Thursday, 31 March 2016

वो ठहरा हुआ पल

वो पल अब तलक ठहरा हुआ है यहीं,
मुद्दतों से दरमियाँ ये दूरियाें के रुके हैं वहीं,
खोया है मन उस पल के दायरों में वहीं कहीं!

अपना सा एक शक्ल लगा था इस उम्र में कहीं,
सपनों मे मिलता था वो हमसे कभी-कभी,
हकीकत न बन सका सपनों का वो शक्ल कभी।

एहसास एक पल को कुछ ऐसा हुआ,
हकीकत बन के वो शक्ल सामने खड़ा मिला,
हतप्रभ सा खड़ा बस उसे मैं देखता ही रह गया।

कुछ पल को दूरियों के महल वो गिर गए,
मासूमियत पर उस शक्ल की हम फिर से मर गए,
टूटे भ्रम के महल, जब शक्ल अंजान वो लगने लगे।

वो पल अब फिर से ठहर गया है वहीं,
दरमियाँ ये दूरियाें के मुद्दतों के अब फिर हैं वहीं,
फिर से खोया है मन उस पल के दायरों में ही कहीं!

ऐ मन तू चल कहीं

ऐ मन तू चल अब उस गाँव,
मनबसिया मोरा रहता जिस ठाँव!

निर्दयी सुधि लेता नहीं मेरी वो,
बस अपनी धुन में खोया रहता वो!

निस दिन तरपत ये काया गले,
ऐ मन तू चल अब बैरी से मिल ले!

विधि कुछ हो तो दीजो बताए,
हिय उस निष्ठुर के प्रेम दीजो जगाए!

क्या करना धन जब मन है सूना,
आ जाए वो वापस अब इस अंगना!

ऐ मन तू जा सुधि उनकी ले आ,
पूछ लेना उनसे उस मन में मैं हूँ क्या ?

साँवरे तुम बिसर गए क्युँ मुझको,
विह्वल नैन मेरे अब ढ़ूंढ़ रहे हैं तुझको!

ऐ मन तू ले चल कहीं उन राहों पर,
मनबसिया मेरा निकला था जिन राहों पर ।

चीख निकल आई दर्द की

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

लम्बी श्रृंखला दर्द के मणिकाओं सी,
एक के बाद एक दर्द एक नई सी,
सदियों से चुभन रोज एक नए दर्द की,
खीज चुका मैं देख तमाशा दर्द की,
तोड़ डाला है घर मैने दर्द के उन गाँवो की!

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

अब अंजाना सा है हर दर्द मुझसे,
दंश दर्द का होता क्या समझा है दर्द नें,
तिरस्कार जी भरकर झेला है दर्द नें,
दर्द की झोली में रख डाले हजार दर्द मैंनें,
अवहेलना की है मैने दर्द के उच्च-आदेशों की!

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

क्या लोग कहेंगे

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

झूठी गिरह मन की बंधन के,
बेवजह संकोच लिए फिरता हूँ मन में,
अनिर्णय की स्थिति है, असमंजस में बैठा हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

घुट चुकी है दम प्रतिभाओं की,
खुद को पूर्णतः कहाँ खोल सका हूँ,
पूर्णविराम लगी है, कपाल बंद किए सोया हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

सपने असंख्य पल रहे इस मन में,
शायद कवि महान बन जाता जीवन में,
शब्द घुमड़ रहे है पर, लेखनी बंद किए बैठा हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

ग्यान का कोष मानस में,
अभिव्यक्ति मूक किए बस सुनता हूँ,
विवेचना की शक्ति है, पर दंभ लिए फिरता हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

चाहत खुशियों की पल के जीवन में,
खुशियों की लम्हों में कुछ कहने से डरता हूँ,
जिन्दा हूँ लेकिन, जीवन की लम्हों को यूँ खोता हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

एक मधुर कहानी का अन्त

क्या मधुर कहानी का अन्त ऐसा हीे होता है जग में?

नजदीकियाँ हद से भी ज्यादा दोनों में,
बेपनाह विश्वास पलता धा उनके हृदय में,
सीमा मर्यादाओं की लांघी थी दोनों नें,
टीस विरह की रह रह कर उठते थे मन में,
फिर भी बिछड़े-बिछड़े से थे दोनों ही जीवन में!

क्या ऐसी कहानी का अन्त ऐसा हीे होना है जग में?

आतुरता मिलने की पलती दोनो के मन में,
सपनों की नगरी ही पलती थी मन में,
विवश ज्वाला सी उठती थी रह रह कर तन में,
सुख मिलन के क्षणिक दोनों ही के जीवन में,
विरह की अगन धू-धू कर जलती फिर भी मन में!

क्या प्रेम कहानी का अन्त ऐसा हीे होना है जग में?

क्युँ मिल नहीं पाते दो प्रेमी हृदय इस जग में?
रंग प्रेम के क्यों सूखे हैं उनके जीवन में?
विरानियाँ मन के क्या लाएंगे कलरव खुशियों के?
सूखे पेड़ क्या फल पाएंगे जग के आँगन में?
गर्म हवाएँ लू सी चलती अब उनके मृदुल सीने में!

क्या प्रेमी हृदय ऐसे ही जलते हैं जग के प्रांगण में?

विष के घूँट पी रहे अब दोनो ही जीवन के,
चुभन शूल सी सहते पल पल विरह के,
कलकल सरिता से नीर बहते उनकी नैनों से,
कंपन भूचाल सी रह रह कर उठते हृदय में,
पलकें पथराईं सी आँचल भीगे भीगे अब जीवन में!

क्या मधुर कहानी का अन्त ऐसा हीे होता है जीवन में?

Wednesday, 30 March 2016

बेजुबाँ हृदय

मूक हृदय की पीड़ा कभी कह नही पाए वो लब!

सुलगती रही आग सी हृदय के अंतस्थ,
तड़पती रही आस वो हृदय के अंतस्थ,
झुलसती रही उस ताप से हृदय के अंतस्थ,
दबी रही बात वो हृदय के अंतस्थ!

बेजुबाँ हृदय की भाषा कब समझ सके हैं सब!

धड़कनों की जुबाँ कहता रहा मूक हृदय सदा,
भाव धड़कनों की लब तक न वो ला सका,
पीड़ा उस हृदय की नैनों ने लेकिन सुन लिया,
बह चली धार नीर की उन नैनों से तब!

मूक हृदय की पीड़ा कभी कह नही पाए वो लब!

मलिन हुआ वो धवल चाँद

आज रूठा हुआ क्युँ मुझसे मेरा चाँद वो?

वो धवल चाँद मलिन सा दिख रहा,
प्रखर आभा बिखेरती थी जो रात को,
जा छुपा घने बादलों की ओट में वो,
क्या शर्म से सिमट रही है चाँद वो?

आज रूठा हुआ क्युँ मुझसे मेरा चाँद वो?

किसी अमावस की उसको लगी नजर,
धवल किरणें उसकी छुप रही हैं रात को,
निहारता प्यासा चकोर नभ की ओर,
क्या ग्रहण लग गई है उस चाँद को?

आज रूठा हुआ क्युँ मुझसे मेरा चाँद वो?

सिमट रही कुम्हलाई सी वो बादलों में,
पूंज किरणों की बिखर गई है आकाश में,
अंधकार बादलों के छट गए हैं साथ में,
क्या नभ प्रेम में डूबी हुई है चाँद वो?

आज रूठा हुआ क्युँ मुझसे मेरा चाँद वो?

Tuesday, 29 March 2016

एक दिन खो जाऊँगा मैं

प्रीत का सागर हूँ छलक जाऊँगा नीर की तरह,
अंजान गीतों का साज हूँ बजता रहूँगा घुँघरुओं की तरह!

एक दिन,
खो जाऊँगा मैं,
धूंध बनकर,
इन बादलों के संग में!

मेरे शब्द,
जिन्दा रहेंगी फिर भी,
खुशबुओं सी रच,
साँसों के हर तार में!

बातें मेरी,
गुंजेगी शहनाईयों सी,
अंकित होकर,
दिलों की जज्बात में!

सदाएँ मेरी,
हवा का झौंका बन,
बिखर जाएंगी,
विस्मृति की दीवार में!

अक्श मेरी,
दिख जाएगी सामने,
दौड़ कर यादें मेरी,
मिल जाएंगी तुमसे गले!

परछाईं मेरी,
नजरों में समाएगी,
भूलना चाहोगे तुम,
मिल जाऊंगा मैं सुनसान मे!

निशानियाँ मेरी,
दिलों में रह जाएंगी
खो जाऊँगा कहीं,
मैं वक्त की मझधार में!

मुसाफिर हूँ, गुजर जाऊँगा मैं वक्त की तरह,
जाते-जाते दिलों में ठहर जाऊँगा मैं दरख्त की तरह!

मेरी मधुशाला

सम्मुख प्रेम का मधुमय प्याला,
अंजान विमुख दिग्भ्रमित आज पीने वाला,
मधुमय मधुमित हृदय प्रेम की हाला,
सुनसान पड़ी क्युँ जीवन की तेरी मधुशाला।

हाला तो वो आँखो से पी है जो,
खाक पिएंगे वो जो पीने जाते मधुशाला,
घट घट रमती हाला की मधु प्याला,
चतुर वही जो पी लेते हृदय प्रेम की हाला।

मेरी मधुशाला तो बस सपनों की,
प्याले अनगिनत जहाँ मिलते खुशियों की,
धड़कते खुशियों से जहाँ टूटे हृदय भी,
कुछ ऐसी हाला घूँट-घूृँट पी लेता मैं मतवाला।

भीड़ लगी भारी मेरी मधुशाला मे,
बिक रही प्रीत की हाला गम के बदले में,
प्रेम ही प्रेम रम रहा हर प्रेमी के हृदय में,
टूटे हैं प्याले पर जुड़े हैं मन मेरी मधुशाला में!

