Saturday, 30 April 2016

समय की सिलवटें

गुजरता यह समय, कितने ही आवेग से........!

कुलांचे भर रही,
ये समय की सिलवटें,
बड़ी ही तेज रफ्तार इसकी,
भर रही ये करवटें,
रोके ये कब रुक सका है, आदमी के वास्ते।

फिर किस वास्ते,
हैं शिकन की ये लकीरें,
किसका ये कब हो सका,
रोए है तू किसके लिए,
बदलता रहा है समय हमेशा, करवटें लेते हुए।

कुछ साँसें मिली,
है तुझे वक्त की ओट से,
जी ले यहाँ हर साँस तू,
इन मायुसियाें को छोड़ के,
फिर कहा तू जी सकेगा, इस समय की चोट से।

राहें मुड़ गईं

ये राहे हैं मेरी प्रीत की, इन राहों से इतर मैं जाऊँ किधर?

कब ये राहें मुड़ गई, बेखबर हैं वो अब तलक,
अंजान अपनी ही धुन में, बढ़ चले वो जाने किधर,
कौन सुनता है सदाएँ, गुजरे हुए उन राहों की,
उन राहों की ठोकरों से, अब तक रहे वो बेखबर।

तुमको सदाएँ देती रहेंगी, मंजिलें उन राहों की,
जिन राहों की मंजिलों से, अब तक रहे तुम बेखबर,
कौन सुनता है सदाएँ, गुजरे हुए उन मंजिलें की,
आज अपनी धुन में हो तुम, कल की तुमको क्या खबर।

हम आज भी है खड़े, राह की उस मोड़ पर,
मुड़ गए थे वो जहाँ से, बाहें लगन की छोड़कर,
कौन सुनता है सदाएँ, गुजरे हुए उस मोड की,
कल मिलेंगे उस मोड़ पर ही, जाना है तुमको भी उधर।

किस गगन की ओर

ये खुला आसमाँ, पुकारता है अब किस गगन की ओर?
उड़ने लगे हैं जज्बातों के गुब्बारे आसमान में,
पंख पसारे उमरते अरमानों के रथ पर,
ये एहसास कैसे उठ रहे हैं अब इस ओर..............!

मन कब रुका है, उड़ चला ये अब उस गगन की ओर!
रुकने लगे हैं जज्बात ये मन के ये किस गाँव मे,
वो गाँव है क्या, उस नीले गगन की छाँव में,
छाँव वो ही ढूंढ़ता, मन ये मेरा उस ओर.......!

रोक लूँ मैं जज्बात को, क्युँ चला ये उस गगन की ओर,!
कोई थाम ले उन गुब्बारों को उड़ रहा है जो बेखबर,
क्युँ थिरकता बादलों में, लग न जाए उसको नजर,
वो उड़ रहा बेखबर, अब किस गगन की ओर.....!

धड़कनें बेताब कैसी, कह रहा चल उस गगन की ओर!

Friday, 29 April 2016

कह भी देेते

हसीन सी होती ये जिन्दगी, कह भी देते जो बात वो।

कहीं कुछ तो है जो कह न पाए है वो,
कोई बात रुक गई है लबों पे आ के जो,
बन भी जाती इक नई दास्ताँ, कह भी देते जो बात वो।

चुप चुप से वो बैठे लब क्युँ सिले हैं वो,
जाने कब से इन सिलसिलों में पड़े हैं वो,
हँस भी देती ये खामोशियाँ, कह भी देते जो बात वो।

ये जरूरी नही कि कह दें मन की बात वो,
कह देती हैं सब ये नजरें, चाहे हों जज्बात जो,
रोके रुके हैं कब जज्बात ये, कह भी देते जो बात वो।

कुछ और होती ये जिन्दगी, कह भी देते जो बात वो।

Thursday, 28 April 2016

सुर के गिरह

सुर साधूँ तो मै कैसे,
बार-बार न जाने कितनी बार,
टूटा है मेरा सुर हर बार।

गिरह पड़े हैं सुर में मेरे,
तार-तार सुर के न जाने क्युँ बेजार,
स्वर मेरे लड़खड़ाए हैं हर बार।

संगम हो कैसे सुर का?
नाल-नाल मृदंग जब हो ना तैयार,
गीत मेरे भटके है हर बार।

सुर सधते गीत बजते,
जब-जब पायल की तेरी हो झंकार,
खुल जाते सुर के गिरह हर बार।

खालीपन अब संग

मैं और मेरा खालीपन, अब दोनो ही रहते हैं संग!

