Thursday, 24 May 2018

कहीं यूं ही

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही!

जा सावन ले आ, जा पर्वत से टकरा,
या बन जा घटा, नभ पर लहरा,
तेरे चलने में ही तेरा यौवन है,
यह यौवन तेरा कितना मनभावन है,
निष्प्राणों में प्राण तू फूंक यूं ही......

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही!

जा सागर से मिल, जा तू बूंदे भर ला,
प्यासी है ये नदियां, दो घूंट पिला,
सूखे झरनों को नव यौवन दे,
तप्त शिलाओं को सिक्त बूंदों से सहला,
बहता चल तू मौजों के साथ यूं ही....

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही!

या घटा घनघोर बन, या चित बहला,
कलियों से मिल, ये फूल खिला,
खेतों की इन गलियो से मिल,
सूखे फसलों को ये रस यौवन के पिला,
जीवन में जान जरा तू फूंक यूं ही.....

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही!

या बाहों में सिमट, आ मन को सहला,
सजनी की आँखों में ख्वाब जगा,
आँचल बन मन पर लहरा,
निराशा हर, आशा के कोई फूल खिला,
आँखों में सपने तू देता जा यूं ही....

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही!

Wednesday, 23 May 2018

झ॔झावात

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?

जीवन के ये झंझावात,
पल पल आँहों में, घिसते ये हालात,
अन्तर्मन में पिसती कोई बात,
धुन से भटकते ये साज.....
ऐसे में मन को कोई छू जाए,
दर्द दिलों के कम जाए,
धुन ऐसी ही कोई, सुना दे ना तू आज!

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?

कोई अपनों से हो नाराज,
मीठे से रिश्तों में भर जाए खटास,
नदारद हो मिश्री की मिठास,
ये मन रहता हो उदास.....
ऐसे में गीत मधुर कोई गाए,
स्वर लहरी सी लहराए,
सुर ऐसी ही कोई, सुना दे ना तू आज!

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?

सुरविहीन से ये अंधड़,
दिलों के अन्दर उतार गए ये खंजर,
सुख चैन कहाँ अब पल भर,
भावविहीन ये झंझावात....
ऐसे में स्पर्श कोई कर जाए,
भाव-प्रवण कर जाए,
गीत ऐसा ही कोई, सुना दे ना तू आज!

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?

चिंतित करते ये लम्हात,
ये जीवन के भयंकर से झंझावात,
ना ही सर पर हो कोई हाथ,
बेकाबू से हों हालात......
ऐसे में हाथ कोई रख जाए,
रौशन राह दिखा जाए,
राग कोई ऐसी ही, सुना दे ना तू आज!

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?

Sunday, 20 May 2018

स्वार्थ

शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं....

तेरी मोहक सी मुस्काहट में,
अपने चाहत की आहट सुनता हूं
तेरी अलसाए पलकों में,
सलोने जीवन के सपने बुनता हूं,
उलझता हूं गेसूओं में तेरे,
बाहों में जब भी तेरे होता हूं,
जी लेता हूं मैं तुझ संग,
यूं सपने जीवन के संजोता हूं,
हाँ तब भी, मैं अपना स्वार्थ ही देखता हूं!

कब पल-भर को भी मैं नि:स्वार्थ जीता हूं!

भीगे तेरे आँसू में
दामन भी मेरे,
छलनी मेरा हृदय भी
हुआ दर्द से तेरे,
डोर जीवन की मेरी
है साँसों में तेरे,
मेरी डोलती नैया
है हांथों में तेरे,
यही तो हैं स्वार्थ....
मै वश में जिनके रहता हूं...
फिर, कैसे हुआ मैं निःस्वार्थ...
हाँ इनमें भी, मैं अपना स्वार्थ ही देखता हूं!

कब पल-भर को भी, मैं नि:स्वार्थ जीता हूं!

कोई छोटी सी बात भी मेरी,
न बनती है बिन तेरे,
है तुझ पे ही पूर्णतः निर्भर,
मेरे जीवन के फेरे,
संतति को मेरी...
शरण मिली कोख में ही तेरे,
जीवन की इन राहों पर
इक पग भी
न चल पाया मैं बिन तेरे,
फिर, कहां हुआ मैं निःस्वार्थ,
हाँ अब भी, मैं अपना स्वार्थ ही देखता हूं!

कब पल-भर को भी मैं नि:स्वार्थ जीता हूं!

सब कहते हैं इसको ही प्यार....
पर, इसमें मैं अपने
स्वार्थ का संसार देखता हूं ....
बिल्कुल, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं....

(स्वार्थवश...., पत्नी को सप्रेम समर्पित)

Thursday, 17 May 2018

कोलाहल

वो चुप था कितना, जीवन की इस कोलाहल में!

सागर कितने ही, उसकी आँचल में,
बादल कितने ही, उस कंटक से जंगल में,
हैं बूंदे कितनी ही, उस काले बादल में,
फिर क्यूं ये विचलन, ये संशय पल-पल में!

वो चुप था कितना, शोर भरे इस कोलाहल में!

खामोश रहा वो, सागर की तट पर,
चुप्पी तोड़ती, उन लहरों की दस्तक पर,
हाहाकार मचाती, उनकी आहट पर,
सहज-सौम्य, सागर की अकुलाहट पर!

वो चुप था कितना, लहरों की इस कोलाहल में!

सुलगते जंगल की, इस दावानल में,
कलकल बहते, दरिया की इस हलचल में,
दहकते आग सी, इस मरुस्थल में,
पल-पल पग-पग डसती, इस दलदल में!

वो चुप था कितना, कितने ही ऐसे कोलाहल में!

था इक कण मात्र, वो इस सॄष्टि में,
ये कोलाहल कुछ ना थे उसकी दृष्टि में,
भीगा आपादमस्तक, वो अतिवृष्टि में,
चुपचाप रहा वो, इस जीवन की संपुष्टि में!

वो चुप था कितना, सृष्टि की इस कोलाहल में!

Tuesday, 15 May 2018

विसाल-ए-यार

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!

यूं बुन रहा हूं मैं ये ख्याल,
कभी तो मिल जाएगा विसाल-ए-यार,
होश में न रह पाएंगे हम,
वो कर जाएंगे हमें बेख्याल!

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!

है आफताब सा उनका नूर,
ढ़ला संगमरमर में है वो दीदार-ए-यार,
है उनसे ही तो ये रौशनी,
उनकी ही रंग से है ये गुलाल!

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!

है बला की उनकी सादगी,
है जेहन मे बस वो ही ख्याल-ए-यार,
झुकी हुई सी वो निगाह,
यूं ही जीना न कर दे मुहाल!

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!

यूं ही बुनता रहा मैं ख्याल,
यूं ही सपनों में बस विसाल-ए-यार,
शुकून उन्ही की वस्ल में,
है उन्ही में खोए हम बेख्याल!

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!

बेख्याल

यूं ही बेख्याल थे हम, किसी के ख्याल में,
कई ख्वाब देख डाले, हम यूं ही ख्वाब में........

वो रंग है या नूर है,
जो चढता ही जाए, ये वो सुरूर है,
हाँ, वो कुछ तो जरूर है!
यूं ही हमने देख डाले,
हाँ, कई रंग ख्वाब में!

यूं ही बेख्याल थे हम, किसी के ख्याल मे...

ये कैसे मैं भूल जाऊँ?
है बस ख्वाब वो, ये कैसे मान जाऊँ?
हाँ, कहीं वो मुझसे दूर है!
यूं ही उसने भेज डाले,
हाँ, कई खत ख्वाब में!

यूं ही बेख्याल थे हम, किसी के ख्याल मे...

है वो चेहरा या है शबनम!
हुए बेख्याल, बस यही सोचकर हम!
हाँ, वो कोई रंग बेमिसाल है!
यूं ही हमने रंग डाले,
हाँ, जिन्दगी सवाल में!

यूं ही बेख्याल थे हम, किसी के ख्याल में,
कई ख्वाब देख डाले, हम यूं ही ख्वाब में........

नए नग्मे

नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....

तुम हर पल यूं ही मुस्कुराओ,
तराने नए तुम बनाओ,
नए जिन्दगी की नई ताल पर,
झूमो यूं, मस्ती में आओ....

नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....

