Sunday, 21 October 2018

गठबंधन

नाजुक डोर से इक,
दो हृदय, आज जुड़ से गए...

बंध बंधते रहे,
तार मन के जुड़ते रहे,
डबडबाए नैन,
बांध तोड़ बहते रहे,
चुप थे दो लब,
चुपके से कुछ कह गए,
गांठ रिश्तों के,
इक नए से जुड़ गए....

नाजुक डोर से इक,
दो हृदय, आज जुड़ से गए...

खिल सी उठी,
मुरझाई सी इक कली,
आशाएं कई,
इक साथ पल्लवित हुई,
बांधने मन के,
इक नवीन बंधन वो चली,
नाम रिश्तों के,
इक नए से मिल गए.....

नाजुक डोर से इक,
दो हृदय, आज जुड़ से गए...

मुक्त आकाश ये,
छूने लगा मुदित हृदय,
बेसुरा कंठ भी,
गाने लगा नवीन लय,
मुखरित राह पर,
राही नए दो चल पड़े,
राह रिश्तों के,
इक नए से मिल गए.....

नाजुक डोर से इक,
दो हृदय, आज जुड़ से गए...

कोटि-कोटि कर,
आशीष देने को उठे,
कितने ही स्वर,
शंख नाद करने लगे,
ये सैकड़ों भ्रमर,
डाल पर मंडराने लगे,
डाल रिश्तों के,
इक नए से मिल गए.....

नाजुक डोर से इक,
दो हृदय, आज जुड़ से गए...

Thursday, 18 October 2018

उद्वेलित हृदय

मेरे हृदय के ताल को,
सदा ही भरती रही भावों की नमीं,
भावस्निग्ध करती रही,
संवेदनाओं की भीगी जमीं.....

तप्त हवाएं भी चली,
सख्त शिलाएँ आकर इसपे गिरी,
वेदनाओं से भी बिधी,
मेरे हृदय की नम सी जमीं.....

उठते रहे लहर कई,
कितने ही भँवर घाव देकर गई,
संघात ये सहती रही,
कंपकंपाती हृदय की जमी....

अब नीर नैनों मे लिए,
कलपते प्राणों की आहुति दिए,
प्रतिघात करने चली,
वेदनाओं से बिंधी ये जमीं....

क्यूँ ये संताप में जले,
अकेला ही क्यूँ ये वेदना में रहे,
रक्त के इस भार से,
उद्वेलित है हृदय की जमीं....

इन्तजार

बस यूँ ही, उनसे हुई थी गुफ्तगू दो चार,
शायद उन्हें था, उस तूफाँ के गुजर जाने का इन्तजार!

था मुझे भी एक ही इन्तज़ार...,
वो तूफाँ, गुजरता रहे इसी राह हर-बार!
होती रही अनवरत बारिशें,
दमकती रहे दामिनी, गरजते रहें बादल,
लड़खड़ाते रहें उनके कदम,
रुकते रहें, दर मेरे ही वो बार-बार.....

था सदियों किया मैंने इन्तजार...,
एक पल, काश वो मुझ संग लेते गुजार!
सजाता मैं तन्हाई अपनी,
रोकता उन्हें, थामकर उनका ही आँचल,
या रोक देता वक्त के कदम,
मिन्नतें यही, मैं करता उनसे हजार....

था शायद उन्हें भी ये इन्तजार....,
कोई सदा, कर गई थी उन्हे भी बेकरार!
दमकने लगी थी दामिनी,
गरजने लगे थे, कयामत के वही बादल,
निकल पड़े थे उनके कदम,
चौखट मेरे, आ पड़े वो पहली बार....

बस यूँ ही, उनसे हुई थी गुफ्तगू दो चार,
न था अब उन्हें, किसी तूफाँ के गुजरने का इन्तजार!

Tuesday, 16 October 2018

नींद

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....

सांझ ढले यूँ पलकों तले,
हौले-हौले कोई नैनों को सहलाता है,
ढ़लती सी इक राह पर,
कोई हाथ पकड़ कहीं दूर लिए जाता है.....
बंद पलकों को कर जाता है....

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....

उभर आते हैं दृश्य कई,
पटल से दृश्य कई, कोई मिटा जाता है,
तिलिस्म भरे क्षण पर,
रहस्यमई इक नई परत कोई रख जाता है.....
बंद पलकों को कर जाता है....

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....

बेवश आँखें कोई झांके,
कोई अंग-अग शिथिल कर जाता है,
कोई यूँ ही बेवश कर,
खूबसूरत सा इक निमंत्रण लेकर आता है.....
बंद पलकों को कर जाता है....

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....

नींद सरकती है नैनों में,
धीरे से कोई दूर गगन ले जाता है,
जादू से सम्मोहित कर,
तारों की उस महफिल में लिए जाता है.....
बंद पलकों को कर जाता है....

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....

Sunday, 14 October 2018

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समस्त सम्माननीय पाठकों का हार्दिक धन्यवाद
दिनांक: 14.10.2018

मत कर इतने सवाल

कुछ तो रखा कर, अपने चेहरे का ख्याल......
मत कर, इतने सवाल!

ये उम्र है, ढ़लती जाएगी!
हर शै, चेहरों पर रेखाएँ अंकित कर जाएंगी,
छा जाएगा वक्त का मकरजाल!
मत कर इतने सवाल.....!

समय की, है ये मनमानी!
बेरहम समय ये, किस शै की इसने है मानी?
रेखाओं के ये बुन जाएगा जाल!
मत कर इतने सवाल.....!

बदलेगा, ये वक्त भी कभी!
डगर इक नई, अपनी ही चल देगा ये कभी!
वक्त की थमती नही कहीँ चाल!
मत कर इतने सवाल.....!

ले ऐनक, तू बैठा हाथों में!
रंग कई, नित भरता है तू अपनी आँखों में!
उम्र के रंगों का क्या होगा हाल?
मत कर इतने सवाल.....!

झुर्रियाँ, ले आएंगी ये उम्र!
इक राह वही, अन्तिम चुन लाएगी ये उम्र!
क्यूँ पलते मन में इतने मलाल?
मत कर इतने सवाल.....!

कुछ तो रखा कर, अपने चेहरे का ख्याल......
मत कर, इतने सवाल!

Saturday, 13 October 2018

ठहरी सी रात

ठहरी है क्यूँ ये रात यहीं .....
क्या मेरे ही संग, नीरवता का मन भरा नहीं?

हर क्षण, संग रही मेरे क्षणदा,
खेल कौन सा, जो संग मेरे इसने ना खेला!
ऊब चुका मैं, क्षणदा थकती ही नहीं,
आँगन मेरे ही है ये क्यूँ रुकी?

ठहरी है क्यूँ ये रात यहीं .....
क्या मेरे ही संग, नीरवता का मन भरा नहीं?

नभ के तारे, ढ़ल चुके हैं सारे,
वो डग भरती, निकल पड़ी घर को कौमुदी!
झांक रहा, वो क्षितिज से अंशुमाली,
क्यूँ बैठी है मेरे घर विभावरी?

ठहरी है क्यूँ ये रात यहीं .....
क्या मेरे ही संग, नीरवता का मन भरा नहीं?

मुझको ही, तू जाने दे विभावरी!
कुछ क्षण को, मै भी तो देखूँ वो प्रभाकिरण!
भर लूँ नैनों में, थोड़ी सी वो जुन्हाई,
देखूँ दिनकर की वो अंगड़ाई?