विषपान से बेहतर मदिरा की प्याला,
विष घोलते जीवन में ये सियासत वाला,
जीवन कलुषित इस विष ने कर डाला,
विष जीवन के मिट जाए जो पीले मेरी हाला।

भूल चुके जो जन राह जीने की,
मेरी मधुशाला मे पी ले प्याला जीवन की,
चढ़ जाता जब स्नेह प्रेम की हाला,
जीवन पूरी की पूरी लगती फिर मधुशाला।

Monday, 28 March 2016

सांझ प्रहर फिर से दुखदाई

सांझ प्रहर आज फिर से दुखदाई,
अस्ताचल की किरणें विरहाग्नि लेकर आई,

मन के आंगन तम सा घन छाया,
मिलनातुर मन, विरह की अग्नि मे काया,

नैन निर्झर सरिता से कलकल छलके,
सुर हृदय विलाप कीे घन तड़ित सा कड़के,

विरह की यह वेला युगों से जीवन में,
साँझ प्रहर अब लगते संगी से जीवन के,

वो निष्ठुर दूर कहीं पर सदा हृदय में,
निर्दयी वो दूर पर प्यारा मुझको जीवन में,

रात दिन ज्युँ कभी मिल नहीं पाते,
सांझ घङी किन्तु दोनो नित मिलने को आते,

अगन इस विरह की ऐसे ही संग मेरे,
सांझ ढ़ले नित आ जाते ये लगने गले मेरे।

प्रेमी हृदय की मौत

धड़कता था,
वो प्रेमी हृदय,
कभी इक सादगी पर,
उस सादगी के पीछे,
छुपा मगर,
इक चेहरा अलग,
आकण्ठ डूबी हुई,
वासना में उनकी नियत,
टूटकर बिखरा पड़ा,
अब यहीं वो कोमल हृदय।

मोल मन की,
भाव का,
कुछ भी नही उनके लिए,
दंश दिलों की,
सरहदों पर,
वो सदा देते रहे,
हृदय के,
आत्मीय संबंध,
खिलौने खेल के हुए,
वासना के आगे उनकी,
सर प्रीत के हैं झुके हुए।

घुट रहा दम,
उस हृदय का,
जीते जी वो मर रहा,
वो मरे या जले,
उसकी किसी को फिक्र क्या,
अन्त ऐसा ही हुआ,
जब प्रीत किसी हृदय ने किया,
वासना के सम्मुख,
प्रीत सदा नतमस्तक हुआ।

साहिलों से भटकी लहर

इक लहर भटकी हुई जो साहिलों से,
मौज बनकर भटक रही अब इन विरानियों में,
अंजान वो अब तलक अपनी ही मंजिलों से।

सन्नाटे ये रात के कटते नही हैं काटते,
मीलों है तन्हाईयाँ जिए अब वो किसके वास्ते,
साहिलों का निशाँ दूर उस लघु जिन्दगी से।

सिसकियों से पुकारती साहिल को वो दूर से,
डूबती नैनों से निहारती प्रियतम को मजबूर सी,
खो गई आवाज वो अब मौज की रानाईयों में।

इक लहर वो गुम हुई अब समुंदरों में,
मौज असंख्य फिर भी उठ रही इन समुंदरों में,
प्राण साहिल का भटकता उस प्रियतमा में।

पुकारता साहिल उठ रही लहरों को अब,
आकुल हृदय ढूंढता गुम हुई प्रियतमा को अब,
इंतजार में खुली आँखें हैं उसकी अब तलक।

टकरा रही लहर-लहर सागर हुई वीरान सी,
चीरकर विरानियों में गुंजी है इक आवाज सी,
तम तमस घिर रहे साहिल हुई उदास सी।

वो लहर जो लहरती थी कभी झूमकर,
अपनी ही नादानियों में कहीं खो गई वो लहर,
मंजिलों से दूर भटकी प्यासी रही वो लहर।

Sunday, 27 March 2016

प्रेयसी

शायद हम कहीं मिल चुके हैं पहले.........!

वही स्वप्निल झील सी नीली आँखें,
मदमाई अलसाई झुकी हुई सी पलकें,
काले-काले इन नैनों में नींद के पहरे,
जिक्र बादलों का कर लूँ तुमको प्रेयसी कहने से पहले।

शायद हम कहीं मिल चुके हैं पहले.........!

वही होठ अधखुले दो पंखुड़ियाँ से,
लरजते, कांपते, शबनम की बूंदों में डूबे,
लालिमा इन पर सूरज की किरणों के,
जिक्र गुलाब का कर लूँ तुमको प्रेयसी कहने से पहले।

शायद हम कहीं मिल चुके हैं पहले.........!

वही चेहरा चांदनी में धुला आभामय,
हसीन नूर सा रेशमी अक्श मुख पर लिए,
अक्श रुहानी जैसे दीप जली मन्दिर में,
जिक्र पूजा का कर लूँ तुमको प्रेयसी कहने से पहले।

शायद हम कहीं मिल चुके हैं पहले.........!

आँचल तले खग का नीर

आँचल तले बना लेता नीर, खग एक सुन्दर सा....!

आँचल की कोर बंधी प्रीत की डोर,
मन विह्ववल, चंचल चित, चितवन चितचोर,
लहराता आँचल जिया उठता हिलकोर,
उस ओर उड़ चला मन साजन रहता जिस ओर।

नीले पीले रंग बिरंगे आँचल सजनी के,
डोर डोर अति मन भावन उस गहरे आँचल के,
सुखद छाँव घनेरी उस पर तेरी जुल्फों के,
बंध रहा मन अाँचल में प्रीत के मधुर बंधन से।

हो तुम कौन? अंजान मैं अब तक तुमसे,
लिपटा है मन अब तक धूंध मे इस आँचल के,
लहराता मैं भी नभ में संग तेरे आँचल के,
प्रीत का आँचल लहरा देती तुम जो इस मन पे।

खग सा मेरा मन आँचल तेरा नभ सा,
लहराते नभ मे दोनो युगल हंसों के जोड़े सा,
घटा साँवली सी लहराती फिर आँचल सा,
आँचल तले बना लेता नीर खग एक सुन्दर सा।

अनहद नाद से अंजान जीवन

उलझी जटाओं में जकड़ा गंगा सा मन,
शिवत्व को तज गंगोत्री की भ्रमन कर रहा तन,
अनंत लक्ष्य की तलाश में परेशान जीवन,
सुखद वर्तमान की अनहद नाद से अंजान जीवन।

बूंद-बूंद उल्लासित टूटकर जीवन में,
स्वाति कण नभ से बिखरे जीवन के प्रांगण में,
कण-कण जीवन के समर्पित इस क्षण में,
सुरमई रंग विहँसते कलियों के अधखुले संपुट में।

नाद वही अनहद बजा पहले जो धरा पर,
अनहद नाद कहाँ बन पाते बाकि के सारे स्वर,
कस्तूरी नाभि लिए फिरता मानव यहाँ पर,
चक्रव्युह में उलझा जीवन मृगतृष्णा की दंश झेलकर।

अंतःकरण प्रखर हो लक्ष्य यही जीवन का,
क्षुधा, पिपासा, मृगतृष्णा का अन्त लक्ष्य जीवन का,
हरपल अनहद नाह की गूंज चाह श्रवण का,
हृदय के तार-तार टूटकर भी गाएँ मधुर गीत जीवन का ।

Saturday, 26 March 2016

संबंधों का कर्ज मोक्ष पर भारी

धागे ये संबंधों के जुड़े स्नेह की गांठो से,
कब कैसे जुड़ जाते ये बंधन साँसों की झंकारों से,
ममतामयी स्पर्श स्नेहिल मधुर इन गाँठों का,
धागे ये कच्चे पर बंधन अटूट ये जन्मों-जन्मों का।

अनगिनत संबंध जीवन के भूले बिसरे से,
जीवन की आपाधापी में तड़पते कुचले-मसले से,
विरह की टीस सी उठती फुर्सत के क्षण में,
गतिशीलता जीवन की भारी स्नेह, दुलार, ममता पे।

आधार स्तम्भ जीवन के, संबंधों के दायरे यही,
कितने ही स्नेहमयी गोदों में नवजात मुस्कुराते यहीं,
कर्ज भारी इन संबंधों का ढ़ोते जीवन भर यहीं,
क्या उरृण हो पाऊँगा इस कर्ज से, मैं सोचता यही?

कर्ज इस बंधन का शायद जीवन पर है भारी,
जन्मों का यह चक्र मानव के कर्ज चुकाने की तैयारी,
गरिमामयी संबंधों को फिर से जीने की यह बारी,
मोह संबंधों के स्नेहिल बंधन के मोक्ष पर है मेरी भारी।

तुम दीप जलाने ना आई

तुम दीप जलाने ना आई, प्राणों का आधार ना मिल पाया!
हृदय अरकंचन के पत्तों सा, जज्बात बूँदों सा बह आया!

प्रज्जवलित सदियों से एक दीप ह्रदय में,
जलता बुझ-बुझ कर साँसों की लौ मेंं,
नीर हृदय के लेकर जल उठता धू-धू कर मन में,
सूखे हैं अब वो नीर बुझ रहा दीप इस हिय में ।

तूम आ जाते जल उठता असंख्य दीप जीवन में,
तुम दीप जलाने ना आई, प्राणों का आधार ना मिल पाया।

निर्झर नीर जज्बातों का बह रहा चिर निरंतर,
रुकता है ये कब अरकंचन के पत्तों पर,
अधूरी प्यास हृदय की प्यासी सागर के इस तट पर,
आकुल प्राणों के कण-कण किसकी आहट पर।

तुम आ जाते जल उठता दीप हृदय के इस तट पर,
तुम दीप जलाने ना आई, प्राणों का आधार ना मिल पाया।

हृदय अरकंचन के पत्तों सा, जज्बात बूँदों सा बह आया।

Friday, 25 March 2016

दिया याद के तुम जला लेना

कहीं जब साँझ ढ़ले, दिया याद के तुम जला लेना!

सुनसान सी राहों पर, साँस जब थक जाए,
पथरीली इन सड़कों पर, जब चाल लड़खड़ाए,
मृत्यु खड़ी हो सामने और चैन हृदय ना पाए,
तब साँसों के रुकने से पहले, याद मुझे तुम कर लेना।

कहीं जब साँझ ढ़ले, दिया याद के तुम जला लेना!

दुनिया की भीड़ में, जब अपने बेगाने हो जाए,
स्वर साधती रहो तुम, गीत साधना के ना बन पाए,
घर के आईने मे तेरी शक्ल अंजानी बन जाए,
तब सूरत बदलने से पहले, याद मुझे तुम कर लेना।

कहीं जब साँझ ढ़ले, दिया याद के तुम जला लेना!

पीर पर्वत सी सामने, साथ धीरज का छूट जाए,
निराशा के बादल हों घेरे, आशा का दामन छूट जाए,
आगे हों घनघोर अंधेरे और राह नजर ना आए,
तब निराश बिखरने से पहले, याद मुझे तुम कर लेना।

कहीं जब साँझ ढ़ले, दिया याद के तुम जला लेना!

विह्वल भाव

भाव कितने ही प्रष्फुटित होते हर पल इस मन में...,!

कुछ भाव सरल भाषाविहीन, कुछ जटिल अंतहीन,
कुछ उद्वेलित घन जैसे व्यक्त अन्तःमानस में आसन्न,
कुछ हृदय में हरपल घुलते, कुछ अव्यक्त अन्त:स्थ मौन!

भाव पनपते भावनाओं से, भावना वातावरण से,
संग्यांहीन, संग्यांशून्य, निरापद भाव कुछ मेरे मन के,
मैं प्रेमी जीवन के हर शय का प्रेम ही दिखता हर मन में,

भिन्नता क्युँ भावों में इतनी मानव मन क्युँ विभिन्न,
रिक्तता तो है अंग जीवन का भाव क्युँ हुए दिशाविहीन,
कभी तैरती भावों मे विह्वलता कभी कभी ये मतिविहीन।

विह्वलता सुन्दरतम भाव मन की अभिव्यक्ति का,
माता हो जाती विह्वल पुत्र के निष्कपट भाव देखकर,
हृदय पुत्र का हो जाता विह्वल माँ की छलके नीर देखकर।

हृदय दुल्हन का विह्वल बाबुल का आँगन छोड़कर,
विदाई के क्षण नैन असंख्य विह्लल आँसूओं में डूबकर,
पत्थर हृदय पिता हो जाता विह्वल बेटी के आँसू देखकर।

भाव कितने ही प्रष्फुटित होते हर पल मन में...,!
कैद कर लेना चाहता विह्वल भावों को मैं "जीवन कलश" में.!