तुम बहारों के दामन में खेलो,
कलियो सी खिलखिलाओ,
चटक रंग की नई फूल सी तुम,
आंगन को मेरे सजाओ....

नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....

तुम वापस न जाने को आओ,
लौटकर फिर न जाओ,
कह दो जरा, के मेरे हो तुम,
सपनों को मेरे सजाओ....

नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....

Sunday, 13 May 2018

माँ कहती थी

मेरी माँ, मुझसे न जाने क्या-क्या कहती थी....

जब पाँवो पे झुलाती थी,
तो माँ कहती थी....

घुघुआ मनेरिया, अरवा चौर के ढेरिया,
ढेरिया उड़ियायल जाय,
कुतवा रगिदले जाय,
देखिहँ रे बुढिया,
हमर बेटा जाय छौ, हड़िया बर्तन फोरै ल,
नया घर लेम्हि कि पुराना घर?
नया घर उठे, पुराना घर गिरे!

जब संग खेला करती थी,
तो माँ कहती थी....

अत्ता पत्ता, बेटा के पाँच ठो बिटवा,
एगो गाय में, एगो भैंस में,
एगो लकड़ी में, एगो बकड़ी में,
एगो छकड़ी में.....
चौर चूड़ा खैले जाय, गुदुर गांय लगैले जाय...
और संग-संग हँस पड़ती थी माँ!

जब दूध पिलाती थी,
तो बड़े प्यार से माँ कहती थी....

चंदा मामा, आरे आबा बारे आबा,
नदिया किनारे आबा,
सोना के कटोरिया में, दूध-भात लेले आबा,
बऊआ के मुहमा में घुटूक....

जब रोटी खिलाती थी,
तो माँ कहती थी....

देखो देखो, वो कौआ रोटी लेकर भागा....
फिर निवाला मुह में रख देती,
कभी-कभी ये भी कहती कि....
थाली में खाना मत छोड़ना,
कहीं किसी दिन नाराज खाना, तुझे न छोड़ दे

जब सर में तेल लगाती थी,
तो माँ कहती थी....

तेलिया चुप चुप, माथा करे लुप लुप,
तेलवा चुअत जाय,
बेलवा माथा फूटत जाय.....

जब सुलाया करती थी,
तो माँ कहती थी.....

पलकों पे आ जा री निंदिया....
ओ नींदिया रानी तू ले चल वहाँ,
सपनों मे संग तेरे खेलेगा मेरा मुन्ना जहाँ.....

जब सपने में मैं राक्षस से डर जाता था,
तब सोने से पहले हिम्मत देकर
इक मंत्र पढने को समझाती
और रोज ही सिखाती माँ कहती थी......

हिमालस्य उत्तरे देशे, कर्कटी नाम राक्षसी,
तस्य स्मरण मात्रेण, दुः स्वप्नः न जायते.......
फिर क्या था, मै बलशाली बन जाता था,
सपने में उस राक्षस से लड़ जाता था....

जब पूजा करवाती थी,
तो माँ कहती थी.....

नमामि शमीशां निर्वाण रूपम.....
विद्या दीजिए, बल दीजिए, बुद्धि दीजिए....
हाथ फेरकर सर पर,
बलाएँ सब अपने सर लेती थी,
मन ही मन कुछ बुदबुदाती थी फिर माँ...

मेरी माँ मुझसे न जाने क्या-क्या कहती थी....
समझाती थी यदा कदा....
मीठी-मीठी बातों से बचना जरा,
दुनियाँ के लोगों में है जादू भरा.....

मातृ-दिवस (13 मई) की शुभकामनाओं सहित

समग्रता की तलाश

समग्रता की तलाश में, व्यग्र यहाँ हर कोई,
भटक रहा है मन, एकाग्रता है खोई......

बस पा लेने को दो जून की रोटी,
कोई जप रहा है कहीं राम-नाम,
कोई बस बेचता है यूं ईश्वर की मूर्ति,
कोई धर्म को बेचते हैं सरेआम,
दिलों में धर्मांधता की सेंकते है रोटी!

कोई मंदिर में हरदिन माथा टिकाए,
कर्म से विमुख, दूर साधना से,
तलाशता है वहाँ, कोई मन की शांति,
धोए है तन को डुबकी लगाकर,
मन के मैल मन में ही रखकर छुपाए!

भौतिक सुखों की झूठी लालसा में,
नैतिकता से है हरपल विमुख,
अग्रसर है बौद्धिक हनन की राह पर,
चारित्रिक पतन की मार्ग पर,
वो खोए है विलासिता की कामना में!

बदली हुई है समग्रता की परिभाषा,
निज-लाभ हेतु है ये एकाग्रता,
मन रमा है काम, क्रोध,मद,मोह में,
समग्र व्यसन के ऊहापोह में,
व्यग्र हुई काम-वासना की पिपाषा!

समग्रता की तलाश में, व्यग्र यहाँ हर कोई,
भटक रहा है मन, एकाग्रता है खोई......

ले गया चैन कोई

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....

वो जो कहते थे, बस हम है तुम्हारे,
सिर्फ हम थे कभी, जिनकी आँखों के तारे,
करार वो ही मन के, ले गए हैं सारे,
इन बेकरारियों में जीवन, कोई कैसे गुजारे?

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....

चीज अनमोल ये, मैं कहाँ से पाऊँ,
चैन! वस्तु नहीं कोई, जो मैं खरीद लाऊँ,
पर जिद्दी ये मन मेरा, इसे कैसे बताऊँ,
छीना है जिसने करार, मन उसे ही पुकारे!

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....

कोई पुतला नहीं, इक जीव हूं संजीदा,
उमरती हैं भावनाएँ, न ही इसे हमने खरीदा,
वश भावनाओं पर, कहाँ है किसी का?
इन्हीं भावनाओं के हाथो, ये मन बिका रे!

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....

सोचा था, न जाऊंगा मैं फिर उस तरफ,
कदमताल करता है मन, हरदम उसी तरफ,
कदमों को रोककर, समझाता हूं मैं,
मगर वश में मेरा मन, अब रहा ही कहाँ रे!

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....

Saturday, 12 May 2018

इच्छाओं के पंछी

इच्छाओं के प॔छी यूं ही उड़ते हैं पंख पसारे!
कब साकार हुए है स्वप्न सारे......?

कभी आकाश नही मिलता इच्छाओं  को,
कभी कम पड़ता हैं आकाश, इन्हे उड़ पाने को,
काश! न होते इन जागी इच्छाओं  के पर,
काश! न जगते रातों में ये स्वप्न हमारे...

अचेतन मन में, दफ्न हुए ये स्वप्न सारे...!

इच्छाओं के बिन, लक्ष्यविहीन ये जीवन,
इच्छाओं के संग, तिल-तिल जलता ये जीवन,
है रक्तविहीन, ये अपूरित इच्छाओं के घर,
काश! न मरते रातों में ये स्वप्न हमारे....

जागी आँखों में, दफ्न हुए ये स्वप्न सारे...!

हैं गिनती की साँसें, हैं गिनती की रातें,
क्यूं बस ऐसे ही स्वप्नों में, हम ये रात बिता दें?
क्यूं न इन साँसों को हम सीमित इच्छा दें,
काश! यूं सजते रातों में ये स्वप्न हमारे....

इन आँखों में, साकार होते ये स्वप्न सारे...!

ना ही खिल पाते है, हर डाली पर फूल,
ना ही बूंद भरे होते हैं हर बादल में,
हर जीवन का होता है अपना ही इक अंत,
काश! ना जलते अनंत इच्छाओं के तारे.....

मगर, इच्छाओं के प॔छी, उड़ते हैं पंख पसारे!
कब साकार हुए है स्वप्न सारे......?

क्या हो तुम

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

क्यूं मैं हूं, इक तुम्हारे ही आस में?
कभी कुछ पल जो आओ अंकपाश में,
बना लूं वो ही लम्हा खास मैं,
भूल जाऊँ मैं खुद को, कुछ पल तुम्हारे साथ में...