ठहरी है क्यूँ ये रात यहीं .....
क्या मेरे ही संग, नीरवता का मन भरा नहीं?
.............................................................
अर्थ:-
विभावरी, क्षणदा, नीरवता : - रात्रि, रात
जुन्हाई, कौमुदी : - चाँदनी
अंशुमाली, दिनकर : - सूर्य

Wednesday, 10 October 2018

अब कहाँ वो कहकशाँ

वो कहकशाँ, वो कदमों के निशां अब है कहाँ....

अब न जाने, गुजरा है कहाँ वो कारवां,
धूल है हर तरफ,
फ़िज़ाओ में पिघला सा है धुआँ.....

गुजर चुके है जो, वक्त की तेज धार में,
वो रुके है याद में,
वो शाम-ओ-शहर अब हैं कहाँ.....

कभी जो कहते थे, दुनिया बसाऊंगा मै,
रातें सजाऊंगा मैं,
वो ही सूनी कर गए हैं बस्तियां.....

भिगोती थी कभी, कहकहों की बारिशें,
चुप है वो फुहारें,
है वीरान सा अब वो कहकशाँ......

अब ढ़ूंढता हूँ, फिर वही शाम-ओ-शहर,
वो रास्ते दर-बदर,
मिट चुके है जो कदमों के निशां.....

वो कहकशाँ, वो कदमों के निशां अब है कहाँ....

Sunday, 7 October 2018

ख्याल - धूरी के गिर्द

जागृत सा इक ख्याल और सौ-सौ सवाल.....

हवाओं में उन्मुक्त,
किसी विचरते हुए प॔छी की तरह,
परन्तु, रेखांकित इक परिधि के भीतर,
धूरी के इर्द-गिर्द,
जागृत सा भटकता इक ख्याल!

इक वक्रिय पथ पर,
केन्द्राभिमुख फिरता हो रथ पर,
अभिकेन्द्रिय बल से होकर आकर्षित,
उस धूरी की ओर,
उन्मुख होता रहता इक ख्याल!

जागे से ये हैं सपने,
ये ख्याल कहाँ है अपने वश में,
ख़्वाहिशें हजार दफ़न हैं सवालों में,
धूरी की आश में,
सवालों में पिसता इक ख़्याल!

जागृत सा इक ख्याल और सौ-सौ सवाल.....

Saturday, 6 October 2018

संवेदनाएं

विलख-विलख कर जब कोई रोता है,
क्यूँ मेरा उर विचलित होता है?
ग़ैरों की मन के संताप में,
क्यूँ मेरा मन विलाप करता है?
औरों के विरह अश्रुपात में,
बरबस यूँ ही क्यूँ....
द्रवित हो जाती हैं ये मेरी आँखें.....

परेशाँ करती है मुझको मेरी संवेदना!
संवेदनशीलता ही मुझको करती है आहत!
सिवा तड़प के पाता ही क्या है मन?
क्यूँ रोऊँ मैं औरों के गम में,
क्यूँ ढ़ोऊँ मैं बेवजह के ये सदमें,
बरबस यूँ ही क्यूँ.....
भीगे तन्हाई में ऐसे ये मेरी आँखें...

आहत मुझको ही क्यूँ कर जाते है?
संताप भरे वो पलक्षिण,
उन नैनों के श्रावित कण,
मेरे ही हृदय क्यूँ प्रतिश्राव दिए जाते हैं,
विमुख क्यूँ ना हो पाता हूँ मैं,
बरबस यूँ ही क्यूँ....
छलक सी जाती है ये मेरी आँखें....

सिवा तड़प के पाता ही क्या है मन?
काश! पत्थर सा होता ये मन,
न ही आहत करती मुझको ये संवेदनाएं,
भावुक झण भर भी ना ये होता,
पाता राहत की कुछ साँसें,
बरबस ही न यूं....
सैलाब सी उफनती ये मेरी आँखें......

Thursday, 4 October 2018

निशाचर अखियाँ

कैसे कटे रतियाँ,
निशाचर सी हुई है दो अखियाँ....

ये नैन! जागे है सारी रैन,
करे ये अठखेलियां,
दबे पाँव चले, यहीं पलकों तले,
छुप-छुप, न जाने,
ये किस किस से मिले?
टुकर-टुकर ताके ये सारी रतियाँ,
निशाचर सी दो अखियाँ.....

ये निशा प्रहर भई दुष्कर,
न माने ये बतियां!
संग रैन चले, न ये निशा ढ़ले,
दिशा-दिशा भटके,
न ही नैनो में नींद पले,
उलझाए कर के उलझी बतियाँ,
निशाचर सी दो अखियाँ.....

ये नैन! पाये न क्यूँ चैन?
कटे कैसे रतियाँ?
राह कठिन, ये हर बार चले,
बोझिल सी पलकें,
रुक रुक अब हार चले,
जिद में जागी ये सारी रतियाँ,
निशाचर सी दो अखियाँ.....

कैसे कटे रतियाँ,
निशाचर सी हुई है दो अखियाँ....

Tuesday, 2 October 2018

शायद तुम आए थे!

शायद तुम आए थे? हाँ, तुम ही आए थे!

महक उठी है, कचनार सी,
मदहोश नशे में, झूम रहे हैं गुंचे,
खिल रही, कली जूही की,
नृत्य नाद कर रहे, नभ पर वो भँवरे,
क्या तुम ही आए थे?

चल रही है, पवन बासंती,
गीत अजूबा, गा रही वो कोयल,
तम में, घुल रही चाँदनी,
अदभुत छटा लेकर, निखरा है नभ,
शायद तुम ही आए थे?

ये हवाएँ, ऐसी सर्द ना थी!
ये दिशाएँ, जरा भी जर्द ना थी!
ये संदेशे तेरा ही लाई है,
छूकर तुमको ही,आई ये पुरवाई है,
बोलो ना तुम आए थे?

कह भी दो, ये राज है क्या!
ये बिन बादल, बरसात है क्या!
क्यूँ मौसम ने रंग बदले,
सातो रंग, क्यूँ अंबर पर है बिखरे?
कहो ना तुम ही आए थे!

चाह जगी है, फिर जीने की,
अभिलाषा है, फिर रस पीने की,
उत्कंठा एक ही मन में,
प्राण फूंक गया, कोई निष्प्राणो में!
हाँ, हाँ, तुम ही आए थे!

शायद तुम आए थे? हाँ, तुम ही आए थे!

Sunday, 30 September 2018

खुमारियाँ

सुस्त लम्हों में, खुमारियों का है ये आलम....

खुश्क सी ये कैसी, चल रही है हवा,
वक्त, जैसे ठहर चुका है यहाँ,
मंद सी हो चली, सूरज की रौशनी,
मंद मंद बह रही, ये बयार भी,
सुस्त से हैं कदम, अधूरी है प्यास भी....

ठहरा सा ये लम्हा, ये उन्मुक्त से पल,
ठहरा सा है, वो बीता सा कल,
ठहरे से हैं, वो ही बेसब्रियों के पल,
गुजरता नहीं, सुस्त सा ये लम्हा,
जाऊँ किधर, कैद ये कर गया यहाँ....