धागे जज्बातों के

कितनी ही बातें हैं.......
दिल में कहने को,कोई सुन ले तो आकर!
धागे जज्बातों के.....
उलझे हैं, थोड़ा इनको सुलझा लें तो जाकर।

व्यथा के आँसू......
क्युँ सूखे हैं, थोड़ा इनको बह जाने दो झरकर,
चंद रातें ही बची हैं.....
जीने को, थोड़ा सा तो हँस लेने दो जी भरकर,

इतने पहरे क्युँ......
जीने पर, जज्बातों को मुखरित तू कर,
बात दबी सी जो........
दिल में, कह दे खुले व्योम में जाकर।

चंदन बना तू........
आँसुओं के, जीवन की बहती धारा में घिसकर,
व्यथा तो बस......
इक स्वर है, बाकी के सप्त स्वर तू कर प्रखर।

कितनी ही बातें हैं.......
दिल में कहने को,कोई सुन ले तो आकर!

Thursday, 24 March 2016

हिचकियों का दौर

क्युँ सरक रहा हूँ मैं! क्या बेवसी में याद किया उसने मुझे?

शायद हो सकता है........
रूह की मुक्त गहराईयों में बिठा लिया है उसने मुझे,
साँसों के प्रवाह के हर तार में उलझा लिया है उसने मुझे,
सुलगते हुए दिलों के अरमान में चाहा है उसने मुझे,

क्या बरबस फिर याद किया उसनेे? आई क्युँ फिर हिचकी!

या फिर शायद..........
दबी हुई सी अनंत चाह है संजीदगी में उनकी,
जलप्रपात सी बही रक्त प्रवाह है धमनियों में उनकी,
फिजाओं में फैलता हुआ गूंज है आवाज में उनकी।

फिर हुई हिचकी! क्या चल पड़ी हैं वो निगाहें इस ओर ?

शायद हो न हो.......
तल्लीनता से वो आँखे देखती नभ में मेरी ओर,
मशरूफियत में जिन्दगी की ध्यान उनका है मेरी ओर,
या हिज्र की बात चली और आ रहे वो मेरी ओर।

सरक रहा हूँ मैं, रूह में अब बस गया ये हिचकियों का दौर ।

ये क्या कह गया तुमसे नशे में

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

जाम महुए की पिला दी थी किसी नें,
उस पर धतूरे की भंग मिलाई थी किसी ने,
मुस्कुराकर शाम शबनमी बना दी थी आप ने,
उड़ गए थे होश मेरे, मन कहाँ रह गया था वश में।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

यूँ तो मैं पीता नही जाम हसरतों के,
पिला दी थी दोस्तों नें कई जाम फुरकतों के,
मुस्कुराए आप जो छलके थे जाम यूँ ही लबों पे,
होश में हम थे कहाँ, देखकर आपको सामने।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

ये दो नैन मयखाने से लग रहे आपके,
जाम कई हसरतों के छलकाए है यूँ आपने,
लड़खड़ाए मेरे कदम आपकी मुस्कुराहटों में,
उड़ चुके हैं होश मेरे, मन विवश आपके सामने।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

Wednesday, 23 March 2016

वो कौन

वो कौन जो पुकार रहा क्षितिज की ओर इशारों से।

पलक्षिण नृत्य कर रहा आज जीवन के ,
बौराई हैं सासें मंजरित पल्लव की खुशबु से,
थिरक रहीं हैं हर धड़कन चितवन के,
वो कौन जो भर लाया है मधुरस आज उपवन सेे।

जीर्णकण उल्लासित चहुंदिस उपवन के,
जैसे घूँट मदिरा के पी आया हो मदिरालय से,
झंकृत हो उठे है तार-तार इस मधुबन के,
वो कौन जो बिखेर रहा उल्लास मन के आंगन में।

मधुकण अल्प सी पी गया मैं भी जीवन के,
बज उठे नवीन सुरताल प्राणों के अंतःकरण से,
गीत नए स्वर के छेर रहे तार मन वीणा के,
वो कौन जो पुकार रहा क्षितिज की ओर इशारों से।

वक्त ही नही है

वक्त ठहरता ही नही,

आशाएं बढती ही जाती जीवन की इस गतिशीलता में,

भावनाएं! या तो पंख पा लेती या फिर कुंठित हो जाती,

आंखे जीवन भर तलाशती रह जाती हैं उन्हे,

जिनसे भावनाओं को समझने की उम्मीद हों बंधी,

वो मिल भी गया तो ........

वक्त ही नही उसके पास भी ।

उसे यह फ़िक्र है हरदम : स्व. भगत सिंह, 1931

अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को शत-शत नमन।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपनी जंग को कुछ यूँ बयाँ किया था,

उसे यह फ़िक्र है हरदम : भगत सिंह (मार्च 1931)

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

रचनाकाल: मार्च 19319

(यह रचना अपने ब्लाग के माध्यम से आपलोगों के साथ साझा करने में मुझे गर्व महसूस हो रहा है। क्रान्ति की इस मशाल को नमन।)

Tuesday, 22 March 2016

रुत मिलने की आई (होली विशेष)

रुत मिलने की आई आँचल को लहराने दो।

बरसी है आग इन घटाओं से आज,
छलके हैं जाम इन बूदों के साथ,
भीगा भीगा सा तन सुलग रहा क्युँ आज,
बहका सा मन होली में आँचल को भीग जाने दो।

रुत मिलने की आई जुल्फों को बिखर जाने दो।

मस्त हवाएँ गुजर रही हैं तुमको छूकर,
बिखरे है ये लट चेहरे पर झूमकर,
आँखों में उतरा है जाम आज छलक कर,
उलझा हूँ मैं जुल्फो में जाम नजरों से पी लेने दो।

रुत मिलने की आई आज मुझको बहक जाने दो।

बेमतलब कोई बात बने

बेमतलब ही आँचल स्नेह का मिल जाए तब कोई बात बने!

वो कहते कुछ अपनी कह लूँ तब कोई बात बने!
साथ कहाँ कोई देता जग में यूँ ही,
यूँ बिन मतलब के बात यहाँ करता क्या कोई?
सबकी अपनी धुन सबकी अपनी राह,
मतलब की है सब यारी मतलब की सब बात,

बेमतलब की बातें दिल की कोई सुन ले तब बात बने।

वो कहते दो चार कदम मैं चल लूँ तब साथ बने!
क्या कदमों का चलना ही जीवन है?
दो चार कदम संग ढ़लना ही क्या जीवन है?
सबकी अपनी चाल सबका अपना रोना है,
जीवन बस इक राग, साथ-साथ जिसको गाना है।

बेमतलब ही कोई संग गीत गुनगुना ले तब कोई बात बने।

बेमतलब ही साया प्यार का मिल जाए तब कोई बात बने!

एहसास एक गहराता हर पल

एहसास एक गहराता हर पल,
निर्जन तालाब में जैसे ठहरा शांत जल,
खामोशी टूटती तभी जब फेकता कोई कंकड़।

कभी कभी ये एहसास उठते मचल,
वियावान व्योम मे जैसे घुमरता मंडराता बादल,
खामोशी टूटती है तभी जब लहराता उसका आँचल।

एहसासों के पर कभी आते निकल,
तेज हवा के झौंकों मे जैसे पत्तियों के स्वर,
खामोशी टूटती है तभी जब छा जाता है पतझड़।

आशाएँ एहसास की कितनी विकल,
सपनों की नई दुनियाँ मे रोज ही आता निकल,
खामोशी टूटती है तभी जब बिखरते सपनों के शकल।

एहसास एक गहराता हर पल........,!

Monday, 21 March 2016

माँ का पुत्र विछोह

रुकी हुई सांसें उसकी फिर से कब चल पड़ी पता नहीं?

जीर्ण हो चुकी थी वो जर्जर सी काया,
झुर्रियाँ की कतारें उभर आईं थी चेहरे पर,
एकटक ताकती कहीं वो पथराई सी आँखें,
संग्याहीन हो चुकी थी उसकी संवेदनाएँ,
साँसों के ज्वार अब थमने से लगे थे उसके,
जम सी रही थी रक्त धमनियों मे रुककर।

ऐसा हो भी तो क्युँ न.............!
नन्हा सा पुत्र बिछड़ चुका था गोद से उस माता की!

सहन कहाँ कर पाई विछोह अपने पुत्र की,
विछोह की पीड़ा हृदय मे जलती रही ज्वाला सी,
इंतजार में उसके बस खुली थी उसकी आँखें,
बुदबुगाते थे लब रुक-रुक कर बस नाम एक ही,
विश्वास उस हृदय में थी उसके लौट आनेे की।

ऐसा ही होता है माँ का हृदय..........!
ममत्व उस माँ की अब तक दबी थी उस आँचल ही!

ईश्ववर द्रविभूत हुए उस माता की विलाप सुनकर,
एक दिन लौट आया वही पुत्र माँ-माँ कहकर,
आँखों मे चमक वही वापस लौट आई फिर उसकी,,
नए स्वर मे फिर उभरने लगे संवेदनाओं के ज्वर,
आँचल में दबा ममत्व फूट पड़ा था अपने पुत्र पर।

रुकी हुई साँसें उसकी फिर से कब चल पड़ी पता नहीं?

विरहन की होली

फिजाओं में हर तरफ धूल सी उड़ती गुलाल,
पर साजन बिन रंगहीन चुनर उस गोरी के।

रास न आई उसको रंग होली की,
मुरझाई ज्यों पतझड़ में डाल़ बिन पत्तों की,
रंगीन अबीर गुलाल लगते फीकी सी,
टूटे हृदय में चुभते शूल सी ये रंग होली की।

वादियों में हर तरफ रंगो की रंगीली बरसात,
लेकिन साजन बिन कोरी चुनर उस विरहन के।

कोहबर में बैठी वो मुरझाई लता सी,
आँसुओं से खेलती वो होली आहत सी,
बाहर कोलाहल अन्दर वो चुप चुप सी,
रंगों के इस मौसम में वो कैसी गुमसुम सी।

कह दे कोई निष्ठुर साजन से जाकर,
बेरंग गोरी उदास बैठी विरहन सी बनकर,
दुनियाँ छोटी सी उसकी लगती उजाड़ साजन बिन,
धानी चुनर रंग लेती वो भी, गर जाती अपने साजन से मिल।

एक टुकड़ा नीरद

एक टुकड़ा नीरद, मीनकेतु सा छाया मन पर,
चातक मन बावरा उस नीरद का,
उमर घुमर वो नीरद वापस आता इस मन पर,
मनसिज सा बूँद बन बिखरा ये मन पर।

आज कहीं गुम वो मनसिज नीरद,
परछाई खोई कहीं बेचैन सी झील मे उसकी,
हलचल इस जल में आज कितनी,
सूख चुकी है शायद उस नीरद की बूँद भी?

नीरद आशाओं के कल फिर वापस आएंगे,
मन के झील पर ये फिर झिलमिलाएंगे,
तस्वीर नीरद की नई उभरेगी परछाई बन,
मनसिज नीरद की बूँदे फिर बरस जाएंगे मन पर।

अधूरे सपने

ठहरे से जीवन में छोटी सी खुशी के पल ये अधूरे सपने.....!