हो सुबह या सघन रात हो,
सांझ हो या प्रभात हो,
धूप या बरसात हो,
या चुप सी कोई बात हो,
जो भी हो, तुम लाजबाब हो...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

हो बेहोश या मदहोश हो,
मूरत सी खामोश हो,
चटकती कली हो,
या बंद लफ्जों में ढली हो,
जो भी हो, तुम लाजबाब हो...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

यूं जेहन में आ बसी हो,
खुश्बुओं में रची हो,
या रंगों में ढ़ली हो,
क्या बस इक ख्वाब हो,
जो भी हो, तुम लाजवाब हो...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

तन्हा पलों की संगिनी हो,
जैसे कोई रागिनी हो,
कूक कोयल की हो,
दूर से आती आवाज हो,
जो भी हो, तुम लाजवाब हो...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

स्नेह की कोई लड़ी हो,
या चहकती सी परी हो,
सहज हो शील हो,
या खुदा का आब हो,
जो भी हो, तुम लाजबाब हो...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

क्यूं मैं हूं, इक तुम्हारे ही आस में?
कभी कुछ पल जो आओ अंकपाश में,
बना लूं वो ही लम्हा खास मैं,
भूल जाऊँ मैं खुद को, कुछ पल तुम्हारे साथ में...

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....

Friday, 11 May 2018

भोर की पहली किरण

यूं अंगड़ाई लेकर उठी ये भोर की पहली किरण!

घुल गई है रंग जैसे बादलों में,
सिमट रही है चटक रंग किसी के आँचलों में,
विहँसती खिल रही ये सारी कलियाँ,
डाल पर डोलती हैं मगन ये तितलियाँ,
प्रखर शतदल हुए हैं अब मुखर,
झूमते ये पात-पात खोए हुए हैं परस्पर,
फिजाओं में ताजगी भर रही है पवन!

यूं अंगड़ाई लेकर उठी ये भोर की पहली किरण!

निखर उठी है ये धरा सादगी में,
मन को लग गए हैं पंख यूं ही आवारगी में,
चहकने लगी है जागकर ये पंछियाँ,
हवाओं में उड़ चली है न जाने ये कहाँ,
गुलजार होने लगी ये विरान राहें,
बेजार सा मन, अब भरने लगा है आहें,
फिर से चंचल होने लगा है ये पवन!

यूं अंगड़ाई लेकर उठी ये भोर की पहली किरण!

गूंज सी कोई उठी है विरानियों में,
गीत कोई गाने लगा है कहीं रानाईयों में,
संगीत लेकर आई ये राग बसंत,
इस विहाग का न आदि है न कोई अंत,
खुद ही बजने लगे हैं ढोल तासे,
मन मयूरा न जाने किस धुन पे नाचे,
रागमय हुआ है फिर से ये भवन!

यूं अंगड़ाई लेकर उठी ये भोर की पहली किरण!

Thursday, 10 May 2018

ओ बाबुल

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...

कोई नन्ही कली सी, मैं तो थी खिली,
तेरे ही आंगन तो मैं थी पली,
चहकती थी मै, तेरा स्नेह पाकर,
फुदकती थी मैं, तेरे गोद में आकर,
वही ऐतबार, तु मेरा देना मुझे!

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...

स्नेहिल स्पर्श, तुने ही दिया था मुझे,
प्रथम पग तूने ही सिखाया मुझे,
अक्षर प्रथम तुझसे ही मैं थी पढी,
शीतल बयार सी मै तेरे ही आंगन बही,
स्नेह का फुहार, वही देना मुझे!

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...

बरखा बहार मैं, थी मेघा मल्हार मैं,
हर बार पाई तेरा दुलार मैं,
अब जाऊंगी कहाँ उस पार मैं,
न अलविदा तेरे मन से है होना मुझे,
विदाई का उपहार, यही देना मुझे!

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...

मैं हूं विश्रंभी, तू मेरा ऐतबार रखना,
विश्वास का मेरे है तू ही गहना,
भूलूंगी ना मैं, तुझे अन्तिम घड़ी तक,
मिलने को आऊंगी, मैं तेरी देहरी तक,
मोह का संसार, यही देना मुझे!

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...

Tuesday, 8 May 2018

सम्मोहन

हो बिन देखे ही जब भावों का संप्रेषण,
उत्सुक सा रहता हो जब-तब ये मन,
कोई संशय मन को तड़पाताा हो हर क्षण,
पल पल फिर बढता है ये सम्मोहन....

ये सम्मोहन के अनदेखे मंडराते से घन,
नभ पर घनन-घनन गरजाते ये घन,
शायद उन नैनों के तट से आए है ये घन,
निष्ठुर कितना है ये प्रश्नमय संप्रेषण.....

भावों का ये प्रश्नमय अन्जाना संप्रेषण,
अनुत्तरित प्रश्नों में उलझा ये प्रश्न,
इन अनसुलझे प्रश्नो से भरमाया है मन,
ओ अपरिचित, ये कैसा है सम्मोहन....

शायद ये किसी विधुवदनी का आवेदन,
या हो यह विधुलेखा का सम्मोहन,
सम्मोहित करती हो शायद वो विधुकिरण,
ओ विधुवदनी,ये कैसा है सम्मोहन....

ओ मन रजनी, विधुवदनी ओ विधुलेखा,
ओ साजन, ओ अन्जाना, अनदेखा,
मन की भावो में लिपटा ये भावुक संप्रेषण,
पल पल बढ़ता ये तेरा है सम्मोहन....

Friday, 27 April 2018

अस्तित्व

कैसे भूलूं कि तेरे उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....

शायद! इक भूल ही थी वो मेरी!
सोचता था कि मैं जानता हूँ खूब तुमको,
पर कुछ भी बाकी न अब कहने को,
न सुनने को ही कुछ अब रह गया है जब,
लौट आया हूँ मैं अपने घर को अब!

पर कैसे भूलूं कि उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....

शायद! यूँ ही थी वो मुस्कराहटें!
खिल आई थी जो अचानक उन होंठो पे,
कुछ सदाएँ गूँजे थे यूँ ही कानों में,
याद करने को न शेष कुछ भी रह गया है जब,
क्या पता तुम कहाँ और मैं कहाँ हूँ अब!

पर कैसे भूलूं कि उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....

शायद! वो एक सुंदर सपन हो मेरा!
जरा सा छू देने से, कांपती थी तुम्हारी काया  ,
एक स्पंदन से निखरता था व्यक्तित्व मेरा,
स्थूल सा हो चुका है अंग-प्रत्यंग देह का जब,
जग चुका मैं उस मीठी नींद से अब!

पर कैसे भूलूं कि उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....

शायद! गुम गई हों याददाश्त मेरी!
या फिर! शब्दों में मेरे न रह गई हो वो कशिश,
या दूर चलते हुए, विरानों में आ फसे हैं हम,
या विशाल जंगल, जहाँ धूप भी न आती हो अब,
शून्य की ओर मन ये देखता है अब!

पर कैसे भूलूं कि उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....

शायद! छू लें कभी उस एहसास को हम!
पर भूल जाना तुम, वो शिकवे- शिकायतों के पल....
याद रखना तुम, बस मिलन के वो दो पल,
जिसमें विदाई का शब्द हमने नहीं लिखे थे तब,
दफनाया है खुद को मैने वहीं पे अब!

पर कैसे भूलूं कि उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....
मगर अब, भूल जाना तुम, वो इबादतों के पल....

Monday, 23 April 2018

माँ शारदे

हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!
टूटे मन की इस वीणा को तू झंकार दे....
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

हम खोए है अंधकार में,
अज्ञानता के तिमिर संसार में,
तू ज्ञान की लौ जला,
भूला हुआ हूं, राह कोई तो दिखा,
मन मे प्रकाश का मशाल दे,
मुझे ज्ञान की उजियार का उपहार दे....
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

भटके है स्वर इस कंठ में,
न ही सुर कोई मेरे कुहुकंठ में,
तू सुर की नई सी तान दे,
बेस्वर सा हॣं नया कोई इक गान दे,
तू स्वर का मुझको ज्ञान दे,
सप्त सुरों की अनुराग का उपहार दे....
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

जीवन के इस आरोह मे,
डूबे रहे हम काम मद मोह में,
तू प्रखर मेरे विवेक कर,
इक नव विहान का अभिषेक कर,
तू नव उच्चारित आरोह दे,
मेरे अवरोह में सम्मान का उपहार दे.....
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

बुझता हुआ इक दीप मैं,
प्रभाविहीन सा इक संदीप मैं,
तू प्रभा को प्रभात दे,
बुझते दिए की लौ को प्रसार दे,
आलोकित सा विहान दे,
प्रभाविहीन मन में प्रभा का उपहार दे...
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!
टूटे मन की इस वीणा को तू झंकार दे....
हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...