कभी-कभी अजीब सा खालीपन,
गहराता मन के अन्दर,
जैसे सायों सा लहराता है,
अंधियारा स्याह रातों के भीतर।

उथला सा ये मन कब तक सह पाए,
कौन भरे मन का खालीपन,
मन बोलता है मन से,
आँखें मीचे मन बस सुनता ही जाए।

मन का खालीपन एहसासों का भूखा,
कोई तो जग में होता,
जो मन के एहसासों को सुनता,
ये खालीपन खुद मे ही खुद को ढूंढ़ता।

मैं और मेरा खालीपन अब दोनो हैं संग,
कभी-कभी मिल बैठते हम निर्जन में,
ठिठकता तब मेरा एकाकीपन,
फिर लगा लेता तब वो मुझको अपने अंग।

मैं और मेरा खालीपन, अब दोनो ही रहते हैं संग!

अपरिचित अपना सा

परिचित ही था मेरा वो, अपरिचित मुझको कब था वो!

यह कैसा परिचय, एक अपरिचित शख्स से,
ओझल है जो अबतक परिचय की नजरों से,
कल्पना की सतरंगी घोड़ों पर चढ़ आता वो,
परिचय की किन डोरों से मन को बांधता वो।

परिचित लगता अब वो, अपरिचित मुझको कब था वो!

हम कहते है जिसे परिचय, क्या सच में है वो,
या प्रतिविम्ब है इक, या बस इक छलावा वो,
अपरिचित सा जब भी कोई इस जीवन में हो,
प्रश्न अनेंकों मन में, उठने लगते न जाने क्यों।

परिचित होने से पहले, अपरिचित से लगते क्युँ वो!

कल्पना हो या छलावा, मन को है प्यारा वो,
अन-सुने गीत यादों में, हर पल गनुगुनाता वो,
अनुराग स्पर्श के, कल्पनाओं में अलापता वो,
जन्मों का ये परिचय, अपरिचित कब था वो।

परिचित सदियों से वो, अपरिचित मुझको  कब था वो!

Wednesday, 27 April 2016

कहता है विवेक मेरा

कहता है हृदय मेरा, चल ख्वाहिशों का मुँह मोड़ दे तू।

तमन्नाओं की महफिल फिर जगमगाई है कहीं,
कहता है मन,
गीत कोई अधूरा सा तू गाता ले चल,
रस्मों की दम घोंटती दीवारों से,
तू बाहर निकल आ चल।

अधूरी ख्वाहिशों के शहर मे तमन्ना जागी है फिर,
कहता है दिल,
परिदें ख्वाहिशों के उड़ा ले तू भी चल,
छुपी है जो बात अबतक दिल मे,
कह दे तू भी आ चल।

महफिल ख्वाहिशों की ये, तमन्नाओं को पीने दे फिर,
कहता है विवेक,
मैं ना निकलुंगा आदर्शों की लक्ष्मन रेखा से,
तमन्ना मेरी पीकर भटके क्युँ,
चल ख्वाहिशों का मुँह मोड़ दे तू।

कहता है हृदय मेरा, विवेक की अनदेखी ना कर तू।

वो बेपरवाह

वो बेपरवाह,
सासों की लय जुड़ी है जिन संग,
गुजरती है उनकी यादें,
हर पल आती जाती इन सासों के संग।

वो बेपरवाह,
बस छूकर निकल जाते है वो,
हृदय की बेजार तारों को,
समझा है कब उसने हृदय की धड़कनो को।