इस पल ने, यूँ ही बांध रखे है कदम,
आकुल से हैं प्राणों के कण,
इक आहट सी, उठ रही है कहीं,
खोया हूँ मैं, इस पल में यहीं,
है माधुर्य सा, इन खुमारियों में कही....

सुस्त लम्हों में, खुमारियों का है ये आलम....

Thursday, 27 September 2018

मन के आवेग

आवेग कई रमते इस छोटे से मन में,
जैसे बूँदें, बंदी हों घन में....

गम के क्षण, मन सह जाता है,
दुष्कर पल में, बह जाता है,
तुषारापात, झेल कर आवेगों के,
विकल हो जाता है.....

मन कोशों दूर निकल जाता है,
फिर वापस मुड़ आता है,
बंधकर आवेगों में, रम जाता है,
वहीं ठहर जाता है...

प्रवाह प्रबल मन के आवेगों में,
कहीं दूर बहा ले जाता है,
कण-कण प्लावित कर जाता है,
बेवश कर जाता है....

गर वश होता इन आवेगों पर,
धीर जरा मन को आता,
खुद को ले जाता निर्जन वन में,
चैन जहाँ रमता है...

आवेग कई रमते इस छोटे से मन में,
जैसे बूँदें, बंदी हों घन में....

Monday, 24 September 2018

सुप्रिय जज्बात

जज्ब कर जज्बात बातों में,
दो पल दे गया कोई साथ, तन्हा रातों में....
खोया मैं उस पल, उनकी ही बातों में....

टटोल कर, मेरा भावुक सा मन,
बोल कर कई सुप्रिय वचन,
पूछ कर न जाने, कितने ही प्रश्न,
रख गया था कोई हाथ, मेरे हाथों में....

जज्ब कर जज्बात बातों में,
दो पल दे गया कोई साथ, तन्हा रातों में....

हृदय के तट, मची है हलचल,
है जिज्ञासा जागी प्रबल,
उस ओर ही, मन ये रहा मचल,
सुप्रिय से वो हालात, लम्बी बातों में....

जज्ब कर जज्बात बातों में,
दो पल दे गया कोई साथ, तन्हा रातों में....

है खींच चुकी, इक लकीर सी,
उठ रही है इक पीर सी,
हो न हो, वो है कोई इक हीर सी,
सुप्रिय है वो ही पीर, मेरे जज़्बातों में...

जज्ब कर जज्बात बातों में,
दो पल दे गया कोई साथ, तन्हा रातों में....
मैं भूला हूँ अब भी, उनकी बातों में....

Saturday, 22 September 2018

अपरिचित

ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....

विस्मित हूँ निरख कर मैं वो स्मित,
बार-बार निरखूं, मैं इक वो ही अपरिचित,
हिय हर जाओ, चित मेरा ले जाओ,
विस्मित फिर से कर जाओ...

ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....

हो कौन तुम? क्यूँ ऐसे मौन तुम?
पा लूं परिचय, कुछ बोलो तो अपरिचित,
संवाद करो, कुछ अपनी बात कहो,
आसक्त मुझे फिर कर जाओ....

ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....

उद्दीप्त हुए, इस मन में दीप कई,
दीपक का उद्दीपन, तुमसे है अपरिचित,
प्रकाश भरो, तम इस रात के हरो,
असंख्य दीप फिर ले आओ.....

ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....

Friday, 21 September 2018

ब्रम्ह और मानव

सुना है! ब्रम्ह नें, रचकर रचाया ये रचना....
खुद हाथों से अपने,
ब्रम्हाण्ड को देकर विस्तार,
रचकर रूप कई,
गढ़ कर विविध आकार,
किया है साकार उसने कोई सपना...

सुना हैं! उन सपनों के ही इक रूप हैं हम....
अंश उसी का सबमें,
रंग विविध से दिए है उसने,
भरकर भाव कई,
देकर मन रुपी संसार,
किया है हृदय में ममता का श्रृंगार....

सुना है! ब्रम्हलोक गए वे सब कुछ देकर...
दे कर विशाल सपने,
एहसास उपज कर मानव में,
इच्छाएं दे कई,
किए बिन सोच विचार,
सृष्टि पर सौंप दिया था अधिकार....

सुना है! अब पश्चाताप कर रहा वो ब्रम्ह...
श्रेष्ठ ज्ञान दिया जिसे,
योनियों में उत्तम रचा जिसे,
भूला राह वही,
कपट क्लेश व्यभिचार,
सृष्टि की संहार पर तुला है मानव...

सुना है! टूट चुकी है अब ब्रम्ह की तन्द्रा...
रूठ चुका है वो सबसे,
त्रिनेत्र खोल दिए है शिव ने,
प्रलय न हो कहीं!
प्रकृति में है हाहाकार,
हो न हो, है विनाश का ये हुंकार...

सुना है! अब भी नासमझ बना है मानव...

Thursday, 20 September 2018

कहकशाँ

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....

बादलों के पीछे, उस चाँद के सरीखे,
छुपती छुपाती, तू ही तू बस दिखे,
मन को न इक पल भी गंवारा,
कि अस्तिव, कहीं भी नही है तुम्हारा....

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....

होती न तुम तो, बरसते न मेघ ऐसे,
उड़ते न फिर, मेघों से केश ऐसे,
भटकते न, बादल ये आवारा,
न ही भीगता, बेजार सा ये मन बेचारा...

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....

तारों की पूंज में, कहीं तुम हो छुपी,
हो रही है जहाँ, मद्धम सी रौशनी,
चमकती वो आँखे ही हैं तेरी,
है तुमसे ही, कहकशाँ सा सुंदर नजारा....

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....

रिमझिम हुई, जब कहीं भी बारिशें,
राग मल्हार जब कहीं भी छिड़े,
खनकी है आवाज बस तेरी,
बजते हैं सितार, हो जैसे सुर तुम्हारा.... 

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....

..............................................................
कहकशाँ का अर्थ :
- आकाश में दूरस्थ तारों का ऐसा समूह जो धुँधले बादल जैसा दिखाई देता है; आकाशगंगाछायापथ; (मिल्की वे)।

Tuesday, 18 September 2018

मत कर ऐसी बात

मत कर फिर वो बात,
सखी, अब दिल भर आया है....

किस्मत का लेखा किसने देखा,
समय ही दे गया धोखा,
न वश मे थे हालात, फिर कैसा विलाप,
संताप मिला जो किस्मत में था,
विधि का था यही विधान,
बात वही फिर काहे का दोहराना.....

छेड़ो मत फिर वो बात,
सखी, अब दिल भर आया है....

सखी! भूले ना भूलेगा वो गम,
है उपरवाला ही बेरहम,
थी दामन में खुशी, दिया उसने ही गम,
मुश्किल है फिर से खिल पाना,
था भाग्य में ही मुरझाना,
फिर क्यूँ उन बातों को दोहराना....

यूँ दोहराओ ना वो बात,
सखी, अब दिल भर आया है....

टूटे जो तारे, गिरते हैं अवनि पर,
टूटे पत्ते गलते हैं यहीं पर,
अवनि पर छोड़ गए, यूँ मुझको भी वो,
है किस्मत में, यूँ ही मिट जाना,
कहते हैं, अम्बर पर हैं वो,
अब मुझको भी उन तक है जाना....

ना और कोई हो बात,
सखी, अब दिल भर आया है....

Monday, 17 September 2018

अकेले प्रेम की कोशिश-(द्वितीय)

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....