Friday, 6 April 2018

रहस्य

दो नैनों के सागर में, रहस्य कई इस गागर में.....

सुख में सजल, दुःख में ये विह्वल,
यूं ही कभी खिल आते हैं बन के कँवल,
शर्मीली से नैनों में कहीं दुल्हनं की,
निश्छल प्रेम की अभिलाषा इन नैनों की....

तिलिस्म जीवन की, छुपी कहीं इस गागर में...

ये काजल है या है नैनों में बादल,
शायद फैलाए है मेघों ने अपने आँचल,
चंचल सी चितवन, कजरारे नैनों की,
ईशारे ये मनमोहक, इन प्यारे से नैनों की....

है डूबे चुके कितने ही, इस बेपनाह सागर में.....

पल में ये गजल, पल में ये सजल,
हर इक पल में खुलती है ये रंग बदल,
कहती कितनी ही बातें अनकही,
रंग बदलती चुलबुल सी भाषा नैनों की....

अनबुझ बातें कई, रहस्य बनी इस सागर में....

Tuesday, 3 April 2018

ढ़हती मर्यादाएँ

ढ़हती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!

चलते रहे दो समानान्तर पटरियों पर,
इन्सानी कृत्य और उनके विचार,
लुटती रही अनमोल विरासतें और धरोहर,
सभ्यताओं पर हुए जानलेवा प्रहार!

ढहती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!

कथनी करनी हो रहे विमुख परस्पर,
वाचसा कर्मणा के मध्य ये अन्तर,
उच्च मानदंडों का हो रहा खोखला प्रचार,
टूटती रही मान्यताओं की ये मीनार!

ढहती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!

करते रहे वो मानदण्डों का उल्लंघन,
भूल गए है छोटे-बड़ों का अन्तर,
न रिश्तों की है गरिमा, न रहा लोकलाज,
मर्यादा का आँचल होता रहा शर्मसार!

ढहती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!

कर्म-रहित, दिशाविहीन सी ये धाराएँ,
कहीं टूटती बिखरती ये आशाएँ,
काल के गर्त मे समाते मूल्यवान धरोहर,
धूलधुसरित होते रहे मन के सुविचार!

ढहती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!

Sunday, 1 April 2018

दंगा

अब क्या हुआ जो मुझको कुछ भी भाता नही!
क्युं इस गली अब कोई आता नही?

वो कहते हैं कि हुए थे दंगे!
दो रोटी को जब लड़ बैठे थे दो भूखे नंगे....
अब तक है वो दोनो ही भूखे!
है कौन उसे जो देखे?
भूख से ऐंठती विलखती पेट पकड़ कर,
संग देख रहे थे वो भी दंगे!
बस उन दंगो से, था उनका कोई नाता नहीं!
क्यूं उस पेट की...
जलती आग बुझाने कोई आता नही!

अब क्या हुआ जो मुझको कुछ भी भाता नही!

ये दंगे तो यूं ही भड़केगे,
जब तक भूख, गरीबी से हम तड़पेंगे!
दिग्भ्रमित करेंगें ये धर्म के नारे,
शर्मसार करेगे ये हमको खुद अपनी नजरों में,
जवाब खुद को हम क्या देंगे?
छल, कपट, वैर, घृणा, वैमनस्य के ये बीज,
क्या अपनी हाथों खुद हम बोएंगे?
क्यूं ये वैर भाव....
ये द्वेष मन से मिटाने कोई आता नही?

अब क्या हुआ जो मुझको कुछ भी भाता नही!

कश! अलग-अलग न होते,
ये मंदिर, ये मस्जिद, ये गिरिजाघर,
काश एक होता ईश्वर का घर,
एक होती साधना, एक ही होती भावना,
कहर दंगों का न हम झेलते,
लहू में धर्मान्धता के जहर न फैलते,
पीढ़ियाँ मुक्त होती इस श्राप से...
क्यू इस श्राप से...
जीवन मुक्त कराने कोई आता नहीं?

अब क्या हुआ जो मुझको कुछ भी भाता नही!
क्युं इस गली अब कोई आता नही?

बिखरी लाली

चलों चुन लाएं, क्षितिज से वो बिखरी लाली.....

श्रृंगकिरणों ने पट खोले हैं,
घूंधट के पट नटखट नभ ने खोले हैं,
बिखर गई है नभ पर लाली,
निखर उठी है क्षितिज की आभा,
निस्तेज हुए है अंधियारे,
वो चमक रही किरणों की बाली!

चलों चुन लाएं, क्षितिज से वो बिखरी लाली.....

श्रृंगार कर रही है प्रकृति,
किरणों की आभा पर झूमती संसृति,
मोहक रंगो संग हो ली,
सिंदूरी स्वप्न के ख्वाब नए लेकर,
नव उमंग नव प्राण लेकर,
खेलती नित नव रंगो की नव होली!

चलों चुन लाएं, क्षितिज से वो बिखरी लाली.....

खेलती है लहरों पर किरणें,
या लहरों से कुछ बोलती हैं किरणें!
आ सुन ले इनकी बोली,
झिलमिल रंगों की ये बारात लेकर,
मीठी सी ये बात लेकर,
चल उस ओर चलें संग आलि!

चलों चुन लाएं, क्षितिज से वो बिखरी लाली.....

Friday, 30 March 2018

किसलय

नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...

नव आशा के निलय से,
झांक रही वो कोमल किसलय,
इक नई दशा, इक नई दिशा,
करवट लेती इक नई उमंग का,
नित दे रही ये आशय....

नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...

कोमल सी इन कलियों में,
जन्म ले रहा इक जीवट जीवन,
बाधाओं को भी कर बाधित,
प्रतिकूल स्थिति को अनूकूल कर,
जिएंगी ये बिन संशय....

नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...

पंखुड़ियों पर ही खेलती,
प्रचन्ड रवि की ये उष्मा झेलती,
स्वयं नव ऊर्जा संचित कर,
जीने के ये खुद मार्ग प्रशस्त करती,
सुकोमल से ये किसलय....

नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...

सिमटते एहसास

कुछ तो है! जिसमें हर पल घिरा हैं ये मन .....

है क्या ऐसी बात?
हरा भरा सा है मन का ये आंगन,
कहीं बजने लगती है संगीत,
गूंज उठती है मन की ये सूनी वादी,
कलरव करते ये विहग....
खुला-खुला सा ये विस्तृत आकाश,
उड़ने को आकुल ये मन,
कुछ हलकी बूंदो से बस भीगा है ये तन,
पर लगता है, गहराया है ये सावन....

कुछ तो है! जिसमें हर पल घिरा हैं ये मन .....

जैसे पुकारता हो कोई!
कहीं फैलाया हों किसी ने दामन,
इन्तजार में कहीं सूना हो कोई आंगन,
सूना हो बाहों का आलिंगन,
एकटक देखती हो राहें,
नींद में ढ़लकी सी बेजार हो आँखें,
अधखुले से हों जैसे नयन,
सम्हाले हाथों में आँचल का दामन,
निढ़ाल हो चुका हो जैसे ये तन....

कुछ तो है! जिसमें हर पल घिरा हैं ये मन .....

जैसे सिमटे हों एहसास!
कोई फूल खिला हो मन के आंगन,
बिखरे हों रंग जमी पर,
समाया हो सागर में नीला आकाश,
उतरा हो बादल मन की जमीं पर,
गीला हो मन का आंगन,
फिसलते हों पाँव यहीं पर,
चुप हो ये जुबाँ बस बोलता हो मन,
सिमटते एहसासों में हो मगन.....

कुछ तो है! जिसमें हर पल घिरा हैं ये मन .....

Wednesday, 28 March 2018

भावनाओं के भँवर

ये आकर फसे हैं हम कहाँ.......
भावनाओं के भँवर में,
यातनाओं के इस सफर में,
रात मे या दोपहर में....

खुश कितने ही थे हम यहाँ......
प्रस्फुटित हुई जब भावना,
मोह वही दे रही ये प्रताड़ना,
मन के इस खंडहर में.....

कलपते रहे जब तक यहाँ......
पुलकित हुई ये भावना,
सैलाब है अब आँसुओं का,
हम फसे उसी भँवर में......