रात के अंधेरे रंगीन सपनों से पटे हुए,
दिन के उजाले संकलित भविष्य के विराट मार्ग।

दोनो तो सपने ही हैं गर मानों तो,
एक बंद आँखों से तो दूसरी खुली आँख,
अधूरी आंकांक्षाओं के बीज लिए ये रात दिन के मार्ग।

बस पनपेगा कब ये बीज, मन सोचता,
समझौते पर विवश वो, रात दिन एक करता,
बची रह जाती फिर भी जीवन में सपनों की कुछ शाम ।

ठहरे से जीवन में छोटी सी खुशी के पल ये अधूरे सपने.....!

Sunday, 20 March 2016

भटकता मन

भीड़ मे इस दुनियाँ की,
एकाकी सा भटकता मेरा मन......

तम रात के साए में,
कदमों के आहट हैं ये किसके,
सन्नाटे को चीरकर,
ज उठे हैं फिर प्राण किसके।

चारो तरफ विराना,
फिर धड़कनों में बजते गीत किसके,
मन मेरा जो आजतक मेरा था,
अब वश में किस कदमों की आहट के।

टटोलकर मन को देखा तब जाना...

वो तो मेरा एकाकी मन ही है
भटक रहा है जो इस रात के विराने में,
वो तो हृदय की गति ही मेरी है,
धड़क रही जो बेलगाम अश्व सी अन्तः में।

भीड़ मे इस दुनियाँ की,
एकाकी सा भटकता मेरा मन......

दो पुतलियाँ आँखों की

आँखों की ये दो पुतलियाँ,
परिभाषित करती हैं प्रेम को जैसे,
जीवन भर मिल पाते नही एक दूसरे से,
विस्मयकारी हैं तारतम्य इन दोनों के।

एक के बिन रहती अधूरी दूसरी,
नैन सुन्दर से कहलाते दोनों मिलकर ही,
पूर्णता नजरों की दो पुतलियाँ मिल कर ही 
आभास गहराई का दो पुतलियों से ही।

चलते है एक स्वर में दोनो ही,
साथ साथ खुलते ये बंद होते साथ ही,
जीवन के सुख-दुख की घड़ियाँ गिनते साथ ही,
नीर छलकते दो पुतलियो में साथ ही।

अलग-अलग पर वो अंजान नही,
दूरी दोनों में पर नजरों में मतभेद नहीं,
शिकवा शिकन शिकायत इनकी लबों पर नहीं,
एहसास परस्पर प्रेम के ये मरते नही।

सहमी सहमी सी खुशी

बरसों बीते, एक दिन खुशी को अचानक मैने भी देखा था राह में,
शक्ल कुछ भूली-भूली, कुछ जानी-पहचानी सी लगी थी उसकी,
दिमाग की तन्तुओं पर जोर डाला, तो पहचान मिली उस खुशी की,
बदहवास, उड-उड़े़े होश, माथे पे पसीने की बूंदे थी छलकी सी।

उदास गमगीन अंधेरों के साए में लिपटी, गुमसुम सी लगती थी वो,
इन्सानों की बस्ती से दूर, कहीं वीहट में शायद गुम हो चुकी थी वो,
खुद अपने घर का पता ढ़ूढ़ने, शायद जंगल से निकली थी वो,
नजरें पलभर मुझसे टकराते ही, कहीं कोने मे छुपने सी लगी थी वो।

सहमी-सहमी सी आवाज उसकी, बिखरे-बिखरे से थे अंदाज,
उलझे-उलझे लट चेहरे पे लटकी, जैसे झूलती हुई वटवृक्ष के डाल,
कांति गुम थी उसके चेहरे से, कोई अपना जैसे बिछड़ा था उससे,
या फिर किसी अपनों नें ही, दुखाया था दिल उस विरहन के जैसे।

इंसानों की बस्ती में वापस, जाने से भी वो घबराती थी शायद,
पल पल बदलते इंसानों के फितरत से, आहत थी वो भी शायद,
आवाज बंद हो चुकी थी उसकी, कुछ कह भी नही पाती वो शायद,
टूटकर बिखरी थी वो भी, छली गई थी इन्सानों से वो भी शायद।

व्यथा देख उसकी मैं, स्नेहपूर्वक विनती कर अपने घर ले आया,
क्षण भर को आँखे भर आई उसकी, पर अगले ही क्षण यह कैसी माया,
अपनों मे से ही किसी की मुँह से "ये कौन है?" का स्वर निकल आया,
विरहन खुशी टूट चुकी थी तब, जंगल में ही खुश थी वो शायद....!

Saturday, 19 March 2016

घर सपनों के बना लेता मै भी

गर सपने अपने मिल जाते तो घर एक बना लेता मैं भी.......!

सपना उस प्यारे से घर का संजोए वर्षों से इस मन में,
इन्तजार करती है नित ये आँखें वर्षों से उन हसीन सपनों के,
गर मिल जाते वो सपने, चुन-चुन कर रख लेता उनको प्रांगण में,
छोटा सा घर एक बना लेता सपनों के मैं भी तब इस जीवन में......!

मेरे सपने बड़े सरल सीधे-सादे तामझाम से परे........!

मैं, मेरा एकाकीपन, मेरी तन्हाई, मेरी तृष्णगी सपनों मे साथ मेरे,
साथ परछाई सी सपनों मे तुम चलती हो पीछे पीछे मेरे,
मेरी इच्छाएं, आशाएँ, भावनाएं, कल्पनाएं वशीभूत सपनों के मेरे,
घर की इन चार दीवारों पर अंकित हों केवल सपन-सुनहरे मेरे।

दूर-दूर तक गम की बूंदे छलकती कभी ना इन नयनों में,
जीवन मरण, मिलन-बिछड़न का भय ना होता इस जीवन में,
साथ छोड़ प्यारा सा अपना दूर ना जाता इस जीवन से,
विरह की दुखदाई वेला धुली होती प्रीत की विविध रंगो से।

आशाएँ ही आशाएँ होती जीवन में निराशा कही दम तोड़ती,
रौशनी के उजाले फैले दूर तक होते अंधेरे कही घुटकर दम तोड़ते,
विश्वास हर दिल में होता, सच्चाई के आगे जमाना झुकता,
छल, कपट, द्वेष, विषाद, क्लेश से दूर हरपल मानव का जीवन होता।

ये मेरे सपने हैं बड़े सरल सीधे-सादे से तामझाम से परे........!

गर ये सपने अपने मिल जाते तो दुनियाँ ऩई बसा लेता मैं भी....!

झील का कोई समुंदर नहीं

कहते हैं कि झील का कोई समुंदर नही होता!
मैं कहता हूँ कि झील सा सुन्दर कोई समुन्दर नही होता!

अपनी ही स्थिरता, विराम, ठहराव है उस झील का,
आभा अद्भुद, छटा निराली, चारो तरफ हरियाली,
प्रकृति की प्रतिबिम्ब को खुद में लपेटे हुए,
अपने आप में पूरी पूर्णता समेटे हुए झील का किनारा।

प्यार है मुझको उस ठहरे हुए झील से,
रमणीक लगती मन को सुन्दरता तन की उसके।

कमल कितने ही जीवन के खिलते हैं इसकी जल में,
शान्त लगती ये जितनी उतनी ही प्रखर तेज उसके,
मौन आहट में उसकी स्वर छुपते हैं जीवन के,
बात अपने मन की कहने को ये आतुर नही समुन्दर से।

झील का अपना ही मन, जो आकर मिलती है मेरे मन से।

Friday, 18 March 2016

कौन हो तुम

कौन हो तुम?
इक सोच हो या बहती समय हो तुम,
या फिजाओं मे घुली हुई इक महक हो तुम,
बादलों का आँचल हो या फैली हुई धुँध हो तुम।

कौन हो तुम?
बहती नदी हो या चंचल सी छवि हो तुम,
घुल रही है वादियों मे जो, क्या वही स्वर हो तुम,
छलकती हुई धार हो या ठहरी हुई नीर हो तुम।

कौन हो तुम?
इस धरा पर कही मिलते नही हैं निशाँ तुम्हारे,
है कहाँ अस्तित्व तुम्हारा? सागर में या आसमान पर,
उस क्षितिज पर या कही और धरती से परे,
अस्तित्व कहीं इस जहाँ में तुम्हारा है भी या नहीं,
या सिर्फ गूँज बनकर आवाज में ढ़लती रही हो तुम।

कौन हो तुम?
ऐसा लगता है कभी महसूस की थी धड़कनें,
कुछ पल के लिए बैठी थी तुम कहीं मेरे सामने,
बहके हुए दिल तब कभी धड़कते भी थे मेरे लिए?

कौन हो तुम?
तुम क्षणिक बूँद, प्यास जिससे बुझती नहीं,
पी भी लूँ जो बूँद लाखों, प्यास अधूरी ज्युँ की त्युँ,
जलधार सी बहती रहो इस मन की आंगन में सदा तुम।

परत दर परत समय

परत दर परत सिमटती ही चली गई समय,
गलीचे वक्त की लम्हों के खुलते चले गए,
कब दिन हुई, कब ढ़ली, कब रात के रार सुने,
इक जैसा ही तो दिखता है सबकुछ अब भी ,
पर न अब वो दिन रहा, ना ही अब वो रात ढ़ले।

रेत की मानिंद उड़ता ही रहा समय का बवंडर,
लम्हों के सैकत उड़ते रहे धुआँ धुआँ बनकर,
अपने छूटे, जग से रूठे, संबंध कई जुड़ते टूटते रहे,
कभी कील बनकर चुभते रहे एहसासों के नस्तर,
धूँध सी छाई हर तरफ जिस तरफ ये नजर चले।

समय का दरिया खामोश सा बह रहा निरंतर ,
कितनी ही संभावनाओं का हरपल गला रेतकर,
कितनी ही आशाओं का क्षण क्षण दम घोंटकर,
पर नई आशाएँ संभावनाओं को नित जन्म देकर,
बह चले हैं हम भी अब जिस तरफ ये समय चले।

Thursday, 17 March 2016

कड़कती धूप मे तड़पती एक जिन्दगी

भाग्य कैसा! कड़कती धूप मे तड़पती एक जिन्दगी वो!