प्रेम बस अक्षर नहीं, कि जिसे लिख डालें,
शब्दों का मेल नहीं, जिसे हर्फो से मिला लें,
उष्मा है ये मन की, जो पत्थर पिघला दे,
ठंढ़क है ये, जलते मन को जो सहला दे,
कोशिशें अनथक अनवरत जारी हैं मेरी,
वो ठंढ़क, वही उष्मा जीवन में नित भरने की!

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....

प्रवाहित हो जैसे नदी, है ये प्रवाह वही,
बलखाती धारा सी, चंचल सी ये चाह वही,
बरसाती नदिया सी, ये कोई धार नही,
सदाबहार प्रवाह ये, हिमगिरी से जो बही,
कोशिशें अनथक अनवरत जारी हैं मेरी,
वो प्रवाह, वही चंचल धारा संग ले चलने की!

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....

है पुष्प वही, जो मुरझाने तक सुगंध दे,
योग्य हो पुष्पांजलि के, ईश्वर के शीष चढ़े,
चुने ले वैद्य जिसे, रोगों में उपचार बने,
संग-संग चिता चढ़े, जलते जलते संग दे,
कोशिशें अनथक अनवरत जारी हैं मेरी,
वो सुगंध, बस वही अनुराग उत्पन्न करने की!

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....

शब्दों में ढल जाएंगे, जब मेरे भाव यही,
हर्फों से मिल ही जाएंगे, फिर मेरे शब्द वही,
अक्षर प्रेम के, इन फिज़ाओं में उभरेंगे,
पिघल जाएंगे पाषाण, प्रेम की इस भाफ से,
कोशिशें अनथक अनवरत जारी हैं मेरी,
वो भाव, उन्ही हर्फों से कुछ अक्षर लिखने की!

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....

Sunday, 16 September 2018

बह जाते हैं नीर

जज्बातों में, बस यूँ ही बह जाते हैं नीर...

असह्य हुई, जब भी पीड़,
बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,
नैनों से बह जाते हैं नीर,
बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...

नीर नहीं, ये है इक भाषा,
इक कूट शब्द, संकेत जरा सा,
सुख-दुख हो थोड़ा सा,
छलकते हैं, नैनों से बह जाते हैं नीर...

संयम, थोड़ा ना खुद पर,
ना धैर्य तनिक भी लम्हातों पर,
न जाने किन बातों पर,
जज्बातों में, बस यूँ बह जाते हैं नीर...

सम्भले ना, ये आँखों में,
तड़पाते हैं, आके तन्हा रातों में,
डूबोकर यूँ ख्यालों में,
किसी अंजान नगर, ले जाते हैं नीर...

भिगोते हैं भावों को नीर,
पिरोते है मन के भावों को नीर,
धोते हैं घावों को नीर,
बातों ही बातों में, भिगो जाते हैं नीर....

असह्य हुई, मन की पीड़,
बंध तोड़ रहे, अब मन का धीर,
बह चले अब नैनों से नीर,
कर संकेत, सब कुछ कह रहे हैं नीर...

जज्बातों में, बस यूँ ही बह जाते हैं नीर...

Friday, 14 September 2018

दायरा

ये अब किन दायरों में सिमट गए हो तुम...

छोड़ कर बाबुल का आंगन,
इक दहलीज ही तो बस लांघी थी तुमने!
आशा के फूल खिले थे मन में,
नैनों में थे आने वाले कल के सपने,
उद्विग्नता मन में थी कहीं,
विस्तृत आकाश था दामन में तुम्हारे!

ये अब किन दायरों में सिमट गए हो तुम...

कितने चंचल थे तुम्हारे नयन!
फूट पड़तीं थी जिनसे आशा की किरण,
उन्माद था रक्त की शिराओं में,
रगों में कूट-कूटकर भरा था जोश,
उच्छृंखलता थी यौवन की,
जीवन करता था कलरव साथ तुम्हारे!

ये अब किन दायरों में सिमट गए हो तुम...

कुंठित है क्यूँ मन का आंगन?
संकुचित हुए क्यूँ सोच के विस्तृत दायरे?
क्यूँ कैद हुए तुम चार दिवारों में?
साँसों में हरपल तुम्हारे विषाद कैसा?
घिरे हो क्यूँ अवसाद में तुम?
क्यूँ है हजार अंकुश जीवन पे तुम्हारे!

ये अब किन दायरों में सिमट गए हो तुम...

Wednesday, 12 September 2018

यूँ भी होता

यूँ भी होता............

मन के क्षितिज पर,
गर कहीं चाँद खिला होता,
फिर अंधेरों से यहाँ,
मुझको न कोई गिला होता!

अनसुना ना करता,
मन मेरे मन की बातें सुनता,
बातें फिर कोई यहाँ,
मुझसे करता या न करता!

हो मन में जो लिखा,
गर कोई कभी पढ़ लेता,
लफ़्ज़ को यूँ शब्दों में,
ढ़लकर ना ही जलना होता!

करीब रहकर भी,
न फासला मिटा होता,
बेवजह गले मिल ले,
ऐसा न गर कोई मिला होता!

दिल तक पथ होता,
दूरी न ये तुम तक होता
थकता न ये पथिक,
मुश्किल भरा ना पथ होता!

गम से मन टूटता,
मन गैरों के गम में ही रोता,
भूले से भी गम कोई,
फिर दुश्मन को भी न देता!

यूँ भी होता..........

Tuesday, 11 September 2018

बीहड़- इक याद

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....

यत्र तत्र झाड़ झंखर, राहों में धूल कंकड़,
कंटीली झाड़ियों से ढ़की, वीरान सी वो बीहड़,
वृक्ष विशाल से उग आए हैं अब वहाँ,
शेष है कुछ तस्वीरें, बसी है जिनसे वो जहाँ,
कुछ बातें कर लेता हूँ मैं उनसे वहाँ...

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....

कुछ भी तो अब नहीं बचा, उस बीहड़ में,
हर शै में समय की जंग, खुद समय भी है दंग,
हैरान हूँ मैं भी, समय ये क्या कर गया?
खुद ही रचयिता, खुद ही विनाशक वो बना,
समय से बातें कर लेता हूँ मैं वहाँ....

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....

घने वृक्ष, चीखते झींगुर, अंतहीन बीहड़,
चीखते फड़फड़ाते, अनमनस्क से चमगादड़,
कुछ ज़िन्दगियाँ अब भी रहती है वहाँ,
दम घोंटती हवाओं में, पैबन्द हैं साँसें जहाँ,
जिन्दगी को ढ़ूँढ़ने जाता हूँ मैं वहाँ...

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....

ऐ वक्त, ऐ निर्मम समय, ये कैसा बीहड़!
रचता ही है तो रच, बीहड़ साँसों की लय पर,
वो बीहड़! तरन्नुम हवाओं में हों जहाँ,
तैरते हों शुकून, मन की तलैय्या पर जहाँ,
मन कहता रहे, तू ले चल मोहे वहाँ....

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....