वो बेपरवाह,
अपनी ही धुन मे रहता है बस वो,
परवाह नही तनिक भर उसको,
पर कहते है वो प्यार तुम्ही से है मुझको।

वो बेपरवाह,
हृदय की जर्जर तारो से खेले वो,
मन की अनसूनी कर दे वो,
भावनाओं के कोमल धागों को छेड़े वो।

वो बेपरवाह,
टूट टूट कर बिखरा है अब ये मन,
बेपरवाह वो कहता है धड़कन,
बंजारा सा फिरता अब व्याकुल बेचारा मन।

वो बेपरवाह,
झाक लेती गर हृदय के प्रस्तर में वो,
सुन लेती गर सासों की लय वो,
जीवन के लम्हों से लापरवाह ना होते वो।

वो बेपरवाह,
ललाट पर बिंदियों की चमकती कतारें होती,
सिन्दुरी मांग अबरख सी निखर उठती,
सुन्दर सी मोहक तस्वीर इस धड़कन में भी बसती।

व्यस्त जिन्दगानी

व्यस्त लम्हे, हकीकत हैं ये जीवन के,
पल भर को फुर्सत नही साँसें लेने की चैन के,
रफ्तार से घूम़ती हैं, ये पहिए जिन्दगी के,
जरूरतों के आगे पिसती है, जरूरत जिन्दगानी के।

कब रुके हम, कब साँसों को झकझोरा,
जाने किन राहों पर हमने खुद को ही रख छोड़ा,
खुद से ही पूछते है हम कभी खुद का पता,
व्यस्तताओं के आगे विवश, हमारी आवश्यकता।

शून्य संग्याहीन हो चुके मन के भाव सारे,
निर्णय के दोराहों पर जाने कितने ही पल गुजारे,
हारी है चाह मन की असंख्य बार जीवन में,
भौतिकता के आगे हरबार टूटे हैं घर कल्पनाओं के।

कोमलता हंदय की दबी व्यस्तताओं में,
खूबसूरती लम्हो की रहती अनदेखी वर्जनाओं में,
जज्बातों के घरौंदे जलते जीवन की भट्ठी में,
एहसासों के राख पर ही महल बनते जिन्दगानी के।

तन्द्रा भंग हुई अब व्यस्त लम्हों की मजार पर,
कशिश आह भरी दिल में, रंजिश उन गुजरे लम्हों पर
आँसू छलके हैं नैनों में, हृदय हो रहा बेजार पर,
गुजरे वक्त के आगे विवश, बैठा जज्बातो के ढ़ेर पर।

Tuesday, 26 April 2016

ऐ मन तू सपने ही देख

ऐ मन, तू बस सपने ही देखता रह निरंतर.......,

तेरी भ्रम की दुनियाँ ही है अच्छी,
तू नहीं जानता सत्य मे है कितनी पीड़ा,
सत्य से अंजान तेरी अपनी ही है इक दुनिया,
जहाँ दु:ख का बोध सर्वथा नही,
दुःख हो भी तो, हो बस सपनों जैसे ही क्षणभंगूर।

ऐ मन, तू बस सपने ही देखता रह निरंतर......

सपनों मे तेरे क्या-क्या दिख जाता है,
बेगानों मे भी कोई अपना सा लग जाता है,
कष्ट-विषाद के कण हो जाते हैे धुमिल,
ऐ मन, इन क्षणिक एहसासों को बांधे रख तू खुद में,
ताकि मै भी कर पाऊँ सुख बोध कुछ इनके पल भर।

ऐ मन, तू बस सपने ही देखता रह निरंतर........

काश, कभी टूटते ना मन के ये सपने,
इन्सानों के मन मे हरपल फूटते नए इक सपने,
गम के इन अंकुरों से होते सदा हम अंजाने,
विछोह विषाद के ये पल जीवन से होते बेगाने,
हर दिल में बहते वसुधैव कुटुम्बकम के ही बस झरने।

ऐ मन, तू बस सपने ही देखता रह निरंतर........

