
बस है इक ठंढी सी छाँव बादल की परछाई के संग।

चाहो तो सुन लेना तुम वो गीत,
सागर की लहरों ने जो छेड़ी है सरगम की रीत,
ना हैं वीणा के सुर, ना पायल की रुनझुन,
बस है इक अधूरा सा संगीत सागर की तन्हाई के संग।

चाहो तो पढ़ लेना तुम वो संदेशे,
किरणों संग नभ पर लिखकर हैं हमने जो भेजे,
ना है शब्द कोई, ना कोई भी पूर्णविराम,
बस है इक रंग गुलनारी सी थोड़ी श्यामल रंगों के संग।

Thursday, 3 November 2016

उनकी आहट

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

फैली है पहचानी सी खुश्बू फिजाओं में पल पल,
गूंज रही इक आवाज दिशाओं में हर पल,
तोड़ रही ये खामोशी, विरान दिल के प्रतिपल,
रह रहकर इन हवाओं में,ये कैसी है हलचल.......!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

क्यूँ आँखों से अदृश्य अब तक है वो प्रतिकृति,
क्या आहट है यह किसी मूक आकृति की,
गुंजित हैं फिर मेरा मन धुन पर किस सरगम की,
मन से निकल रही है क्यूँ इक आह सी....!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

झूमती इन पत्तियों में ये सरसराहट है फिर कैसी,
छुअन सी इक सिहरन बदन में है ये कैसी,
जेहन में हर पल गूंजती फिर ये आवाज है कैसी,
एहसास नई सी जागी दिल मे आज है कैसी.......!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

Wednesday, 2 November 2016

कभी तुम लौट आओ

तुम लौट आओ.....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

कभी लगता है मुझको,
जैसे हर चेहरे में छुपा है तेरा अक्श,
क्यूँ  तेरी चाहत में मुझको,
प्यारा सा लगता है हर वो इक शक्श,
ले चला है भरभ किस ओर मुझको,
राहत मिलता नही कहीं दिल को....

तुम लौट आओ....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

कभी देखता हूँ मैं फिर,
आँखों मे मंडराता इक धुंधला सा साया,
क्यूँ लगने लगता है फिर,
स्मृतिपटल पर छाई है तिलिस्म सी माया,
लहरों सी वो फिर उफनाती,
उद्वेलित इस स्थिर मन को कर जाती....

तुम लौट आओ....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

तभी सोचता हूँ फिर मैं,
वो अक्श तो मिल चुकी वक्त की खाई में,
क्यूँ फिर भरम में हूँ मैं,
किस साए से मिलता हूँ रोज तन्हाई में,
किसी कोहरे में उलझा हूँ शायद मैं,
बिखरा है ये मन भरम के किस बादल में ......

तुम लौट आओ....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

कभी लगता है तब,
यादों के ये उद्वेग होते है बड़े प्रबल,
क्यूँ याद करता है इन्हे मन जब,
असह्य पीड़ा देते है ये जीने के संबल,
पर यादों पर है किसके पहरे,
चल पड़ता हूँ उस ओर जिधर ये यादें चले,

तुम लौट आओ....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

कभी पूछता हूँ मैं फिर,
झकझोरा है मेरे स्मृतिपटल को किसने,
क्यूँ अंगारों को सुलगाया है फिर,
तन्हा लम्हों को फिर उकसाया है किसने,
पानी में पतवार चली है फिर क्यूँ,
यादों की ये तलवार खुली है फिर क्यूँ,

तुम लौट आओ....तुम लौट आओ.....कभी तुम..

Tuesday, 1 November 2016

प्रेम कल्पना

इक दिवा स्वप्न में ढ़लकर, संग मेरे तुम चल रहे ....
कल्पना की चादर मे सिमटी, तुम जीवन में ढ़ल रहे ....

अब गीत विरह के गाने को,
कोई पल ना आयेगा,
मन के मधुबन में ओ मीते,
प्रेम प्रबल हो गायेगा..............

सुरमई गीतों में रचकर, सरगम मे तुम ढल रहे ....
कल्पना की चादर मे सिमटी, तुम जीवन में ढ़ल रहे ....

अब एकाकी ही रह जाने को,
कोई मन ना तड़पेगा,
मन के आंगन में ओ मेरे मीते,
तन्हाई गीतों संग गूंजेगा............

संध्या प्रहर ये सुनहरी, भावों में तुम पल रहे ....
कल्पना की चादर मे सिमटी, तुम जीवन में ढ़ल रहे ....

अब मोहनी सी मूरत देखने को,
कोई पल न रिझाएगा,
सांझ प्रहर क्षितिज नित ओ मीते ,
सूरत तेरी  ही दिखलाएगा..........

गूढ़ शब्द बन तुम मिले, अर्थ में तुम ढ़ल रहे.....
कल्पना की चादर मे सिमटी, तुम जीवन में ढ़ल रहे ....

अब भाव हृदय के पढ़ पाने को,
कोई मन ना तरसेगा,
गूढ़ रहस्य उन शब्दों के ओ मीते,
नैन तेरे मुझसे कह जाएगा..........

इक दिवा स्वप्न की भांति, संग मेरे तुम चल रहे ....
कल्पना की चादर मे सिमटी, तुम जीवन में ढ़ल रहे ....

ख्वाहिशें

सर्द खामोश सी ख्वाहिशें,सुलग उठी है फिर हलके से.....

कुछ ऐसा कह डाला है तुमने धीरे से,
नैया जीवन की फिर चल पड़ी है लहरों पे,
अंगड़ाईयाँ लेती ख्वाहिशें हजार जाग उठी है चुपके से।

बुनने लगा हूँ मैं सपने उन ख्वाहिशों के,
आशा के पतवार लिए खे रहा नाव लहरों पे,
सपनों का झिलमिल संसार अब दूर कहाँ मेरी नजरों से।

ख्वाहिश तुझ संग सावन की झूलों के,
मांग सजी हों तेरी कुमकुम और सितारों से,
बिखरे होली के सत रंगी बहार तेरे आँचल के लहरों से।

हँस पड़ते हों मौसम तेरी मुस्कानों से,
बरसते हों रिमझिम सावन तेरे आ जाने से,
बसंती मौसम हों गुलजार आहट पे तेरे इन कदमों के।

तेरी बाहों के झूले में मेले हों जीवन के,
बाँट लेता तुझ संग मैं पल वो एकाकीपन के,
तुम जिक्र करती बारबार आँखों में फिर उन सपनों के।

पिरो लेता तेरे ही सपने अपनी नींदों में,
खोलता मैं आँखें, सामने तुम होती आँखों के,
जुल्फें लहराती हरबार तुम आ जाती सामने नजरों के।

लग जाते मेले फिर ख्वाहिशों के,
खिल आते बाग में दो फूल तेरे मेरे बचपन के,
कटते जीवन के दिन चार, रंग भरते तेरी ख्वाहिशों के।

सर्द खामोश सी ख्वाहिशें,सुलग उठी है फिर हलके से.....