मरुस्थल के सूखी गर्म रेत सी जिन्दगी वो,
मन का आँगन दूर तक विराना,
बालूका तट सी झिलमिल आँखो के कोर,
हृदय में उठती रेत के समुन्दरों के अगनित ज्वर।

प्रारब्ध कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

रेगिस्तान की तपती धूलकण सी जिन्दगी वो,
शरीर रेतकण के ढेर सी ढही हुई,
सैकत ही सैकत दूर तक कोई गीलापन नहीं,
होंठ की कोर में सुलगते दुःखों के असंख्य स्वर।

विधि कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

पिक कहुकिनी वो, पर भूल चुकी थी गाना वो,
सूख चुके थे मन के कानन वन उसके,
अंतर की ध्रुवगंगा सुखी मधुऋतु के इंतजार में,
चेतनतत्व की आसमा से गुजर रहा निर्जल पयोधर।

नियति कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

मनसिज सा मन

मन गुम सुम मृसा जग के कांतार में,
सघन बड़ी ये कांतार कानन जीवन की,
कहुकिनी मन की हुई अब चुप चुप सी,
तकती मुकुर पुलोजमा इस जीवन के प्रांगण में।

धुंधलाई लोचन इस दीप्ति मरीचि मे,
स्वातिभक्त सा मन तकता रहता नभ में,
चाहत उस पियूष का सोम रस जीवन में,
आरसी देखती रहती इन्द्रबधु मन के आंगण में।

मनसिज सा मन मन्मथ अनंता जग में,
परमधाम अपवर्ग ढूढ़ता रहता जीवन में,
विवश प्राण प्रारब्ध नियति विधि भँवर में,
इन्द्रव्रज चपला दामिनी का भय मन प्रांगण में।

रज रेणुका यादों की

रज रेणुका असंख्य तेरी यादों के,
दैवात बिखर आभूषित इस मन पे,
धुल रही रेणुकाएँ प्रभा तुषार तुहिन में,
भीग रही वल्लिका बेलरी शबनम में।

लघु लतिका सी यादों के ये पल,
लतराई दीर्घ वल्लिकाओं सी इस मन पर,
ज्युँ कुसुमाकर की आहट ग्रीष्म ऋतु पर,
प्रभामय दिव्यांश मेरी प्रत्युष वेला में।

अति कमनीय मंजुल रम्य वो यादें,
तृष्णा पिपास नूतन अभिनव सी,
मौन तोड़ बहती तन मे शोनित रुधिर सी,
द्युति सी ये यादें मोद प्रारब्ध जीवन में।

अलौकिक शुचि वल्लिकाओं सी यादें,
मधुऋतु विटप सी आवरित जीवन में,
आख्यायिका कहती ये तेरी गठबंधन के,
कान्ति प्रतिकृति यादों की बिंबित मन में ।

Wednesday, 16 March 2016

उम्र के किस कगार पर जिन्दगी

आहिस्ता आहिस्ता उम्र की किस कगार पर,
खीच लायी है मुझको ये जिन्दगी!

यौवन का शिला बर्फ सा गल गया,
चाहतों का पंछी तोड़ पिंजड़ा उड़ गया,
आशाओं का दीपक बिन तेल बुझ रहा,
जिन्दगी के किस मुकाम पर आज मैं आ गया।

आहिस्ता आहिस्ता पिघलता रहा ये आसमाँ,
बूँदों सी बरसती रही ये जिन्दगी।

जोश पहले सी अब रही नहीं,
उमंग दिलों में अब कहीं दिखती नहीं,
उन्माद मन की कहीं गुम सी गई,
कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल मे ही दब रही ।

आहिस्ता आहिस्ता कट रहा धूँध का ये धुआँ,
राख बन कर सिमट रही ये जिन्दगी।

इंतजार की लगन

इंतजार मे पलकें बिछाए बैठी थी वो जो राह में!

मन की रत्नगर्भा में,
असंख्य कुसुम से खिलने लगे,
हृदय की इन वादियों में,
गीत वनप्रिया के बजने लगे,
विश्रुपगा, सूर्यसुता, चक्षुजल,
सब साथ साथ बहने लगे।

इंतजार मे पलकें बिछाए बैठी थी वो जो राह में!

चुभते थे शूल राहों में,
 अब फूलों जैसे लगने लगे,
प्रारब्थ, नियति, भाग्य,
 सब के राह प्रशस्त होने लगे,
राह करवाल के धार सी,
 रम्य परिजात से लगने लगे।

इंतजार मे पलकें बिछाए बैठी थी वो जो राह में!

Tuesday, 15 March 2016

हे माता! कुसुम, मंजरी अर्पित तुम पर ही

हे माता! तुम ही रश्मिप्रभा, तुम मरीचि मेरी।

तुम वसुंधरा, तुम अचला, तुम ही रत्नगर्भा,
तुम वाणीश्वरी, तुम शारदा,महाश्वेता तुम ही,
तुम ही ऋतुराज, कुसुमाकर, तुम मधुऋतु,
धनप्रिया, चपला, इन्द्रवज्र दामिनी तुम ही।

रेत, सैकत हम कल्पतरू परिजात तुम ही।

तुम ही नियति, विधि, भाग्य, प्रारब्ध तुम ही,
तुम कमला, तुम पद्मा, रमा हरिप्रिया तुम ही,
तुम हो मोक्ष, मुक्ति, परधाम, अपवर्ग तुम ही,
तुम हो जननी, जनयत्री, अम्बाशम्भु तुम ही।

तुम रम्य, चारू, मंजुल, मनोहर, सुन्दर तुम ही,
पुष्प, सुमन, कुसुम, मंजरी अर्पित तुम पर ही।

कौन हो तुम?

कौन हो तुम? कुछ तो बोलो ना! राज जरा सा खोलो ना!

किसी कलाकार की कल्पनाओं का वजूद हो तुम,
या किसी गीतकार की गजलों भरी रचना का रूप
सायों में जो ढ़लती रही देर तलक तुम हो वही धूप,
चाहतों की सुबह हो या तबस्सुम लिए शाम हो तुम।

कौन हो तुम? कुछ तो बोलो ना! राज जरा सा खोलो ना!

तुम कल्पना हो किसी शिल्पकार के शिल्पकला की,
इक अद्वितीय संरचना हो शिल्पकला के विधाओं की,
तराशा हुआ संगमरमर हो शिल्पी के कुशल हाथों की,
या धरोहर अनमोल हो तुम शिल्पकृत्य के बाजीगरी की।

कौन हो तुम? कुछ तो बोलो ना! राज जरा सा खोलो ना!

तुम मोहक तस्वीर हो किसी चित्रकार के खयालों की,
चटक तावीर हो रंगों मे रंगी किसी मोहिनी मनमूरत की,
अनदेखा सा सपना हो तुम चित्रकार के कल्पनाओं की,
या चित्रकारिता बेमिसाल हो तुम कुदरत के कारीगरी की।

कौन हो तुम? कुछ तो बोलो ना! राज जरा सा खोलो ना!

Monday, 14 March 2016

अभी अभी, कभी कभी

कह गए क्या तुम मुझे कुछ अभी अभी,
महसूस सी हो रही स्वर तुम्हारी दबी दबी,
कह न पाए जो जुबाने बात कोई कभी कभी,
बात ऐसी कह दी मुझको शायद तूने अभी अभी।

अभी अभी तो जल रही थी आग सी,
दबी दबी सी सुलग रही मन की ताप भी,
कभी कभी तो ऐसे मे लगे हैं जाते दाग भी,
अभी अभी तो बारिशों के होने लगे आसार भी।

निखर गए है कलियों के मुखरे अभी अभी,
जल उठे हैं दीप झिलमिल दिल में कोई दबी दबी,
होता अक्सर प्यार में क्या सिलसिला ये कभी कभी,
दरमियाँ दिलों के फासले थे कमने लगे है अभी अभी।

मेरे पूर्वज

मेरे पूर्वज,
कहां चले गए तुम,
किस धुंध में खो गए तुम,
सुर वीणा के तार छेड़कर,
एक नई पीढ़ी की नींव रखकर,
कहीं अनंत में गुम हो गए तुम....

मेरे पूर्वज,
संवेदनाओं के स्वर जगाकर,
मुझसे आत्मीय संबंध बनाकर,
एक संसार नई बसाकर,
जग से मुंह फेर गए तुम,,,,
कहां चले गए तुम.....

मेरे पूर्वज,
छोड़ गए तुम पीछे मुझको,
पर तुम इतना समझ लेना,
तुम्हारे द्वारा स्थापित मानदंडों को,
पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजुंगा मैं,
तुम्हारी संवेदनाओं की थाथी,
रखूंगा मन के कोने में ही कहीं....

मेरे पूर्वज,
सतत इन अविरल आंखों मे,
बसी रहेगी तस्वीर आपकी,
मेरी भावनाओं के दरम्याओं में
जीवनपर्यंत जीवन सार बनकर,
सिर्फ बसे रहोगे तुम,,,,,,,,
और सदा ही बसे रहोगे तुम........,,,,

ओ मेरे पूर्वज......नमन स्वीकारो तुम....

खालीपन का प्रेम

कभी कभी एक अनचाहा सा खालीपन .........

और ऐसे में कभी कभी,
कुछ लम्हे ज़िन्दगी के,
सुकून से बिताने को मन करता है ,,,,
और कभी कुछ पाने, कुछ खोने,
किसी को अपना बनाने,
या ऐसे मे किसी के होने का मन करता है .....,

इन लम्हों में बस एक साथी है मेरा....
जो हर पल हर समय साथ होता है मेरे,
मेरे सुख और मेरे दुःख की वेला में,
मेरे जीवन में रंग भरने का काम करता है,
वो है मेरी डायरी "जीवन कलश"
और उसका नि:स्वार्थ आजीवन प्रेमी 'कलम " ......

थिरकता है वो लम्हा जब,
दोनो एक दुसरे से मिल जाते है,
और बिछड़ने का नाम ही नहीं लेते है....,,,,
कोई मेरा साथ दे या न दे....
मेरा कोई हमदम हो या न हो,
ये आकण्ठ भर देते हैं मेरे खालीपन को.....

लगता है जैसे.....
सब कुछ मिल चुका है मुझे,,,,,,
मेरी हमदम मेरी आगोश मे है,
गुदगुदा रही है ये जैसे मेरी मानस को,
मेरी एहसासों को सुरखाब के पर लग जाते हैं तब......

मुझे रोक लेना मेरे वश में नहीं

तुम ही तुम हर पल एहसास सी,
ज़िक्र क्यों हर पल तेरा मेरी यादों में,
आसान नहीं ये समझ पाना,
मान लो तुम इसे खुदा कि मर्जी,
मेरी यादों को रोक लेना मेरे वश में नहीं।

तूम इक एहसास सी बनकर मुझमें,
फुरक़त-ए-एहसास अनोखी तेरी बातों में,
बंधन के वे स्वर भूल जाना मुमकिन नहीं,
रोक लूं खुद को मैं कैसे तुम्हें चाहने से,
मेरी चाहत को रोक लेना मेरे वश में नहीं ।

इसे इत्तफ़ाक़ कहो या फिर मेरी नादानी.....

बड़े बेनूर से पड़े थे मेरे एहसास,
रौनक ए एहसास आपके आने से आई,
खोया हूँ उस तसव्वुर-ए-मदहोशी में,
मुमकिन नहीं अब होश में आना,
हाँ ....! हाँ, कतई मुमकिन नहीं......!
मेरी मदहोशी को रोक लेना मेरे वश में नहीं । 

एहसास गुमनाम गुम हुए

कुछ कण......!
क्षितिज पर अव्यवस्थित...!
क्या ताज्जुब हो,
गर वो रौशनी में गुम हुए.........!
वो रात सपनों का आना, भोर में उनका खो जाना,
बस कुछ रात्रि स्वप्न सुर रह गए,
जो प्रात दिवा में गुम हुए.........!