Monday, 10 September 2018

बरसते घन

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

ये घन, रोज ही भर ले आती हैं बूँदें,
भटकती है हर गली, गुजरता हूँ जिधर मैं,
भीगोती है रोज ही, ढूंढकर मुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

थमती ही नहीं, बूँदों से लदी ये घन,
बरसकर टटोलती है, रोज ही ये मेरा मन,
पूछती है कुछ भी, रोककर मुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

जोड़ गई इक रिश्ता, मुझसे ये घन,
कभी ये न बरसे, तो बरसता है मेरा मन,
तरपाती है कभी, यूँ छेड़कर मुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

ये घन, निःसंकोच भिगोती है मुझे,
निःसंकोच मैं भी, कुछ कह देता हूँ इन्हें,
ये रोकती नही, कुछ कहने से मुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

यूँ निःसंकोच, मिलती है रोज मुझे,
तोहफे बूँदों के, रोज ही दे जाती है मुझे,
भीगना तुम भी, भिगोए जो ये तुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

निःस्वार्थ हैं कितने, स्नेह के ये घन,
सर्वस्व देकर, हर जाती है धरा का तम,
बरस जाती हैं, अरमानों के ये बूँदें....

थमती ही नही, रिमझिम बारिश की बूँदें.....

Saturday, 8 September 2018

दरिया का किनारा

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा....

कितनी ही लहरें, यूँ छूकर गई मुझे,
हर लहर, कुछ न कुछ कहकर गई है मुझे,
दग्ध कर गई, कुछ लहरें तट को मेरे,
खामोश रहा मै, लेकिन था मैं मन को हारा,
गाती हैं लहरें, खामोश है किनारा....

बरबस हुई प्रीत, उन लहरों से मुझे,
हँसकर बहती रही, ये लहरें देखकर मुझे,
रुक जाती काश! दो पल को ये लहर,
समेट लेता इन्हें, अपनी आगोश में भरकर,
बहती है लहरें, खामोश है किनारा....

भिगोया है, लहरो ने यूँ हर पल मुझे,
हूँ बस इक किनारा, एहसास दे गई मुझे,
टूटा इक पल को, बांध धैर्य का मेरे,
रीति थी पलकें, मैं प्रीत में था सब हारा,
बस प्रीत बिना, खामोश है किनारा....

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा....

Thursday, 6 September 2018

खेवैय्या

हो गुम कहाँ तुम, ऐ मेरे खेवैय्या!
गहरी सी इस वापी में डोल रही मेरी नैय्या!

धीरज थिरता था, पहले इस वापी में,
धीर बड़ा मन को मिलता था इस वापी में,
अब आब नहीं इसकी मन माफिक,
तू खे मेरी ये नैय्या, जरा ध्यान से नाविक,
है संकट में है मेरी ये छोटी सी नैय्या,
हो गुम कहाँ, ऐ मेरे खेवैय्या!

थी बड़ी पावन, कभी आब यहाँ की,
किसी ने धोया है इसमें, सारे पाप जहाँ की,
अब खिलते नही हैं कमल यहाँ भी,
उस जलकुम्भी से, जरा बचना ऐ नाविक,
उलझ जाए न, मेरी ये टूटी सी नैय्या,
हो गुम कहाँ, ऐ मेरे खेवैय्या!

गहरी है वापी, ठहरी है आब यहाँ की,
अब बदली सी है, आब-ए-हयात यहाँ की,
अब यहाँ न मन को शुकून जरा भी,
चिन्ता मेरे मन की, बढाओ न ऐ नाविक,
पलट जाए न, है बेकाबू सी ये नैया,
हो गुम कहाँ, ऐ मेरे खेवैय्या!

हो गुम कहाँ तुम, ऐ मेरे खेवैय्या!
गहरी सी इस वापी में डोल रही मेरी नैय्या!

Sunday, 2 September 2018

वही है जीवन

है जीवन वही, जो मरण के क्षण को जीत ले...

झंकृत शब्दों से मौन को चीर दे,
ठहरे पलों को अशांत सागर का नीर दे,
टूटे मन को शांति का क्षीर दे,
है जीवन वही......

अचम्भित हूं मैं मौन जीवन पे,
कब ठहरा है जीवन मौन की प्राचीर पे,
मृत्यु के पल आते है मौन पे,
है जीवन वही......

मरण दाह है, लौ जीवन की ले,
ज्वलंत पलों से पल जीवन के छीन ले,
यूं जीते जी क्यूँ दाह में जले,
है जीवन वही......

इक गूंज गुंजित है ब्रम्हाण्ड में,
ओम् अहम् वही गुंजित है हर सांस में,
गूंज वही गूंजित कर मौन में,
है जीवन वही......

कोलाहल हो जब ये दीप जले,
हो किलकारी जब भी कोई फूल खिले,
मुखरित मन के संवाद चले,
है जीवन वही......

है जीवन वही, जो मरण के क्षण को जीत ले...

Friday, 31 August 2018

प्रतिश्राव

वही तार
संवेदना के
बार-बार
क्यूं?
छेड़ते हो तुम,
अपनी ही
संवेदनाओं के
प्रतिश्राव
क्या!
इन आँखो में,
चाहते हो
देखना तुम...!

पीड़ा का
है ना
मुझको
तनिक भी भान,
मैं
गम से
हूँ बिल्कुल
अंजान,
दिखता हूँ
मैं जैसा,
तू वैसा ही
मुझको जान...

मुझ है
न कोई व्यथा,
न ही
दुख भरी
है मेरी
कोई भी कथा,
फिर
बार-बार
क्यूँ ?
पूछते हो
मुझसे
ये प्रश्न तुम,
जख्म
कोई नया,
क्यूँ ?
हरबार
कुरेदते हो तुम....!

छलक पड़ेंगी
अनायास ही
मेरी
ये आँखे
प्रतिश्राव होगा वह!
तुम्हारे ही,
स्नेह का,
इस प्यार में,
तुम्हारे प्रश्न ही
छलक कर
बह पड़ेंगे
मेरे अश्रुधार में....!

क्या यही?
चाहते हो तुम
क्यूँ?
अपनी ही
संवेदनाओं के
प्रतिश्राव
मेरी इन
आँखो में,
डालते हो तुम,
शायद!
चाहते हो
वही प्रतिश्राव
मेरी
कोमल से,
हृदय में,
देखना तुम...!

Tuesday, 28 August 2018

कब हो सवेरा

ऐ नई सुबह! ऐ सूरज की नई किरण!
इक नई उमंग, इक नया सवेरा तुम कब लाओगे?

मुख मोड़ लिया, जिसने जीवन से,
बस एकाकी जीते हैं जो, युगों-युगों से,
बंधन जोड़ कर उन अंधियारों से,
रिश्ता तोड़ दिया जिसने उजियारों से,
कांतिविहीन हुए बूढ़े बरगद से,
यौवन का श्रृंगार, क्या उनको भी दे जाओगे?

रोज नया दिन लेकर आते हो,
फूलों-कलियों में रंग चटक भर लाते हो,
कोमल पात पर झूम-झूम जाते हो,
विहग के कंठों में गीत बनकर गाते हो,
कहीं लहरों पर मचल जाते हो,
नया उन्माद, क्या मृत मन में भी भर पाओगे?

युगों-युगों से हैं जो एकाकी,
पर्वत-पर्वत भटके हैं बनकर वनवासी,
छाई है जिन पर घनघोर उदासी,
मिलता गर उनको भी थोड़ी सी तरुणाई,
खिलती उनमें कोमल सी अमराई,
यह उपहार, क्या एकाकी मन को दे पाओगे?