यातनाओं का ये कहर यहाँ....
देती रहेगी ये भावना,
मुखरित होती है ये और भी,
विछोह हो जब सफर मे......

ये विदाई के तमाम पल यहाँ....
भावनाए होती है जवाँ,
तब विलखते हैं हम यातना में,
खुशियों के इसी शहर में....

ये आकर फसे हैं हम कहाँ.......
भावनाओं के भँवर में,
यातनाओं के इस सफर में,
रात मे या दोपहर में....

Tuesday, 27 March 2018

भावना या यातना

तुम बहाओ ना मुझे, फिर उसी भावना में.....

ठहर जाओ, न गीत ऐसे गाओ तुम,
रुक भी जाओ, प्रणय पीर ना सुनाओ तुम,
जी न पाऊँगा मैं, कभी इस यातना में....

न सुन सकूंगा, मैं तुम्हारी ये व्यथा!
फिर से प्रणय के टूटने की व्याकुल कथा,
टूट मैं ही न जाऊँ, कहीं इस यातना में....

यूं इक-इक दल, बिखरते हैं फूल से,
आह तक न भरते है, वो लबों पे भूल से,
यूं ना डुबोओ, तुम मुझे यूं भावना मे....

यूं दर्द के साज, क्यूं बजा रहे हो तुम,
सो चुके हम चैन से, क्यूं जगा रहे हो तुम,
चैन खो न जाए मेरा, इस यातना में.....

हाल पे मेरी, जरा तरस खाओ तुम...
भावना या यातना! ये मुझको बताओ तुम,
गुजरा हूं मैं भी, कभी इस यातना मे.....

बह न जाऊँ मैं, कहीं फिर उसी भावना में......

Saturday, 24 March 2018

कशमकश

न जाने, दर्द का कौन सा शहर है अन्दर,
लिखता हूं गीत, तो आँखें रीत जाती हैं,
कहता हूं गजल, तो आँखें सजल हो जाती हैं...

ये कशमकश का, कौन सा दौर है अन्दर,
देखता हूं तुम्हें, तो आँखे भीग जाती हैं,
सोचता हूं तुम्हें, तो आँखें मचल सी जाती हैं...

इक रेगिस्तान सा है, मेरे मन का शहर,
ये विरानियाँ, इक तुझे ही बुलाती है,
तू मृगमरीचिका सी, बस तृष्णा बढाती है...

ये कशमकश है कैसी, ये कैसा है मंजर,
जो देखू दूर तक, तू ही नजर आती है,
जो छूता हूं तुम्हें, सायों सी फिसल जाती है...

न जाने, अब किन गर्दिशों का है कहर,
पहर दो पहर, यादों में बीत जाती है,
ये तन्हाई मेरी, कोई गजल सी बन जाती है....

Thursday, 22 March 2018

चुप्पी! बोलती खामोशी...

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....

चुप्पी तोड़ती हुई इक खामोशी,
बंद लफ्जों की वो सरगोशी,
वो नजरों की भाषा में चिल्लाना,
दूर रहकर भी पास आ जाना,
खामोशी का वो इक चुप सा तराना...

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....

चुप-चुप सा था, वो इक पर्वत,
बड़ी गहरी थी वो खामोशी,
वो खामोशियों में कुछ बुदबुदाना,
यूं चुपचाप ही कहते जाना,
उस ओर कदमों का यूं मचल जाना....

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....

बादलों की, वो बोलती खामोशी,
बरस गई जब वो जरा सी,
बूंदों का यूं फिर जमी पर बिखरना,
यूं ही तब चेहरों का भिगोना,
चुपचाप लय में बरसात की हो लेना....

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....

चुप कहां थी, ये बहती हवा भी,
चली वो भी आँचल उड़ाती,
गेसूओं का फिर हवाओं में लहराना,
सिहरन बदन में भर जाना,
बहती हवा संग, झूलों सा झूल जाना....

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....

बोलती बहुत है, ये खामोशियाँ,
चुप्पी तोड़ती है इनकी जुबां,
यूं ही तन्हाईयों का कहीं गुनगुनाना,
खामोश सा वो ही तराना,
तन्हा वादियों में, खूद को भूल जाना....

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....
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Wednesday, 21 March 2018

चुप क्यूं हैं सारे?

लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे?

जब लुटती है अस्मत अबला की,
सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ,
बिलखता है नारी सम्मान,
तार तार होता है समाज का कोख,
अधिकार टंग जाते हैं ताख पर,
विस्तृत होती है असमानताएँ...
ये सामाजिक विषमताएँ....
बहुप्रचारित बस तब होते हैं ये नारे...

वर्ना, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे?

जब बेटी चढती हैं बलि दहेज की,
बदनाम होते है रिश्तों के कोमल धागे,
टूटता है नारी का अभिमान,
जार-जार होता है पुरुष का साख,
पुरुषत्व लग जाता है दाँव पर,
दहेज रुपी ये विसंगतियाँ....
ये सामजिक कुरीतियाँ...
समाज-सुधारकों के बस हैं ये नारे...

शेष, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे?

जब होती है भ्रुणहत्या बेटियों की,
निरपराध सुनाई जाती हैं सजाए मौत,,
अजन्मी सी वो नन्ही जान,
वो जताए भी कैसे अपना विरोध,
हतप्रभ है वो ऐसी सोंच पर,
सफेदपोशों का ये कृतघ्न.....
ये अपराध जघन्य....
नारी भ्रुणहत्या अक्षम्य, के बस हैं नारे...

शेष, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे?

( विश्व कविता दिवस 21 मार्च पर विशेष - बेटियों को समर्पित मेरी रचना, सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध एक अलख जगाने की मेरी कोशिश)

Tuesday, 20 March 2018

संशय

कुछ पूछे बिन लौट आता है, मन बार-बार....

पलते हैं इस मन शंका हजार,
मन को घेरे हैं संशय, कर लेता हूं विचार!
क्या सोचेंगे वो! क्या समझेंगे वो? 
क्या होगा उनका व्यवहार?
गर, मन की वो बातें, रख दूं उतार!
फिर, लाखों संशय से मन घिर जाता है!
डरता है, घबराता है, सकुचाता है.....
जाता है उन राहों पे हर-बार....

कुछ पूछे बिन लौट आता है, मन बार-बार....

फिर करता हूं मन को तैयार,
संशय में जीता, संशय में मरता हूं यार?
क्या संशय में मिल पाएंगे वो?
क्या यह संशय है बेकार?
या त्याग दूं संशय, हो जाऊँ बेजार!
फिर, संशय की बूंदों से मन घिर जाता है!
भीगता है, रुकता है, फिर चलता है...
जाता है भीगी राहों पे हर-बार....

कुछ पूछे बिन लौट आता है, मन बार-बार....

Sunday, 18 March 2018

अधलिखा अफसाना

बंद पलकों तले, ढ़ूंढ़ता हूं वही छाँव मैं...
कुछ देर रुका था जहाँ, देखकर इक गाँव मैं....

अधलिखा सा इक अफसाना,
ख्वाब वो ही पुराना,
यूं छन से तेरा आ जाना,
ज्यूं क्षितिज पर रंग उभर आना..
और फिर....
फिजाओं में संगीत,
गूंजते गीत,
सुबह की शीत,
घटाओं का उड़ता आँचल,
हवाओं में घुलता इत्र,
पंछियों की चहक,
इक अनोखी सी महक,
चूड़ियों की खनक,
पत्तियों की सरसराहट,
फिर तुम्हारे आने की आहट,
कोई घबराहट,
काँपता मन,
सिहरता ये बदन,
इक अगन,
सुई सी चुभन,
फिर पायलों की वही छन-छन,
वो तुम्हारा पास आना,
वो मुस्कुराना,
शर्म से बलखाना,
वो अंकपाश में समाना,
वापस फिर न जाना,
मन में समाना,
अहसास कोई लिख जाना,
है अधलिखा सा इक वो ही अफसाना....

बंद पलकों तले, ढ़ूंढ़ता हूं वही छाँव मैं...
कुछ देर रुका था जहाँ, देखकर इक गाँव मैं....

Saturday, 17 March 2018

टेढ़े मेढ़े मेड़ - खंड खंड भूखंड

खंड-खंड खेतों को बांटते ये टेढ़े-मेढ़े मेड़...