कुछ शब्द......!
एहसासों पर अव्यवस्थित...!
न कोई दहशत,
न खुद के खोने का डर........!
कुछ बुझें संवाद, कुछ अनकहे संबोधन,
कोई ग्रन्थ कोई संग्रह नहीं,
क्या हुआ गर गुम हुए.........!

कुछ चाहत......!
कभी चित्कार,कहकहे,क्रंदन,
सब यहीं कहीं हवा में घुल कर,
सांसों में गुम हुए........!
ओस के चंद कतरें ...
मिल बूंद बने, फिर गुम हुए़़......!
खुद जलकर ....
रोशनी को जलाने का अहसास,
बूझकर आँधी में,
धधककर जलने की शिद्दत में,
दिलों मे सुलगते अरमाँ गुम हुए.......!

कुछ क्षण.......!
आओं कोई मुठ्ठियों में भीजों मुझे,
कण कण समेट,
बूँद सदृश बंनाओ मुझे,
मै हूँ भी या नहीं,
मेरे होने का अहसास कराओं मुझे,
ढीली पड़ी जो मुठ्ठियाँ,
फिर ना कहना जो हम गुम हुए......!

आते जाते सड़कों की भीड़ में, हम गुमनाम गुम हुए...!

Sunday, 13 March 2016

स्नेह स्वर

अपनत्व के वे चंद शब्द,
गुंज उठे थे तब इन कानों में,
भ्रमित सा मन बावरा,
अटका उन शब्दों की जालों में,
स्वरों के लय की जादूगरी,
कैसी थी उन शब्दों में,
बाँध गया जो जीवन,
अदृश्य मोह के अटूट धागों में।

शब्दों के ये आ-स्वर,
जब मिल जाते हैं मन की भावों से,
शब्दों की मधुर रागिनी,
तब घुल मिल जाते हैं प्राणों से,
गीत नए शब्दों के बन,
मिल जाते हैं स्वर की लय से,
स्नेह स्वर इन शब्दों की,
जोड़ती है डोर मन की मन से।

झीलों के झिलमिल दर्पण में वो

नजरों मे वो, झीलों के झिलमिल दर्पण मे वो।

नजरों में हरपल इक चेहरा वही,
चारो तरफ ढूढूा करूँ पर दिखता नहीं,
झीलों के झिलमिल दर्पण मे वो,
देखें ये नजरें पर हो ओझल सी वो।

धुआँ-धुआँ वो अक्स, धूँध मे गुम हो जाए वो।

जगी ये अगन कैसी दिल में मेरे,
ख्यालों मे दिखता धुआँ सा अक्स सामने,
जाने किस धूँध में हम चलते रहे,
हर तरफ ख्यालों की धूँध मे खोया किए।

मन में वो, मन की खामोश झील में गुम सी वो।

चाँदनी सी बादलों में वो ढ़लती रहे,
झिलमिल सितारों मे उनको हम देखा करें,
आते नजर हो झीलो के दर्पण में तुम,
अब तो नजरों में तुम ही हो, जीवन में तुम।

नजरों मे तुम हो, झीलों के झिलमिल दर्पण मे तुम। 

Saturday, 12 March 2016

तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूँ

तुम एक बार जो रूठो, तो मैं दस बार मनाऊँ,
आपकी एक हसीं के लिए मैं तो जान लुटाऊँ,

रूठकर आपका जाना बड़ी प्यारी सी अदा है,
मानकर लौट भी जाना, उफ ये क्या माजरा है,

इन अदाओं में आपका प्यार छलक जाता है,
छलके इन्ही लम्हों में मेरा वक्त गुजर जाता है,

तरकीब नई फिर आपको सताने की ढ़ूंढ़ता हूँ,
रूठ जाने की नई ताक दिल में लिए फिरता हूँ,

मनभ्रमर रस पी लेता रूठे प्रीतम को मनाने में,
यूँ ही गुजर जाती ये जिन्दगानी रूठने मनाने में।

जुदाई

           जुदाई के अंतहीन युगों जैसे पल,
                झकझोरते शांत हृदय को हरपल,
          फासलों के क्षण बढ़ते आजकल,
               लाचार मन आज फिर है विकल।

         खामोश सी अब जुदाई की घड़ियाँ,
               मन कर रहा अब मन से ही बतियाँ,
         नैनों में डूबती चंद यादों की लड़ियाँ,
              फासले अमिट सी दिल के दरमियाँ।

         दिन बीतते महीने साल कम होते,
                हर क्षण जीवन के पल कम होते,
         वक्त के करम कब दामन मे होते,
                किस्मत होती गर तुम मिल जाते।

Friday, 11 March 2016

ये लब सिले सिले से

इक उदासी सी छाई क्युँ आपके चेहरे पे ?

वो चुभन कौन सी आपके दिल में,
जी दिख रही बरबस आपके मुखड़े पे,
बयाँ कर रही दास्ताँ बहुत कुछ ये नम आँखें,
कह रही दर्द कैसी ये लब सिले सिले से।

इक उदासी सी छाई क्युँ आपके चेहरे पे ?

ये सिहरन सी कैसी आपके बदन में,
जो दिख रही बरबस लड़खड़ाये कदमों में,
बयाँ कर रही दास्ताँ ये होश कुछ उड़े-उड़े से,
कह रही दर्द कैसी ये होठ काँपते से।

इक उदासी सी छाई क्युँ आपके चेहरे पे ?

Thursday, 10 March 2016

तू है हर जगह कहीं न कहीं

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

घट घट से मैंने पूछा तू जीता है कैसे?
निरूत्तर कण-कण घट के और जवाब एक ही,
"विधाता रखता है जैसे जी लेता हूँ वैसे ही!"

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

बहती हवाओं मे लिपटी स्पर्श तेरी ही,
कलकल बहती धारा लिए अनुराग तेरी ही,
शिलाएँ बर्फ की चाँदनी सी आभा में तेरी ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

प्यार भरे आँखों के आँसू मे रहता तू ही,
खुश्बु सौंधी सी मिट्टी की आती तुझसे ही,
चटक कलियों ने सीखा है खिलना तुझसे ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

फूलों में इतर सी खुश्बु कारण तेरे ही,
मधुमई सुबह की रंगीनियाँ कारण तेरे ही,
चम्पई ठलती शाम हुई सुरमई तेरे कारण ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

बारिश के बूँदों की छमछम तुझसे ही,
मृदुल घटाएँ आच्छादित नभ पर तुझसे ही,
सागर की लहरों का तट से टकराना तुझसे ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

ज्वार भाटा का सामंजस्य तुझसे ही,
लहरें विकराल सुनामी उठती तुझसे ही,
रंग सागर का नीला अतिरंजित तुझसे ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

कंठ कोकिला के मधुर स्वर तेरी ही,
अट्टहास गर्जन मे बादल की स्वर तेरी ही,
मौन निर्जन वियावान अरण्य गुंजित तुझसे ही,

तू है हर जगह कहीं न कहीं.......!

घट घट से मैंने पूछा तू जीता है कैसे?
निरूत्तर कण-कण घट के और जवाब एक ही,
"विधाता रखता है जैसे जी लेता हूँ वैसे ही!"

बाँध लूँ डोर जीवन की

तुझ संग बाँध लू मैं डोर कोई आज जीवन की!

मैं तम अंधियारा तू है दीपशिखा सी,
जल रहे है दीप कितने मन में चंचल सी,
धुआँ सा उठ रहा बादलों में जाने कैसी,
इन बादलों संग बाँध लू मैं डोर जीवन की।

आँचलो मे सज रहे हैं रंग जीवन के,
नयनो मे चिंगारियाँ जल रहे खुशियों के,
दीप आशा का जला लूँ मैं इस मन के,
इन आँचलों संग बाँध लू मैं डोर जीवन के।

आस दिल की है तुम्हारी राह में मेरी,
आँसुओं में ढ़ल रही जीवन की ये डोरी,
आँसुओं से मैं जलाऊँ दीप डेहरी की,
इन आँसुओं संग बाँध लू मैं डोर जीवन की।

झंकार सी हो रही मंद सांसों में अब,
घुँघरुओं सी बज रही इस फिजाओं में अब,
पायल कई बज उठे साथ मन मे अब,
इन झंकारों संग बाँध लू मैं डोर जीवन की।

तुझ संग बाँध लू मैं डोर कोई आज जीवन की!

दो तीरों के बीच

नदी के तीरे खड़ा, पर ढ़ूंढ़ता किनारा,
कैसी है यह दुविधा, कैसी जीवनधारा,
दो तीरों के बीच, भँवर सा मन बावरा,
डगमग जीवन की नैया ढ़ूंढ़ता सहारा।

दो तीर जीवन के, सुख-दु:ख का मेला,
पल खुशियों के कम, लेकिन अलबेला,
किस दुविधा में तू, क्युँ तू यहाँ अकेला,
ढ़ूंढ़ ले अपनी खुशियाँ,भूल जा झमेला।

तीर किनारे नाव कई, दूर नहीं तेरा गाँव,
तू चुन अपनी नाव, देख फिसले न पाँव,
राह कठिन थोड़ी सी,संयम रख ले ठाँव,
रस्ते कट ही जाएँगे, तू पा जाएगा गाँव।

Wednesday, 9 March 2016

भरम

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

एक छुअन सी महसूस होती हर पल,
एहसास अंजान खुश्बु की पल पल,
खामोशी फैली दिल के प्रस्तर पर प्रतिपल,
फिजाओं में पल पल कैसी है हलचल.......!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

अदृश्य अस्तित्व क्यों हर पल उसकी,
ध्वनि है यह किस मूक आकृति की,
गुंजित हो रही वादियाँ ध्वनि से किसकी,
आह सी मन से निकल रही आज किसकी....!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

पत्तियों में पल पल ये सरसराहट कैसी,
सिहरन सी बदन में छुअन की कैसी,
जेहन में हर पल गूंजती ये आवाज कैसी,
एहसास नई जगी दिल मे आज कैसी.......!

भरम सा हो रहा है मन को, या ये आहट है उनकी.....?

Tuesday, 8 March 2016

ऩारी: ईश्वर का एक एहसास

एहसास खूबसूरती का जब ईश्वर को हुआ,
श्रृष्टि निर्माता ने तब ही जन्म स्त्री को दिया।

इक एहसास कोमलता का जब हुआ होगा,
तब  उसने स्त्री का कोमल हृदय रचा होगा।

जग के भूख प्यास की जब हुई होगी चिन्ता,
तब उसने माता के आँचल में दूध भरा होगा।

जब एहसास कोमल भाव की मन में जागी,
ममत्व, स्त्रीत्व, वात्सल्य तब नारी को दिया।

धैर्य, संकल्प, सहनशीलता, भंडार ग्यान का,
सम्पूर्ण रूपेण नारी को उसने दे दिया होगा।

चाँदनी का घमंड तोड़ने को ही शायद उसने,
अकथनीय अवर्णनीय सुन्दरता नारी को दी।

सुन्दरता को परिभाषित करते करते उसने,
नारी रूप की परिकल्पना कर डाली होगी।

पुरुष वर्ग जन्मों से याचक नारी ममत्व का,
नारी बिन अस्तित्व नही कही पुरुष वर्ग का।

स्त्री जगत जननी

मन आज सोच रहा मेरा.....!