ऐ नई सुबह! ऐ नई सी किरण!
साध सको तो इक संकल्‍प साध लो,
कभी सिमटते जीवन में खो लेना,
कहीं विरह में तुम संग रो लेना,
कहीं व्यथित ह्रदय में तुम अकुलाना,
वेदना अपार, क्या सदियों तक झेल पाओगे?

ऐ नई सुबह! ऐ सूरज की नई किरण!
इक नई उमंग, इक नया सवेरा तुम कब लाओगे?

Saturday, 25 August 2018

अधूरा संवाद

करो ना कुछ बात, अभी अधूरा है ये संवाद.....

बिन बोले तुम सो मत जाना,
झूठमूठ ही, चाहे कुछ भी बतियाना,
या मेरी बातों में तुम खो जाना,
मुझको करनी है तुमसे, पूरी मन की बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

प्रिये, करो ना कुछ बात.....

भटका सा था मैं इक बंजारा,
तेरी ही पनघट पर था मैं तो ठहरा,
कुछ छाँव मिली मैं सब हारा,
बड़ी अद्भुद सी थी, उस छैय्यां की बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

प्रिये, करो ना कुछ बात.....

छाँव घनेरी, थी वो बरगद सी,
इक मंद बयार, वहीं थी आ ठहरी,
करता भी क्या अब मैं बेचारा,
उस बयार में थी, शीतल सी कोई बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

प्रिये, करो ना कुछ बात.....

अति लघु जुड़ाव जीवन का,
लधुत्तर फुर्सत के ये चंद लम्हात,
चुप चुप सी हो तुम क्यूं बोलो,
कह दो ना तुम, कुछ अनसूनी सी बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

प्रिये, करो ना कुछ बात.....

बिन बोले तुम सो मत जाना,
रिक्त कभी ना, ये झूला कर जाना,
इन बाहों का हो ना रिक्त शृंगार,
रिक्त ना रह जाए, आलिंगन की बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

करो ना कुछ बात, अभी अधूरा है ये संवाद.....

Thursday, 23 August 2018

दिल धड़कता ही नहीं

धड़कता ही नहीं ये दिल आज-कल...

संवेदन शून्य, संज्ञाविहीन सा ये दिल,
उर कंठ इसे गर कोई लगाता,
झकझोर कर धड़कनों को जगाता,
घाव कुछ भाव से भर जाता,
ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!

संवेदनाओं से सिर्फ इसे कैसे जगाएँ,
रिक्त है रक्त की सारी शिराएँ,
धमनियों में निर्वात सा माहौल है,
एकांत सा दिल में कोई आता,
ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!

तीर दिल के सदियों कोई आया नहीं,
सदियों यहाँ बसंत छाया नहीं,
स्पंदन तनिक भी कभी पाया नहीं,
स्पर्श जरा भी कोई कर जाता,
ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!

संज्ञा-शून्य सा अब हो चला है ये दिल,
विरानियों में ही रमा है ये दिल,
न गम है, न ही है अब इसे विषाद,
विषाद ही गर इसे मिल जाता,
ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!

धड़कता ही नहीं ये दिल आज-कल...

Wednesday, 22 August 2018

अब कहाँ कोई सदा

अब कहाँ है कोई सदा, जो फिर से पुकारता.....

वो मृदु भाव कहाँ,
है कहाँ अब वो मृदुल कंठ,
पुकार ले जो स्नेह से,
है कहाँ अब वो कोकिल से कंठ...

वो सुख-चैन कहाँ,
कहाँ है अब वो सुखद आँखें,
मुड़कर जो दे सदाएं,
है कहाँ अब वो बोलती निगाहें...

अब वो नैन कहाँ,
जो पिघला दे रीतकर पत्थर,
कर जाए भाव प्रवण,
है कहाँ अब वो भाव निर्झर...

अब न है वो सदाएं,
सूनी सी है अब मेरी पनाहें,
है सुनसान सा वो डगर,
और है उधर ही मेरी निगाहें....

वियावान हुई हैं राहें!
या, वो आवाज है बेअसर!
मन कलपता है कहीं!
या मन बन चुका है पत्थर...

अब कहाँ है कोई सदा, जो फिर से पुकारता.....

Sunday, 19 August 2018

फासले

यूं मिलिए कभी, गिरह नफ़रतों के खोलकर....

चंद कदमों के है ये फासले,
कभी नापिए न!
इन दूरियों को चलकर...
मिल ही जाएंगे रास्ते,
कभी झांकिए न!
इन खिड़कियों से निकलकर..

संग जब भी कहीं डोलते हो,
बेवजह बहुत बोलते हो,
दो बोल ही बोल ले,
मन में मिठास घोलकर,
आओ बैठो कभी,
ये जुबाने खंजर कहीं भूलकर...

यूं तो नफ़रतों के इस दौर में,
मिट गई हैं इबारतें,
सूनी सी पड़ी है महफ़िल,
और बच गईं हैं कुछ रिवायतें,
आओ फिर से लिखें,
इक नई इबारत कहीं मिलकर...

कम हो ही जाएंगे ये फासले,
मिट जाएंगी दूरियां,
न होंगी ये राहें अंधेरी,
हर कदम पे सजेंगी महफिल,
फूल यूं ही जाएंगे खिल,
आइये न खुली वादियों में चलकर...

यूं मिलिए कभी, गिरह नफ़रतों के खोलकर....

Tuesday, 14 August 2018

स्वतंत्रता (900वीं रचना)

लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही पुकार!

सीमाएं हों सुरक्षित, राहें हों बाधा-रहित,
बनें निर्भीक हम, हों सदा निर्विकार,
प्रगति के पथ पर सबका हो अधिकार,
मुक्त सांसों में स्वच्छंद हों विचार,
क्लेश मिटे सबके मन से,
ऐसा हो स्वतंत्र भावों का संचार.....
लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही पुकार!

बौद्धिक विकास हो, सद्गुण का हो संचार,
सुरक्षित हो बेटियां, ना ही हो दुराचार,
मानवता विचरण करे, हो दुर्जन का संहार,
सुरक्षित हों जन-जन के अधिकार,
देश सँवरे, सभ्यता निखरे,
ऐसा ही हो स्वतंत्रता का एहसास...
लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही पुकार!

तीन रंगों में घुलते हों, जन-जन के विचार,
रंग केसरिया, नस-नस में हम लें उतार,
हरे रंग में हो घुले, आचरण और व्यवहार,
हो उजला रंग सा, मन का ये संसार,
इन तीन रंगों से हो होली,
ऐसा ही हो स्वतंत्रता का त्योहार....
लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही पुकार!
सभी को 15 अगस्त की हार्दिक शुभकामनाएं

Monday, 13 August 2018

ऋतु परिवर्तन

ॠतुओं का अनवरत परिवर्तन....
क्या है ये.....

यह संधि है या है ये संधि विच्छेद?
अनवरत है या है क्षणिक प्रभेद,
कई टुकड़ों में है विभक्त,
या है ये अनुराग कोई अविभक्त,
कैसा ये क्रमिक अनुगमन.....

देखा है हमनें.....

संसृति का निरंतर निर्बाध परिवर्तन,
और बदलते ॠतुओं संग,
मुस्कुराती वादियों का मुरझाना,
कलकल बहती नदियों का सूख जाना,
बेजार होते चहकते दामन....

और फिर ...