टेढी मेढ़ी लकीेरों से पटी ये धरती,
जैसे विषधर लेटी हो धरती के सीने पर,
चीर दिया हों सीना किसी ने,
चली हो निरंकुश स्वार्थ की तलवार, 
खंड खंड होते ये बेजुबान भूखंड.....

मानसिकता के परिचायक ये टेढ़े-मेढ़े मेड़...

ये तेरा, ये मेरा, ये खंड खंड बसेरा,
ये लालसा ये पिपासा, ये स्वार्थ का डेरा,
ये संकुचित होती मानसिकता,
ये सिमटते से रिश्तों का छोटा संसार,
ये खंड खंड हुए बिलखते भूखंड.....

खंड-खंड रिश्तों को बांटते ये टेढ़े-मेढ़े मेड़...

वाद-विवाद, रिश्तों में आई खटास, 
मन की भूखंड पर पनपते ये विषाद वॄक्ष,
अपनो के लहू से रंगे ये हाथ,
टेढे मेढे मेडों पर सरकता काला नाग!
यूं खंड खंड होते रिश्तों के भूखंड.....

खंड-खंड जीवन को करते ये टेढ़े-मेढ़े मेड़...

गर होते ये मेड़ संस्कारों के,
कुसंस्कार प्रविष्ट न हो पाते जीवन में,
पनपते कुलीन विचार मन में,
मेड़ ज्ञान की दूर करती अज्ञानता,
स्वार्थ हेतु खंड खंड न होते ये भूखंड....

काश! निश्छल मन को न बांटते ये टेढ़े मेढ़े मेड़....

तारे चुरा ले गया कोई

उनींदी रातों से, झिलमिल तारे चुरा ले गया कोई!

तमस भरी काली रातों में,
कुछ तारे थे दामन मे रातों के,
निशा प्रहर, सहमी सी रात,
छुप बैठी वो, दामन में तारों के,
भुक-भुक जलते वो तारे,
रातों के प्यारे वो सारे,
अलसाए से कुछ थके हारे,
निस्तब्ध रातो की, बाहों में खो गई......

उनींदी रातों से, वो ही तारे चुरा ले गया कोई!

फिर टूटी रातों की तन्द्रा,
अंधियारों में तम की वो घिरा!
तारों की गम में वो रहा,
किससे पूछे वो, तारों का पता?
अब कौन बताए, कहां गए वो तारे?
खुद में खोए निशाचर सारे!
मदमाए से फिरते वो मारे-मारे,
तम की पीड़ा का, न था अन्त कोई....

तम की रातों से, क्युं तारे चुरा ले गया कोई!

टिमटिम जलती वो आशा!
इक उम्मीद, टूट गई थी सहसा!
व्याप्त हुई थी खामोशी,
सहमी सी वो, सिहर गई जरा सी!
दामन आशा का फिर फैलाकर,
लेकर संग कुछ निशाचर,
तम की राहों से गुजरे वो सारे,
उम्मीद की लड़ी, फिर जुड़ सी गई.....

इन रातों से, वो टिमटिम तारे न चुराए कोई!

Friday, 16 March 2018

पन्नों के परे

इक जीवन, इक पन्नों में, इक पन्नों के परे.....

कुछ शब्दों में अंकित पन्नों में गरे,
भावनाओं से उभर कर स्याही में लिपटे,
कल्पनाओं के रंगों से सँवरे,
बेजान, मगर हरदम जीवंत और ज्वलंत,
जज्बातों के कुलांचे भरते,
अनुभव के फरेब या हकीकत?
पन्नों पे गरे, शब्दों के ये खेत हरे भरे!

इक जीवन, इक पन्नों में, इक पन्नों के परे.....

इक इक शब्द, नेह-स्नेह से भरे,
सपनों के सतरंगी आसमान पर उड़ते,
नभ पर बिंदास पंख फैलाए,
मानो रच रहे कल्पना का नया आकाश,
अविश्वसनीय संरचना रचते,
या चक्रव्युह कोई खुद में भ्रमित!
पन्नों के परे! ये शब्दों के जंगल हरे भरे!

इक जीवन, इक पन्नों में, इक पन्नों के परे.....

किरदार कई इन पन्नों पर गढ़े,
एकसाथ विपरीत विचारधाराओं की पृष्ठें,
शक्ल इक किताब की लिए,
विचारधाराओं की संगम का आभास,
कोई नवधारा बनकर बहते,
या आपस मे लड़ते होते मूर्छित?
पन्नों के परे! ये व्यथा विन्यास हरे भरे!

इक जीवन, इक पन्नों में, इक पन्नों के परे.....

Thursday, 15 March 2018

गुमसुम

हो कहाँ गुमसुम, किस विक्षोभ के घर!

न ही हृदय में आह के स्वर,
न ही भाव में पलते प्रवाह के ज्वर,
निस्तेज पड़ी मुख की आभा,
बुझी सी है वो तेज प्रखर.....

हो कहाँ गुमसुम, किस विक्षोभ के घर!

मन के भीतर कैसा उद्वेलन?
अपने ही मन से कैसा निराश प्रश्न?
उद्वेलित साँसों में कैसा जीवन?
विक्षोभित ये हृदय के स्वर....

हो कहाँ गुमसुम, किस विक्षोभ के घर!

नयन में ताराविहीन गगन,
साँसों के प्रवाह में उठती ये लपटें,
अगन के प्रदाह में जलता मन,
क॔पकपाते से ये तेरे स्वर....

हो कहाँ गुमसुम, किस विक्षोभ के घर....

इसी शहर से

ठहरकर इसी शहर से हम गुजर जाते हैं...

ये तमाम रास्ते, कहीं दूर शहर से जाते हैं...
पर मेरे वास्ते, ये बंद नजर आते है!
किसी मोहपाश में हम यहाँ बंधे जाते हैं,
यूं शहर की धूल में बिखर जाते हैं?

हम न शीशा कोई ,जो पल में टूट जाते हैं...
फिसलकर हाथ से जो छूट जाते हैं!
हैं वही सोना, जो तपकर निखर जाते हैं,
जलकर आग में भी सँवर जाते हैं!

शहर की शुष्क आवोहवा बदल जाते है...
यूं खुश्बू की तरह यहाँ बिखर जाते हैं!
गर्मियों में फुहार बनकर बरस जाते है,
हम शहर के रहगुजर बन जाते हैं!

ठहरकर इसी शहर से हम गुजर जाते हैं...
भले ही हमसफर न कोई हम पाते हैं!
यूं बार-बार इस दिल को हम समझाते हैं,
फिर न जाने हम खुद बहक जाते हैं?

ठहरकर इसी शहर से हम गुजर जाते हैं...

Tuesday, 13 March 2018

इस शहर में

इस शहर में, कम ही लोग बोलते हैं...

चुप ही चुप, खामोशियों को तोलते हैं,
न जाने क्यों, कम ही लोग बोलते हैं...

वो गूंगे हैं जो, बस आँखों से तोलते हैं,
चुप ही चुप, न जाने क्या टटोलते हैं...

गर जरूरत हो, तो वे जुबां खोलते हैं,
आगे पीछे वो, गैरों के भी डोलते हैं...

मतलब से, वो जुबाने जहर घोलते है,
जुबा-एँ-खंजर, वो सीने में घोपते हैं...

जुबान पे मिश्री, वो कम ही घोलते हैं,
कहाँ मन को, वो कभी टटोलते हैं...

बीच शहर के, वो हृदय जो खोलते हैं,
पागल है वो!,  सब यही बोलते है....

फितरत में, तो बस फरेब ही पलते हैं,
इस शहर में, कम ही लोग बोलते हैं...

बातें

बस कहने को है ये दुनिया भर की बातें....

वो चंद किस्से, वो चंद मुलाकातें,
फिर न जाने......
तुम कहां और हम कहां थे,
अब दामन में आए....
ये छोटे से दिन, वो लम्बी सी रातें....

बस कहने को है ये दुनिया भर की बातें....

कुछ यादों के पल मिले थे जिन्दगी के,
वो दो चार पल......
जब बहके थे हम दिल्लगी से,
जीवंत पल वो खुशी के.....
अब गूंजते है जेहन में वो ही बातें.....

बस कहने को है ये दुनिया भर की बातें....

वो ही चंद किस्से, वो ही चंद बातें,
फिर वही मुलाकातें....
वो ही संग जीवंत धड़कनों का,
वो बहकी सी जज्बातें....
काश! फिर वही पल मुझे मिल पाते.....