Monday, 25 April 2016

वो मेरा गाँव

वो मेरा गाँव!
अंजाना सा क्युँ लगता है अब?
बेगाने हो चले हैं सब,
अंजाना सा लगता है वो अब,
इस मन मंदिर मे ही कही,
रहता था मेरा वो रब,
बिसरे है सब, बिसरा मेरा वो रब,
बिछड़ा है मेरा मन,
कही भीड़ मे ही अब,
वो गाँव! मेरा नहीं वो अब................!

वो मेरा गाँव!
अंजानों की बस्ती है अब,
कहने को अपने पर बेगाने हैं सब,
अंजाना मेरा मन अपनों में अब,
कहता है मेरा ये मन,
चल एे दिल, कही दूर चल अब,
सपने तेरे हो जहाँ,
कोई मन का मीत तेरा हो जहाँ,
छोटी सी ही हो दुनियाँ,
पर कोई तेरा अपना तो हो वहाँ,
वो गाँव! अब मेरा है वो कहाँ................?

वो मेरा गाँव?
अब कौन दे तुझको...?.......
झिलमिल आँचल की छाँव,
ममता की मीठी सी थपकी,
और स्नेह की दुलारी सी मुस्कान,
गाँव अब वो मेरा नहीं,
वो मेरे सपनों का अब रैन बसेरा नहीं,
वहाँ इन्तजार मेरा नहीं,
वो गाँव की पीपल अब देती नही है छाँव,
एे मन! अब मेरा नही वो गाँव,
ऐ मन तू धीरज रख, अब मेरा नहीं वो गाँव......!

वो अंजान से

मैं हृदय की कहता ही रहा, वो अंजान से बने रहे सदा...

मेरे हृदय की बेमोल व्यथा कौन सुनता है यहाँ,
कितने ही अलबेले तरंग हरपल मन में पलते यहाँ,
मिथ्या सी लगती हैं सारी अनकही कहानियाँ,
कुछ इस तरह ही रही गुजरते लम्हों की मेरी दास्ताँ।

मैं हृदय की कहता ही रहा, वो अंजान से बने रहे सदा...

साँसो की वलय कितने ही इस पल को हैं मिले,
कितने ही सपनों ने आँखों में छुपकर ही दम तोड़े,
जज्बातें हरपल पिसती रही इस मन के भीतर,
कुछ इस तरह रही जिन्दगी के लम्हों की पूरी कारवाँ।

मैं हृदय की कहता ही रहा, वो अंजान से बने रहे सदा...

अब मैं हूँ और संग मेरे कठोर हो चुका मेरा हृदय,
अनकही कहानियाें की टूटी दीवारे बिखरी हुई हैं यहाँ,
लम्हा-लम्हा गुजरे वक्त का बिखरा सूना सा यहाँ,
कुछ इस तरह रही अनसुनी हृदय की अधूरी कहानियाँ।

मैं हृदय की कहता ही रहा, वो अंजान से बने रहे सदा...

Sunday, 24 April 2016

निःशब्द

निःशब्द कोई क्युँ बिखरे इस धरा पर,
निष्प्राण जीवन कैसे रह पाए इस अचला पर,
बिन मीत कैसे सुर छेड़े कोई यहाँ पर,
आह! स्वर निःशब्दों के निखरते आसमाँ पर।

प्रखर हो रहे हैं अब, निःशब्द चाँदनी के स्वर,
मूक शलभ ने भी ली है फिर यौवन की अंगड़ाई,
छेड़ी है निस्तब्ध निशा ने अब गीत गजल कोई,
तारों के संग नभ पर सिन्दूरी लाली छाई।

कपकपी ये कैसी उठी, निःशब्दो के स्वर में,
आ छलके है क्यूँ नीर, निःशब्दों के इन पलकों में,
हृदय उठ रही क्यूँ पीर निःशब्दों के आलय में,
काश! कोई तो गा देता गीत निःशब्दों के जीवन में।

Thursday, 21 April 2016

मन में प्रतीक्षा के ये पल

साँसे लेती रहें सदा, प्रतीक्षा के ये पल मन में!