उन्ही ऋतुओं का पुनः व्युत्क्रमण,
कोपलों का नवीकरण,
मद में डूबा प्यारा सा मौसम,
आगोश में फिर भर लेने का फन,
बहकता सा कुंवारा मन......

मैं इक कविमन...

उत्सुकता मेरी बढ़ती जाए हरक्षण,
शायद है यही सर्वश्रेष्ठ लेखन!
संसृति का ये श्रृंगार अनुपम,
यही तो है उत्कृष्ठ सौन्दर्य विमोचन,
ॠतुओं का क्रमिक परिवर्तन.....

सँवर रही हो जैसे दुल्हन....

Wednesday, 8 August 2018

पड़ाव

स्नेहिल से कितने पड़ाव, और तय करेंगे हम?

चलो तय कर चुके, यह भी पड़ाव हम,
अब न जाने, ले जाए कहाँ ये बढते कदम!
भले ही ये फासले, कुछ हो चले हैं कम,
गंतव्य की ओर, जरा बढ़ चले हैं गम,
छोड़ आए है पीछे, यादों के वो घनेरे घन!

डोर रिश्तों के ये, खींचते हैं मेरे कदम,
यूं ही पड़ाव पर, रिश्तों में बंध गये थे हम!
भावनाओं में, थोड़े से बह गए थे हम,
तोड़ूंगा कैसे, ये भावनाओं के बंधन,
उम्र भर खीचेंगे, स्नेह के ये प्यारे से वन!

नये से पड़ाव पर, किसी से जुड़ेंगे हम,
अंजाने से शक्ल में, जब बेगाने से होंगे हम!
बरस ही जाएंगे, यादों के वो घनेरे घन,
कुछ पल भीग लेंगे, उन राहों पे हम,
मुड़-मुड़ के पीछे, यूं ही देखा करेंगे हम!

स्नेह के मोहक पड़ाव, कैसे छोड़ पाएंगे हम?

Monday, 6 August 2018

द्वितीय संस्करण

सम्भव होता गर जीवन का द्वितीय संस्करण,
समीक्षा कर लेता जीवन की भूलों का,
फिर जी लेता इक नव-संस्करित जीवन!

क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

नए सिरे से होता, तब रिश्तों का नवीकरण,
परिमार्जित कर लेता मैं अपनी भाषाएं,
बोली की कड़वाहट का होता शुद्धिकरण!

क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

संस्कारी प्रवृत्तियों का करता मैं नव-उद्बोधन,
समूल नष्ट कर देता असंस्कारी अवयव,
कर लेता उच्च मान्यताओं का मैं संवर्धन।

क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

विसंगतियों से पृथक होता ये जीवन-दर्शन!
कर्मणा-वाचसा न होते विभिन्न परस्पर,
वैचारिक त्रुटियों का कर लेता निराकरण!

क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

परन्तु, प्रथम और आखिरी है यही संस्करण,
द्वितीय संस्करण इक कोरी सी कल्पना ,
अपनी जिम्मेदारी है यही प्रथम संस्करण!

बस नामुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

Saturday, 4 August 2018

वो तारे

गगन के पाश में,
गहराते रात के अंक-पाश में,
अंजाने से किस प्यास में,
एकाकी हैं वो तारे!

गहरे आकाश में,
उन चमकीले तारों के पास में,
शायद मेरी ही आस में,
रहते हैं वो तारे!

अंधेरों से मिल के,
सुबह के उजियारों से बच के,
या शायद एकांत रह के,
खिलते हैं वो तारे!

टिम टिम वो जले,
तिल-तिल फिर जल-जल मरे,
हर पल यूं ही टिमटिमाते,
जलते हैं वो तारे!

क्यूं तन्हा है जीवन?
वृहद आकाश क्यूं है निर्जन?
अनुत्तरित से कई प्रश्न,
करते हैं वो तारे!

ना ही कोई सखा,
ना ही फल जीवन का चखा,
इसी तड़प में शायद,
मरते हैं वो तारे!

जलकर भुक-भुक,
ज्यूं, कुछ कहता हो रुक-रुक,
शायद मेरी ही चाह में,
उगते हैं वो तारे!

Friday, 3 August 2018

लिखता हूं अनुभव

निरंतर शब्दों मे पिरोता हूं अपने अनुभव....

मैं लिखता हूं, क्यूंकि महसूस करता हूं,
जागी है अब तक आत्मा मेरी,
भाव-विहीन नहीं, भाव-विह्वल हूं,
कठोर नहीं, हृदय कोमल हूं,
आ चुभते हैं जब, तीर संवेदनाओं के,
लहू बह जाते हैं शब्दों में ढ़लके,
लिख लेता हूं, यूं संजोता हूं अनुभव...

निरंतर शब्दों मे पिरोता हूं अपने अनुभव....

मैं लिखता हूं, जब विह्वल हो उठता हूं,
जागृत है अब तक इन्द्रियाँ मेरी,
सुनता हूं, अभिव्यक्त कर सकता हूं,
संजीदा हूं, संज्ञा शून्य नहीं मैं,
झकझोरती हैं, मुझे सुबह की किरणें,
ले आती हैं, सांझ कुछ सदाएं,
सुन लेता हूं, यूं बुन लेता हूं अनुभव...

निरंतर शब्दों मे पिरोता हूं अपने अनुभव....

Thursday, 2 August 2018

तू, मैं और प्यार

ऐसा ही है कुछ,
तेरा प्यार...

मैं स्तब्ध द्रष्टा,
तू सहस्त्र जलधार,
मौन मैं,
तू बातें हजार!

संकल्पना मैं,
तू मूर्त रूप साकार,
लघु मैं,
तू वृहद आकार!

हूं ख्वाब मैं,
तू मेरी ही पुकार,
नींद मैं,
तू सपन साकार!

ठहरा ताल मैं,
तू नभ की बौछार,
वृक्ष मैं,
तू बहती बयार!

मैं गंध रिक्त,
तू महुआ कचनार,
रूप मैं,
तू रूप श्रृंगार!

शब्द रहित मैं,
तू शब्द अलंकार,
धुन मैं,
तू संगीत बहार!

ऐसा ही है कुछ,
तेरा प्यार...

Tuesday, 31 July 2018

तन्हाईयाँ

हँस ले जी भर के,
आज मुझपे ऐ तन्हाईयाँ,
सजेंगी महफिलें,
तब आऊंगा बुलाने मैं तुझे,
जल जाएगा तू भी,
देखकर मेरी कहकशां....

चलो ये माना कि,
तन्हा है आज हम यहाँ,
न है वो काफिले,
न ही है सितारों का कारवाँ,
पर ये न समझो,
कि गमगीन हैं हम यहाँ....

गूंज हूं मैं अकेला,
संग गूंजेंगी ये विरानियाँ,
दो पग भी चले,
बन ही जाएंगी पगडंडियाँ,
पथिक भी होंगे,
यूं ही बजेंगी शहनाईयां....

झेंप जाओगे फिर,
देख मुझको ऐ तन्हाईयाँ,
आ मिल ले गले,
है बेकार की ये रुशवाईयाँ,
क्यूं शिकवे पले,
क्यूं ये शिकायत साथिया....

Sunday, 29 July 2018

भूलोगे कैसे

हर क्षण कण-कण मेरी याद दिलाएंगे......