बस कहने को है ये दुनिया भर की बातें....

Sunday, 11 March 2018

विलम्बित लय

मन के निलय, इक ख्याल, इक विलम्बित लय....

विचरते मन में ख्याल कई,
धुन कई, पर लय ताल एक ही!
ख्यालों में दिखती इक तस्वीर वही,
जैसे वो हो चित्रकला कोई,
नाजों से गढी, खूबसूरत बला कोई,
वहीं ठहर गई हो जैसे मन की द्रुत गति,
अब लय विलम्बित वही....

मन के निलय, इक ख्याल, इक विलम्बित लय....

मन का अवलम्बन या वीतराग,
विलम्बित लय में मन का द्रुत राग,
दीवारों पर टंगी वो चंचल सी तस्वीर,
इकटक खामोशी तोड़ती हुई,
निलय में गूंजती विलम्बित गीत वही,
धड़कन में बजती अब धीमी संगीत वही,
अब अनुराग विलंम्बित वही....

मन के निलय, इक ख्याल, इक विलम्बित लय....

बंदिश का मनमोहक विस्तार,
आलाप, स्वर, तान का नव विहार,
शमाँ बाँधती विलंबित स्वर की बंदिश,
मूर्त होती वो चित्रकला कोई,
अलवेला रूप सुहावन हो जैसे कोई,
हृदयपटल पर बंदिशें अंकित करती हुई,
अब ख्याल विलंम्बित वही....

मन के निलय, इक ख्याल, इक विलम्बित लय....

Saturday, 10 March 2018

पवन बावरी

न जाने पंख कैसे लिए, चली है तू पवन बावरी!

यूं ही किस देश को तू चली?
तू कह दे जरा, क्या है ये माजरा?
है तेरे मन में क्या,
मैं भी तो सुन लूं जरा!
थर्राई है क्यूं पत्तियाँ, तू जो अचानक चली!

बयार मंद सी थी तू भली!
अब अचानक ये उठा कैसा गुबार?
मचला है मन तेरा,
या उठ रहा कोई ज्वार!
मद में यूं बहती हुई, संग तू किसके चली!

सुन! यूं शोर तू ना मचा!
सन सनन-सनन यूं न तू गुनगुना!
गीत कैसा है ये!
रुक जरा तू मुझको सुना!
बहकी सी सुरताल में, बवाल तू ना मचा!

तू तो प्राण का आधार है!
अन्दर तेरे, तुफान सा क्युं मचा?
ये बवंडर सा क्यूं,
ठेस तुझको लगी है क्या?
अशान्त तू है क्यूं, बहकी है क्यूं बावरी?

ऐ री पवन! तू हुई क्यूं बावरी?
ये अचानक तुझको हुआ है क्या?
यूं चातक कोई,
तेरा मन ले उड़ा है क्या?
तू भटक रही है क्यूं, दिशा-दिशा यूं बावरी?

न जाने पंख कैसे लिए, चली है तू पवन बावरी!

Thursday, 8 March 2018

खामोश अभिव्यक्ति

कुछ उभरते अल्फाजों की अभिव्यक्ति,
कुछ चुप से हृदय के, खामोशियों की प्रशस्ति,
दे गई, न जाने मन को ये कैसी शक्ति!

सशंकित था मन, उन खामोशियों से,
उत्साह संवर्धित कर गई, वो बोलती खामोशी,
अचंभित सी कर गई वो अभिव्यक्ति!

वही खामोश से अल्फाज,
अब इन बहती हवाओं से चुनकर,
अनुरोध करता हूं मन को,
तू ख्वाबों को रख...
कहीं खामोशियों से बुनकर!
वो रेशमी अहसास तू देना उन्हे,
सो जाएंगे वो भी...
खामोशियाँ ही ओढ़कर,
फिर तू भी बुन लेना खुद को,
हर पल फना होती,
इस बहती सी दुनियाँ को भूलकर!

अभिव्यक्ति! बिना किसी अतिशयोक्ति,
उभरेंगी लफ्जोें में, चुप से हृदय की अभिव्यक्ति!
उत्साहवर्धन करेंगो, वो बोलती खामोशी!

निःसंकोच! वही टूटती सी खामोशी,
वही चुप से हृदय के, खामोशियों की प्रशस्ति,
तब भी अचंभित करेंगी ये अभिव्यक्ति!

बहती जमीं

बहते से रास्तों पर, मंजिल को ढॣंढता हूं मैं...
आए न हाथ जो, सपने वही ढॣंढता हूं मैं...

आरजुओं के गुल ढूंढता हूं मैं,
बहती सी इस जमीं पर,
शहर-शहर मन्नतों के घूमता हूं मैं....

बस इक धूल सा उड़ता हूं मै,
इन्ही फिजाओं में कहीं,
बेवश दूर राहों पे भटकता हूं मैं.....

इक वो ही निशान ढूंढता हूं मैं,
बह रही जो रास्तों पर,
ख्वाहिशों के मुकाम ढॣंढता हूं मैं...

बहते से रास्तों पर, मंजिल को ढॣंढता हूं मैं...
आए न हाथ जो, सपने वही ढॣंढता हूं मैं...

Tuesday, 6 March 2018

इक परिक्रमा

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

है कई सवाल, पर जवाब एक ही!
कई रास्तों पर सफर, बसर है बस वहीं!
थक गए अगर, मुड़ गए कदम वहीं,
नींद में, नाम वही लेती जिन्दगी!
अविराम परिक्रमा सी, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

सौ-सौ शिकवे, शिकायतें उनसे ही,
मुहब्बत की हजारों, रवायतें उनसे ही,
हकीकत में ढलती, रवानी वही!
परिक्रमा करती, इक कहानी वहीं,
अहद-ए-वफा निभाती, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

इक छोर है यहाँ, दूजा छोर कहीं
विश्वास के डोर की, बस धूरी है वही,
उसी धूरी के गिर्द, ये परिक्रमा,
ज्यूं तारों संग, नभ पर वो चन्द्रमा!
कोई प्रेमाकाश बनाती, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

Saturday, 3 March 2018

ओ रे साथिया!

ओ रे साथिया! चल गीत लिखें कोई इक नया....

बदलेंगे यहाँ मौसम कई,
बदलेगी न राहें कभी सुरमई,
सुरीली हो धुन प्यार की,
नया गीत लिख जाएंगे हम कई...
यू चलते रहेंगे हम यहाँ,
आ बना ले इक नया हम जहाँ....

ओ रे साथिया! चल गीत लिखें कोई इक नया....

हो प्रेम की वादी कोई,
गूंजते हों जहाँ शहनाई कोई,
गीतों भरी हो सारी कली,
आ झूमें वहाँ हर डगर हर गली...
यूं मिलते रहे हम यहाँ,
आ लिख जाएँ हम नया दास्ताँ.....

ओ रे साथिया! चल गीत लिखें कोई इक नया....

हर गीत मे हो तुम्ही,
संगीत की हर धुन में तुम्ही,
तुम सा नही दूजा कोई,
रंग दूजा न अब चढता कोई....
यूं बदलेंगे ना हम यहाँ,
आ मिल रचाएँ हम सरगम नया....

ओ रे साथिया! चल गीत लिखें कोई इक नया....

व्याप्त सूनापन

क्यूं व्याप्त हुआ अनचाहा सा सूनापन?
क्या पर्याप्त नहीं, इक पागल सा दीवानापन?

छवि उस तारे की रमती है मेरे मन!
वो जा बैठा कहीं दूर गगन,
नभ विशाल है कहीं उसका भवन!
उस बिन सूना मेरा ये आँगन?
छटा विहीन सा है लगता, अब क्यूं ये गगन?
क्यूं वो तारे, आते नहीं अब इस आँगन?
व्याप्त हुआ क्यूं ये अंधियारापन?
क्या पर्याप्त नहीं, छोटा सा मेरा ये आँगन?

क्यूं व्याप्त हुआ अनचाहा सा सूनापन?
क्या पर्याप्त नहीं, इक पागल सा दीवानापन?