श्रृष्टि का आरंभ क्या स्त्री से हुआ?
जन्म देने की शक्ति सिर्फ स्त्री को ही क्यूँ?
जगत -जननी स्त्री ही क्यूँ....?
दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, काली सारी स्त्री क्यूँ?

अनेकों प्रश्न उठ रहे मन में आज....!

स्त्री ही तो है जग की शक्ति स्वरूपा,
सुन्दरता की असीम पराकाष्ठा और अधिष्ठाता,
पूर्ण ममता और स्नेह का मूर्त स्वरूप,
जगत को प्रथम दुग्ध पान से सीचने वाली!

फिर यह विवाद क्यूँ, दिवस विशेष यह क्यूँ?

नाभि मे नारी के पलती है दुनियाँ,
कोख नारी की ही प्रथम पाती ये दुनियाँ,
छुपने को माता का आँचल ही यहाँ,
अस्तित्व पुरुष का जग में नगन्य नारी बिना।

किसी क्षण नारी का अपमान करती क्युँ दुनियाँ?

भटके हैं क्या कुछ कन्याओं के स्वर भी?
कैकैयी, मंथरा, मंदोदरी, अप्सराएँ भी महिला ही,
फिसले थे कुछ कदम कुल पल इनके भी,
सृष्टि की विविधताओं का इक रूप है यह भी!

नारी तो है अधिष्ठाता शक्ति, प्रभुसत्ता, सम्मान की!

सत्य, शिव और सुन्दर जग में माता ही,
स्त्री रूप मे ईश्वर नें जग मे जना इनको ही,
लटों में इनके ही गंगा और गंगोत्री भी,
धरा के विविध स्वरूप की अलौकिक निधि स्त्री ही!

मन आज सोच रहा मेरा ........!

Monday, 7 March 2016

मन को भरम हर पल

भरम मन को हो रही हर पल आज किसकी.....?

एक छुअन सी महसूस हो रही हर पल,
एहसास अंजान खुश्बु की पल पल,
खामोशी फैली दिल के प्रस्तर पर प्रतिपल,
फिजाओं में पल पल कैसी है हलचल.......!

भरम मन को हो रही हर पल आज किसकी.....?

अदृश्य अस्तित्व क्यों हर पल उसकी,
ध्वनि है यह किस मूक आकृति की,
गुंजित हो रही वादियाँ ध्वनि से किसकी,
आह सी मन से निकल रही आज किसकी....!

भरम मन को हो रही हर पल आज किसकी......!

पत्तियों में पल पल ये सरसराहट कैसी,
सिहरन सी बदन में छुअन की कैसी,
जेहन में हर पल गूंजती ये आवाज कैसी,
एहसास नई जगी दिल मे आज कैसी.......!

भरम मन को हो रही हर पल आज किसकी.....?

वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता!

रंग साँवला मेरा, है प्यारा उनको,
वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता......!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....

पल पल वो तिल तिल मरती,
अन्दर ही अन्दर जीवन भर घुटती,
मन पर पत्थर रखकर वो जीती,
विरक्ति जीवन से ही हो जाती,
या शायद वो घुट घुट दम तोड़ देती!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....

पलकें अपलक उनकी ना खुलती,
भीगी चाँदनी में रंग साँवला कहाँ देेखती,
पुकारती कैसे फिर अपने साँवरे को,
विरहन सी छंदहीन हालत होती,
शायद जीवन ही सारी पीड़ा मय होती!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....

नैनों से सपने देखना वो भूल जाती,
रातें बीतती उनकी करवट लेती,
मन का चैन कही वादियों में वो ढ़ूंढ़ती,
दिन ढ़ल जाते उनके ख्वाहिशों में,
ये रातें शायद हसरतों वाली ना होती!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....

आँसुओं मे डूबी ये जीवन होती,
रातों में उनकी आँखें डबडब जगती,
जाने किन ख्यालों में खोई होती,
जीवन सारा बोझ सा वो ढ़ोती,
जीते जी शायद वो बेचारी मर जाती!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....
होता क्या? गर होता रंग गोरा मेरा........!

प्यारा प्यारा सा ये जीवन न होता,
एकाकीपन इस मन में पलता,
ना तू सजनी होती न मैं तेरा साजन होता,
मेरा भी कोई जीवन साथी न होता,
अधूरी तुम होती और अधूरा मैं मर जाता!

शायद!.....शायद क्या? सही में.....
वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता......!

Sunday, 6 March 2016

अमिट प्रतिबिंम्ब इक जेहन में

अमिट प्रतिबिंम्ब इक जेहन में,
अंकित सदियों से मन के आईनें में,
गुम हो चुकी थी वाणी जिसकी,
आज अचानक फिर से लगी बोलनें।

मुखर हुई वाणी उस बिंब की,
स्पष्ट हो रही अब आकृति उसकी,
घटा मोह की फिर से घिर आई,
मन की वृक्ष पर लिपटी अमरलता सी।

प्रतिबिम्ब मोहिनी मनमोहक वो,
अमरलता सी फैली इस मन पर जो,
सदियों से मन में थी चुप सी वो,
मुखरित हो रही अब मूक सी वाणी वो।

आभा उसकी आज भी वैसी ही,
लटें घनी हो चली उस अमरलता की,
चेहरे पर शिकन बेकरारियाें की,
विस्मित जेहन में ये कैसी हलचल सी।

मोह के बंधन में मैं घिर रहा अब,
पीड़ा शिकन की महसूस हो रही अब,
घन बेकरारी की सावन के अब,
अमिट प्रीत की स्पष्ट हो रही वाणी अब।

कर्ण सा दुर्भाग्य किसी का न हो!

हाय! ये भाग्य कैसा पाया था उस कुन्तीपुत्र कर्ण नें?

कोख मिला कुन्ती का किन्तु, कुन्ती पुत्र न कहलाया,
जिस माता ने जन्म दिया, उसने ही उसको ठुकराया,
कुल रत्न होकर भी,  कुल का यशवर्धन न बन पाया,
आह! विडम्बना ये कैसी,जीवन की कैसी है ये माया।

हाय! ये भाग्य कैसा पाया था उस दानवीर कर्ण नें?

उपाधि सूर्यपुत्र की पर,सूतपुत्र जीवन भर कहलाया,
कर्मों से बड़ा दानवीर पर, ग्यान का दान न ले पाया,
दान कवच-कुंडल का उससे, इंन्द्र नें कुयुँकर मांगा,
आह! ये कैसी विधाता की लीला, ये कैसी है माया।

हाय! ये भाग्य कैसा पाया था उस सूर्यपुत्र कर्ण नें?

ग्यान गुरू का पाने को,  कह गया छोटी सी झूठ वो,
सूत पूत्र के बदले खुद को, कह गया ब्राह्मण पूत्र वो,
शापित हुआ गुरू से तब, बना जीवन का कलंक वो,
अन्त समय जो काम न आया,पाया उसने ग्यान वो।

हाय! ये भाग्य कैसा पाया था उस महाग्यानी कर्ण नें?

Saturday, 5 March 2016

तू ले चल संग अपने देश

कौन सी देश से आए हो बटोही,
सूरत तेरी क्यों लगती प्यारी सी,
कितना प्यारा होगा तेरा देश वो,
तू ले चल मुझको अपने देश वो।

मन लगता नहीं मेरा इस देश में,
जाने क्या देखा  मैंने तेरे वेश में,
तुझ जैसा नहीं कोई मेरे देश में,
तू ले चल मुझको अपने देश में।

बातों में तेरी, कैसी जादूगरी सी,
मनमोहक मुस्कान तेरी ये कैसी,
सुगंध खुशियाें की तुम से आती,
तू संग लेचल अपने देश बटोही।

खुशियों का सौदागर

मैं खुशियों का व्योपारी, कहते मुझको सौदागर।

बेचता हूँ खुशियों की लड़ियाँ,
चँद पिघलते आँसुओं के बदले में,
बेचता हूँ सुख के अनगिनत पल,
दु:ख के चंद घड़ियों के बदले में।

सौदा खुशियों की करने आया मैं सौदागर।

सौदा मेरा है बस सीधा सरल सा,
सुख के बदले अपने दुख मुझको दे दो,
मोल जोल की भारी गुंजाईश इसमें,
जितना चाहो उतनी खुशियाँ मुझसे लो।

सौगात खुशियों की लेकर आया मैं सौदागर।

खुलती दुकान मेरी चौबीसो घंटे,
सौदा सुख का तुम चाहे जब कर लो,
स्वच्छंद मुस्कान होगी कीमत मेरी,
बदले में मुस्कानों की तुम झोली ले लो।

मैं खुशियों का व्योपारी कहते हैं मुझको सौदागर।

सुख दुख तो इक दूजे के संगी,
लेकिन संग कहाँ कहीं पर ये दिखते हैं,
इक जाता है तो इक आता है,
साथ साथ दोनो इस मन में ही बसते हैं।

सौगात जीवन की लेकर आया हूँ मैं सौदागर।

मन की दीवारों को टटोलकर देखो
सुख के गुलदस्ते अभी तक वहीं टंके हैं,
हृदय के अंदर तुम झाँककर देखो,
सुख का सौदागर तो रमता तेरे ही हृदय है।

ढ़ूंढ़ों तुम अपने हृदय में वही बड़ा है सौदागर।

रेत का समुन्दर

सब कहते हैं मुझको रेत का समुन्दर,
उन्हे नहीं पता क्या-क्या है मेरे अन्दर,
हूँ तो समुन्दर ही,भले रेत का ही सही,
एक दुनियाँ पल रही है मेरे अन्दर भी।

रेत तपकर ही बनती है मृग-मरिचिका,
तपती रेत पाँवों को देती असह्य पीड़ा,
चक्षु दिग्भ्रमित कर देती मृगमरीचिका,
समुंदर रेत का ही पर अस्तित्व है मेरा।

गर्मी रेत की शीतल हो जाती रातों में,
मरीचिका रेत की, है सुन्दर ख्वाबों में,
पल जाती है नागफनी भी  इस रेत में,
विशाल रेगिस्तान दिखती है सपनों में।

गर्भ में रेत के रहती हैं जिन्दगियाँ कई,
गर्भ में रेत की जीवन सुंदर नई नवेली,
करोड़ों आशाएँ  दफन रहती रेत में ही,
समुन्दर रेत का मगरअस्तित्व मेरा भी।

उथली जल धार टिकती मुझ पर नहीं,
सोख लेता हूँ प्राण, मैं उथले जल की,
स्नेह नहीं स्वीकार, मुझको बूंदों जैसी,
रेत का समुन्दर अपार जलधार प्यारी।

Friday, 4 March 2016

जब जब तुम हँसती हो

राग नए नए बन जाते हैं,जब जब तुम हँसती हो,

राग मल्हार बज गए तेरे हँसने से,
गीत बादलों ने अब छेड़ा है पीछे से,
बूँदों की झमझम कर रही करताल,
घटाएँ नृत्य कर रही ऩभ में विकराल।

लावण्य चेहरे की बढ़ जाती है जब तुम हसती हो,,

निराली छवि निखरी है चाँदनी सी,
होठों पर खिल गई हजार कलियाँ भी,
चाँद भी देखो शरमा रहा सामने नभ में,
तारों की बारात चल प़ड़ी आपके साथ में।

मोहक जीवन हो जाता है जब जब तुम हसती हो,

इक इक हँसी आपकी मरहम सी,
घाव हजार दुखों का जीवन के ये भर देती,
घायल चातक मैं आपके चितवन का,
आपकी मुस्कुराहट के मरहम का मैं रोगी।

तेरे सुर मे कोयल गाती है, जब जब तुम हसती हो।

राग ये कैसी छिड़ गई हँसने से आपके,
कूक कोयल की भूली है गीतों में आपके,
इस सुर की बहार फैली है अब चारो ओर,
मैं आपके गीतों का प्रेमी, है मेरा मन विभोर।

राग नए नए बन जाते हैं,जब जब तुम हँसती हो।

साऱांश तुम हो उपलब्धियों की

कहो तो, सारांश तुम ही हो जीवन के उपलब्धियों की !