वो सूनी राहें, वो बलखाते से पल,
बहते से लम्हे, ये हवाएं चंचल,
वो टूटे पत्ते, वो बिखरा सा आँचल,
यूं मुझमें खो जाओगे तुम,
बहते लम्हों संग, उड़ आओगे तुम,
मौसम के रंग बदलेंगे,
घटा घनघोर जमकर बरसेंगे,
भिगाएंगे, मन विरहाकुल कर जाएंगे....

हर क्षण कण-कण मेरी याद दिलाएंगे......

उड़-उड़कर कागा मुंडेरे पे आएंगे,
काँव-काँव कर संदेशे लाएंगे,
अकुलाहट आने की ये दे जाएंगे,
सोचोगे, राह तकोगे तुम,
सूनी राहों के पदचाप गिनोगे तुम,
कागा फिर फिर आएंगे,
मुंडेर चढ़ गाएंगे, चिढाएंगे,
तरसाएंगे, मन आकुल कर जाएंगे....

हर क्षण कण-कण मेरी याद दिलाएंगे......

कुहू-कुहू कोयल झुरमुट में गाएगी,
छुप-छुप विरहा ये सुनाएंगी,
यादें मेरी लेकर वो भी आएंगी,
मन ही मन, गाओगे तुम,
कुछ गीत मेरे, यूं दोहराओगे तुम,
सूने नैने छलक आएंगे,
कोयल, रुक-रुककर गाएंगे,
जलाएंगे, मन व्याकुल कर जाएंगे....

हर क्षण कण-कण मेरी याद दिलाएंगे......

Friday, 27 July 2018

पथ परिचायक

ओ मेरे नायक, मेरे पथ परिचायक!
अब तू ही मुझको बता,
क्या बन पाया मैं तेरे लायक?

पथ तूने जो दिखलाया मुझको,
उस पथ ही मैं रहा अग्रसर,
कंटक ही कंटक मिले थे पथ पर,
निर्बाथ चला मैं उन कांटो पर,
हँसकर सहे मैंने, दंश बड़े दुखदायक!

ओ मेरे नायक, मेरे पथ परिचायक!
अब तू ही मुझको बता,
क्या बन पाया मैं तेरे लायक?

पग-पग सांसें थी इक जंग सी,
सुख! जैसे उड़ती पतंग थी,
बातें तेरी थी मेरी राहों की शिखा,
दीपक सा मैं हरदम ही जला,
सहता रहा मैं, वो तपिश पीड़ादायक!

ओ मेरे नायक, मेरे पथ परिचायक!
अब तू ही मुझको बता,
क्या बन पाया मैं तेरे लायक?

सुख की नींद मिली ना पलभर,
दुर्गम राहों पर चलता चला,
तिल तिल जल फूल सा खिला,
हँसकर गम से गले मिला,
चुपचाप सहे, पीर बड़े कष्टदायक!

ओ मेरे नायक, मेरे पथ परिचायक!
अब तू ही मुझको बता,
क्या बन पाया मैं तेरे लायक?

अब सफल हुआ या मैं असफल,
साधना तेरी ही है मेरा संबल,
विमुख मैं इनसे पल भर भी नहीं,
नायक मेरा है बस तू ही,
साधना तेरी, अति ही सुखदायक!

ओ मेरे नायक, मेरे पथ परिचायक!
अब तू ही मुझको बता,
क्या बन पाया मैं तेरे लायक? 

Thursday, 26 July 2018

स्वप्न मरीचिका

स्वप्न था, इक मिथ्या भान था वो!
गम ही क्या, जो वो टूट गया!

ज्यूं परछाईं उभरी हो दर्पण में,
चाह कोई जागी हो मन में,
यूं ही मृग-मरीचिका सा भान हुआ!

भ्रम ने जाल बुने थे कुछ सुंदर,
आँखों में आ बसे ये आकर,
टूटा भ्रम, जब सत्य का भान हुआ!

मन फिरता था यूं ही मारा-मारा,
जैसे पागल या कोई बंजारा,
विचलित था मन, अब शांत हुआ!

छूट चुका सब स्वप्न की चाह में,
हम चले थे भ्रम की राह में,
कर्मविमुख थे पथ का ज्ञान हुआ!

सत्य और भ्रम विमुख परस्पर,
विरोधाभास भ्रम के भीतर,
अन्तर्मन जीता, ज्यूं परित्राण हुआ!

स्वप्न था, इक मिथ्या भान था वो!
गम ही क्या, जो वो टूट गया!

Wednesday, 25 July 2018

वीरान बस्तियां

आशियाँ उजड़े, वीरान हुई ये बस्तियां,
है बस अनुत्तरित से कुछ अनसुलझे सवाल!

एक एक कर बुझते गए दीये सारे,
धूप, अंधेरों में हौले-हौले से घुलते गए,
किरणों में सिलते गए सैकड़ों मलाल,
आसमां पर आ बिखरे रंग गुलाल!

बस्तियों से दूर हो चले ये उजाले,
सांझ हुई या हैं ये गर्त अंधेरों के प्याले,
स्तब्ध खमोश हो चले सब सहचर,
सन्नाटों में चीख रहे ये निशाचर!

छल-छल करती पसरती ये रात,
पल-पल बोझिल होता ये सूना मंजर,
हर क्षण फैला है मरघट सा आलम,
बस्तियों में व्याप चुके हैं मातम!

अब शेष रह गए हैं कुछ सवाल,
और शेष बची हैं कुछ टूटी सी तस्वीरें,
उस रौशनी का है  बस  ख्याल भर,
शायद, वापस आएं वो मुड़कर!

आशियाँ उजड़े, वीरान हुई ये बस्तियां,
है बस अनुत्तरित से कुछ अनसुलझे सवाल!

Wednesday, 18 July 2018

वजह ढूंढ लें

जीने की कुछ तो वजह होगी,
बेवजह ये सांसे न यूं ही चली होंगी,
न सीने में दर्द यूं ही जगा होगा,
ये आँसू न यूं ही आँखों मे भरा होगा,
वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,
वजह वही चलो हम ढूंढ लें.....

नैन बेचैन रहते हैं क्यूं रातभर,
दूर अपना कोई उनसे तो रहा होगा,
नीर नैनों से न यूं ही बहे होंगे,
नैनों से उस ने कुछ तो कहा होगा,
वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,
चलो वजह वही हम ढूंढ लें.....

न यूं ही सजी होंगी ये वादियां,
ये पर्वत यूं ही एकाकी न हुआ होगा,
बर्फ शीष पर यूं ही न जमे होंगे,
धार बनकर नदी यूं ही न बही होगी,
वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,
वजह वही चलो हम ढूंढ लें.....

विहँसती हैं धूप में क्यूं पत्तियां,
पत्तियों का बदन भी तो जला होगा,
खिलते हैं हँसकर ये फूल क्यूं,
ये कांटा फूलों को भी तो चुभा होगा,
वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,
चलो वजह वही हम ढूंढ लें.....

जीने की कुछ तो वजह होगी,
बेवजह न उभर आया होगा रास्ता,
कुछ कदम कोई तो चला होगा,
अकेला सारी उम्र न कोई रहा होगा,
वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,
वजह वही चलो हम ढूंढ लें.....

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

गठबंधन

नाजुक डोर से इक, दो हृदय, आज जुड़ से गए... बंध बंधते रहे, तार मन के जुड़ते रहे, डबडबाए नैन, बांध तोड़ बहते रहे, चुप थे दो लब, चुप...

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