कवि मन रमता इक वो ही आरोहण!
क्या भूला वो मेरा ही गायन?
जर्जर सी ये वीणा मेरे ही आंगन!
असाध्य हुआ अब ये क्रंदन,
सुरविहीन मेरी जर्जर वीणा का ये गायन!
संगीत बिना है कैसा यह जीवन?
व्याप्त हुआ क्यूं ये बेसूरापन?
क्या पर्याप्त नहीं, मेरे रियाज की ये लगन?

क्यूं व्याप्त हुआ अनचाहा सा सूनापन?
क्या पर्याप्त नहीं, इक पागल सा दीवानापन?

Friday, 2 March 2018

रंग

सबरंग, जीवन के कितने विविध से रंग....

कहीं सूखते पात,
बिछड़ते डाली से छूटते हाथ,
कहीं टूटी डाल,
कहीं नव-कलियों का ताल,
कहीं खिलते हँसते फूल,
वहीं मुरझाए से फूल,
जमीं पर औंधे छाए से फूल,
वहीं झूलती डाली पर विहँसते शूल,
पीले होते हरे से पात,
धीमे पड़ते रंग,
वहीं नव-अंकुरित अंग,
चटक हरे भरे से रंग,
क्रन्दन-गायन दोनो संग-संग.....

सबरंग, जीवन के कितने विविध से रंग....

कहीं मरुस्थल सारा,
फैला रजकण का अंधियारा,
वहीं बहती जलधारा,
नदियों का सुंदर आहद नाद,
गिरते प्रिय जलप्रपात,
कहीं सुनामी सा भीषण गर्जन,
जल से काँपता जन-जीवन,
कभी दुःख से सुख हारा,
समाहित कभी सुख में दुःख सारा,
मन में गूंजते अनहद नाद,
कभी पलते विषाद,
कैसा जीवन का संवाद,
विष और अमृत दोनो संग संग...

सबरंग, जीवन के कितने विविध से रंग....

Thursday, 1 March 2018

होली

रंग जाऊँगा मैं प्रीत पीत, होली में ऐ मनमीत मीत...

निभाऊँगा मैं प्रीत रीत, 
तेरा बन जाऊँगा मैं मनमीत मीत,
रंग लाल टेसूओं से लेकर,
संग उलझते गेसूओं को लेकर,
गुलाल गालों पर मलकर,
मनाऊँगा होली, मैं मनमीत मीत....

रंग जाऊँगा मैं प्रीत पीत, होली में ऐ मनमीत मीत...

बरजोरी लगाऊं रंग-रंग मै,
तुझको ही लगाऊं रंग अंग-अंग मैं,
तेरे ही चलूंगा संग-संग मैं,
तेरे नाज नखरों के पतंग लेकर,
हवाओं में ही संग लेकर,
सजाऊँगा होली, मैं मनमीत मीत...

रंग जाऊँगा मैं प्रीत पीत, होली में ऐ मनमीत मीत...
 
तेरी मांग मे गुलाल भरकर,
तेरे नैनों में सिन्दूरी ख्याल रखकर,
मन के सारे मलाल धोकर,
सतरंगी राह के सब ख्वाब देकर,
हकीकत के ये रंग लेकर,
खिलाऊँगा होली, मैं मनमीत मीत...

रंग जाऊँगा मैं प्रीत पीत, होली में ऐ मनमीत मीत...

तेरी भाल पर बिंदी सजे,
रंगीन आँचल सदा खिलता रहे,
चूड़ी हमेशा बजती रहे,
पायल से रुनझुन संगीत लेकर,
ह्रदय में उठते गीत लेकर,
गाऊँगा होली ही, मैं मनमीत मीत...

रंग जाऊँगा मैं प्रीत पीत, होली में ऐ मनमीत मीत...

मंजिल

मंजिल तेरी, इसी राह आएगी निकल....
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

क्यूं खोए है करार तू?
क्यूं यहाँ गम से है बेजार तू?
न राई का बना पहाड़ तू,
बस एक ही तो मेरा यार तू......
न जिंदगी बेकार कर!
न गम का तू कहीं इजहार कर!
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

तू मुझसे मन का करार ले,
एक नया ऋंगार ले,
हर गम तू मुझपे वार ले,
पर यूं फैसले न तू हजार ले......
न आँहें हजार भर,
न शिकवे तू कहीं हजार कर!
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

कल यूं पशेमाँ न होना पड़े,
तू काहे को ऐसा करे?
पल-पल जो यूं आँहें भरे,
राहें बदल बेजार खुद को करे.....
न यूं फैसले बदल!
कर के वादा कोई तू न बदल!
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

बेशक न मुझको भी है खबर,
कि मंजिल तेरी है किधर!
इक राह पर बेखबर,
यूं ही चलना है तुझको मगर......
रुक जाए ना ये सफर!
यहीं है कहीं तेरे मन का शहर!
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

मंजिल तेरी, इसी राह आएगी निकल....
ऐ बेकरार दिल! तू चल, आ मेरे साथ चल!

Tuesday, 27 February 2018

उभरते क्षितिज

शब्दों से भरमाया, शब्दों से इतराया,
वो नभ पर, इक नया क्षितिज उभर आया...

शब्द कई, शब्दों के प्रारूप कई,
हर शब्द, इक नया स्वरूप ले आया,
कुछ शब्द शीर्षक बन इतराए,
कुछ क्षितिज की ललाट पर चढ़ भाए,
क्षितिज विराट हो इतराया,
वो नभ पर, इक नया क्षितिज उभर आया...

चुप सा क्षितिज, चहका शब्दों से,
कूक उठा कोयल सा, मधुर तान में गाया,
नाचा मयूर सा, लहराकर शर्माया,
कितनी ही कविताएँ, क्षितिज लिख आया,
क्षितिज मंत्रनाद कर गाया,
वो नभ पर, इक नया क्षितिज उभर आया...

सुनसान क्षितिज, गूंजा शब्दों से,
पूर्ण शब्दकोष, क्षितिज पर सिमट आया,
गद्य, पद्य क्षितिज पे आ उतरे,
कवियों का मेला, लगा है अब क्षितिज पे,
क्षितिज महाकाव्य रच आया,
वो नभ पर, इक नया क्षितिज उभर आया...

शब्दों से भरमाया, शब्दों से इतराया,
वो नभ पर, इक नया क्षितिज उभर आया...

प्रश्न से परहेज

क्यूं परहेज तुझे है मेरे प्रश्नों से?
है यक्ष प्रश्न यही...
मेरे उर्वर मन में अब तक अनसुलझे से!

जबकि .....
मेरी प्रश्न के केन्द्रबिंदु हो तुम!
मेरी अनगिनत प्रश्नों में सर्वश्रेष्ठ हो तुम!
मेरी अभिलाषा में इक ख्वाब हो तुम!
मेरी अनसुलझी सी इक सवाल हो तुम!
मेरी अश्कों में बहते से इक आब हो तुम!
मेरी जिज्ञासा के जवाब हो तुम!

फिर परहेज तुझे क्यूं मेरे प्रश्नों से?
उभरते है बस प्रश्न यही...
मेरे उर्वर मन में अब तक अनसुलझे से!

शायद ....
इस अथाह सृष्टि के थाह हो तुम!
या इस सृष्टि की हद के उस पार हो तुम?
प्रकृति का विस्मित रूप हो तुम!
या चिरपरिचित सी कोई स्वरूप हो तुम!
या हो वसुंधरा के आलिंगन का श्रृंगार तुम!
या कूकती करुण पुकार हो तुम!

परहेज तुझे क्यूं है मेरे प्रश्नों से?
उभरते है बस प्रश्न यही...
मेरे उर्वर मन में अब तक अनसुलझे से!

सर्वदा....
इक प्रश्न ही बने रह जाओगे तुम!
या इस पहेली को सुलझाओगे भी तुम!
या बनकर चाहत रह जाओगे तुम!
मन को प्रश्न बनकर उलझाओगे तुम!
या मुझसे ही इक प्रश्न कर जाओगे तुम!
यूं जिज्ञासा को ही बढ़ाओगे तुम!

क्यूं परहेज तुझे है मेरे प्रश्नों से?
उभरते है बस प्रश्न यही...
मेरे उर्वर मन में अब तक अनसुलझे से!

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

कहीं यूं ही

ऐ मेघ, किसी देश कहीं तू चलता चल यूं ही! जा सावन ले आ, जा पर्वत से टकरा, या बन जा घटा, नभ पर लहरा, तेरे चलने में ही तेरा यौवन है, यह ...

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