तुम सार हो चिर सुख के लम्हों की,
तुम से ही प्रेरणा जीवन में कुछ करने की,
तुम विभूषित अनुभूति हो इस मन की,
मैं सह गया व्यथा तुम संग पूरे जीवन की।

कहो तो, सारांश तुम ही हो जीवन के उपलब्धियों की !

कायनात सपनों की तेरे ही दामन में,
डग लम्बे भरता हूँ तुम संग ही जीवन में,
आशा और विश्वास तुझसे ही मानस में,
जीवन का सार तुझसे ही इस मन प्रांगण में।

कहो तो, सारांश तुम ही हो जीवन के उपलब्धियों की !

इस मन वीणा की सुरमई संगीत तुम,
सप्तराग में गाती कोई मधुर सी गीत तुम,
उनमुक्त गगण के पंछी की आवाज तुम,
जीवन की अनुराग का संचित आधार तुम।

कहो तो, सारांश तुम ही हो जीवन के उपलब्धियों की !

तेरी साँसों की लय

जब जब तुमने सांसें ली थी आह मेरी भी निकली थी मन से!

तेरी साँसों की आती जाती लय में,
व्यथा उस जीवन की मैंने सुन ली थी,
व्यथित होता था मैं भी उस व्यथा से,
तब आह इस मन से निकल जाती थी।

विचलन इन साँसो की तेरी कह जाती थी मन की बातें सारी!

तुम मन को कितना भी बहलाओ,
रफ्तार इन साँसों की सब कह जाती है,
व्यथा की आग निकलती हैं साँसों से,
आह तब इस मन से निकल जाती है।

तेरी साँसों की लय का अंतरंग राही मैं, सुन लेता हूँ बातें सारी!

आह कैसे ना निकले इस मन से,
व्यथित जीवन मैं तेरी देख पाऊंगा कैसे,
ऐ सुख की घड़ियाँ तू जा मिल उनसे,
साँसों की लय मे तू बस जाना उनके।

बीते सारा जीवन तेरा, साँसों से सुख की लड़ियाँ गिनते गिनते!

साँसें तुम लेती रहना सुख चैन की,
आह मैं भी भर लूंगा तब अपने मन की,
तेरी खुशियों की लय पर जी लूंगा मैं,
व्यथा इस जीवन की तब ही कम होगी।

जब तक तुम सांसें लोगी जीवन में, आह भर लूंगा मैं भी मन से!

Thursday, 3 March 2016

ध्रुव सा यह स्मृति क्षण

ढ़लता सांध्य गगन सा जीवन!

क्षितिज सुधि स्वप्न रँगीले घन,
भीनी सांध्य का सुनहला पन,
संध्या का नभ से मूक मिलन,
यह अश्रुमती हँसती चितवन!

भर लाता ये सासों का समीर,
जग से स्मृति के सुगन्ध धीर,
सुरभित  हैं जीवन-मृत्यु  तीर,
रोमों में पुलकित  कैरव-वन !

आदि-अन्त दोनों अब  मिलते,
रजनी दिन परिणय से खिलते,
आँसू हिम के सम कण ढ़लते,
ध्रुव सा है यह स्मृति का क्षण!

अकस्मात् ही

कुछ मन की खुशी, अकस्मात् मिली यूँ,
रेत भीग गई हो कहीं, रेगिस्तान में  ज्यूँ,
जैसे जून में जमकर बरसी है बारिश यूँ,
कौंध गया है मन जैसे ठंढ़ी फुहार में यूँ।

हठात् मिल जाता है जब मनचाहा कोई,
खुशी मिलन की तब हो जाती है दोगुनी,
अकस्मात् बिछड़े जब, मिल जाते कहीं,
जीने की चाहत तब, बढ़ जाती और भी।

बिजली कौंधती बारिश मे अकस्मात् ही,
बूंद बनती है मोती सीप में अकस्मात् ही,
आसमान मे छाते हैं बादल अकस्मात् ही,
दो दिल मिलते हैं जीवन में अकस्मात ही।

पल पल की ये खुशियाँ जीवन की निधि,
हर पल जीवन जीने की देती है ये शक्ति,
अकस्मात् गले किसी को लगा लो अभी,
मंत्र शायद खुश रहने का जीवन में यही।




Wednesday, 2 March 2016

गरीब होना क्या गुनाह?

कोई बताए! गुनाह है क्या गरीब होना भी?

चीथडों में लिपटा है इक गरीब,
क्या पाया है उसने भी नसीब ?
मिला उसको भी  हैै एक शरीर,
कहलाता वो भी है इक इंसान।

मानव श्रृंखला की वो इक कड़ी,
श्रृंखला ये उसके बिन पूरी नहीं,
नंगा वो,पर है अहमियत उसकी,
गरीब मर जाना उसकी नियति?

सोचता हूँ,क्या जीवन है ये भी?
संवेदना गुम कहाँ इन्सानों की ?
विसंगति कैसी! ये श्रृंखला की?
गुनाह है! क्या  गरीब होना भी?

सोंचे क्या संवेदनशील इन्सान हैं आप भी?

बेगुनाह का गुनाह

अब गुनाहों का फैसला तो विधाता ही करेगा,
क्या सही? क्या गलत? तय बस वही करेगा!
हम तो बस तुच्छ इंसान क्या हमको दिखेगा?

जरूरतों से आगे सोच इंसान की जाती नहीं,
पग-पग लेती परीक्षा यहाँ जरूरतें जीवन की,
फुर्सत किसको गलत सही निर्णय करने की,
गुनाह होते हैं यहाँ कई बेगुनाहों के हाथों ही।

आग पेट की बुझाने को कोई छीन रहा रोटी,
कोई तन ढकने को कपड़ा छीनता किसी की,
बद से भी बदतर है , हालात यहाँ जीवन की,
बेगुनाह वो जरूरतमंद गुनाहगार हालात की।

अब इस गुनाह का फैसला विधाता ही करेगा,
क्या सही? क्या गलत? तय अब वही करेगा!
हम तो बस तुच्छ इंसान क्या हमको दिखेगा?

उपेक्षित मन

रखा था मैंनै सहेज कर मन को,
उस दरवाजे के पीछे लाल दराज में,
जाने कहाँ गुम आज सुबह से वो,
दिखाई देता नही क्या नाराज वो?

कुछ कहा सुनी हुई नही मन से,
जाने किसने छेड़ा आज उस मन को,
दुखा होगा शायद दिल उसका भी,
पहले तो ना था इतना नासाज वो!

कल जब की थी उससे मैने बातें,
तब खुश बड़ा दिख रहा था मन वो,
आज अचानक है बीती उसपे क्या?
बंद पड़ी आज क्यों आवाज वो?

मन का हृदय भी होता है शायद!
बात चुभी है क्या कोई उसको?
या फिर संवेदना जग गई है उसकी!
समझ सका नहीं मैं आवाज मन की?

जैसे तैसे रख छोड़ा था मैंने उसको ही,
लाल दराज के कोने मे दरवाजे के पीछे ही,
सुध मैने ही ली नही कभी उसकी,
उपेक्षा मेरे ही हाथों से हुई आज मन की?

ओह ये क्या? मन तो यहीं पड़ा है!
तकिए के नीचे शायद कुचल गया वो,
आवाज रूंध चुकी है थोड़ी उसकी,
कम हो रही रफ्तार मन के सांसों की!

मन तो है मतवाला करता अपने मन की,
मन की ना सुनो तो ये सुनता कहाँ किसी की,
मन दिखलाता आईना आपके जीवन की,
विकल होने पहले सुन लो तुम साज इस मन की!

Tuesday, 1 March 2016

मेरी दुल्हन

सिहरित उल्लास सशंकित विश्वास उस दुल्हन की!

वो पहली झलक मेरे दुल्हन की,
सिन्दूरित मुख लाल सौम्य दैदिप्य सी,
खुशबु वो कच्ची कच्ची हल्दी सी,
हाथों में दूर मेंहदी की लाली सी,
मंजर ऐसी जैसे आम मंजराई सी|

सिहरित उल्लास सशंकित विश्वास उस दुल्हन की!

अलबेली झलक उस दुल्हन की,
खुद को खुद में ही जैसे सिमटाई सी,
सुध बुध खोई सिमटी शरमाई सी, 
आँचल के कोरों में वो लिपटी सी,
चाह मन की थोड़ी थोड़ी मंजराई सी|

सिहरित उल्लास सशंकित विश्वास उस दुल्हन की!

चेहरे पर उसके एक भाव डर की,
शंका दुविधा कैसी मन में गहराई सी,
उलझन के बादल मन पर छाई सी,
हृदय व्यथित, विचलित, घबराई सी,
आँखों में उसकी नव जीवन मंजराई सी|

सिहरित उल्लास सशंकित विश्वास उस दुल्हन की!

मोह भंग

मोह भंग हो चुका, अब जीने की तैयारी!

मोहिनी सूरत वो, मोहती मन जो,
जंजाल माया का हर लेती मन वो,
अंजान बंधन से कर देती विवश वो,
पर टूटा है अब मोह का पिंजड़ा वो|

मायावी हिरनी सी मोहलीला उसकी,
मोहपाश के वश में करती प्राण सबकी,
सींखचे इस पिंजड़े की बड़ी शख्त सी,
मोह बंधनों से दूर पर अब मैं मुक्त सी|

अनुबंध मोह की जीवन पर भारी,
शर्तें अनुबंध की जैेसे मरने की तैयारी,
मोहनी इन शर्तों की सूरत है न्यारी,
टूटे हैं वो शर्त जो जीवन पर हैं भारी|

मोह भंग हो चुका, अब जीने की तैयारी!

अक्सर वो एकाकीपन

अक्सर अन्त:मानस मे एकाकीपन की कसक सी,
अंतहीन अन्तर्द्वन्द अक्सर अन्तरआत्मा में पलती,
मानस पटल पर अक्सर एक एहसास दम तोड़ती|

अक्सर वो एकाकीपन बादल सा घिर आता मन में,
दर्द का अंतहीन एहसास अकसर तब होता मन मैं,
तप, साधना, योग धरी की धरी रह जाती जीवन में|

अक्सर रह जाते ये एहसास अनुत्तरित अनछुए से,
अंतहीन अनुभूति लहर बन उठती अक्सर मन से,
तब मेरा एकाकीपन अधीर हो कुछ कहता मुझसे|