सुन ओ मीत मेरी,
प्रतीक्षा की उन्मादित पल के,
गीत वही फिर गाता है मन,
तेरी कल्पित मधुर प्रतीक्षा के।

गीत गाती रहें सदा, प्रतीक्षा के ये पल मन में!

सिहरन बिजुरी सी,
कैसी प्रतीक्षा की इस क्षण में,
ये राग बज रहे विषम,
आस-निराश की उलझन में।

सुलगती रहें सदा, प्रतीक्षा के ये पल मन में!

प्रतीक्षा की ये घड़ियाँ,
होते मादक मिलन के पल से,
तरंग पल-पल उठते,
सिहरित आशा की आँगन में।

तरंगित होती रहें सदा, प्रतीक्षा के ये पल मन में!

ओ मेरे प्रतीक्षित मीत,
प्रतीक्षा की पल को तु कर दे विस्तृत,
धुन वही एक तेरी होती रहें तरंगित,
पलकें बिछ जाएँ बस इक तेरी आशा में।

साँसे लेती रहें सदा, प्रतीक्षा के ये पल मन में!

प्रतीक्षारत

स्नेह मन का प्रतीक्षारत, तुम प्रतीक्षा के ये पल ले लो!

मैं सागर प्रीत का एकांत स्नेह भरा,
सिहरता पल-पल प्रतीक्षा की नेह से भरा,
प्रतीक्षा की इल पल को स्नेहित कर दो,
नेह का तुम मुझसे इक अटूट आलिंगन ले लो।

गीत मन की प्रतीक्षारत, तुम गीत मेरे मन के ले लो!

सुन ऐ मेरे मन के चिर प्रतीक्षित मीत,
कहता है कोई, प्रतीक्षा तो स्वयं भी है एक गीत,
बार बार जिसको जग कर ये मन गाता है,
तुम मेरी प्रतीक्षा का चिर स्नेहित गीत ले लो।

युगों से मन प्रतीक्षारत, तुम प्रतीक्षा के ये युग ले लो!

प्रतीक्षा इस सागर की गहराती हर पल,
गीत वही इक धुन की चिर युगों से प्रतीक्षारत,
प्रतीक्षा के गीतों मे मैं जब-जब जागा हूँ,
कहता उस पल ये मन, हृदय तुम मेरा ले लो।

जागा हूँ मैं प्रतीक्षारत, नींद के पल मेरे मुझको दे दो!

Wednesday, 20 April 2016

लहराते गेसुओं संग

गेसुओं की काली लटों मे राज गहरे छुपे हैं कितने।

खुल के लहराए है ये,
किसके गेसु उन बादलों संग,
बिखर गई है जैसे खुश्बु,
हर तरफ इन हवाओं के संग,
जाल से बिछ रहे हैं,
अब यहाँ इन गेसुओं केे,
बंध रहा हर पल ये मन,
भीनी-भीनी उन गेसुओं संग।

खुल गए हैं राज गहरे, कितने ही इन गेसुओं के।

कुछ अलग ही बात है,
लहराते घनेरे से इन गेसुओं में,
उलझी हैं ये राहें तमाम,
घुँघरुओं सी इन गेसुओं में,
लट ये काले खिल रहे हैं,
इन बादलों संग उस ओट में,
बिखरे है हिजाब गेसुओं के,
मदहोशियों सी इन धड़कनों में।

उलझे हुए सब जाल में ही, इन शबनमी गेसुओं के।

Tuesday, 19 April 2016

मानव बन सकें हम

अवधारणा ही रही यह मेरी कि मानव हैं हम,
विमुख भावनाओं से सर्वदा, क्या सच में मानव हैं हम?

कहीं तोड़ देते ये हृदय किसी का,
जाति-धर्म की संवेदनहीन सियासत में,
घृणा द्वेष दे जाते ये यहाँ  विरासत में,
स्व से उपर कहाँ उठ सके हम,
भावनाओं से परे लगे हैं, निज की स्वागत में।

विडम्बना जीवन की, कि कहलाते मानव हैं हम!
खून पी जाते हैं नरभक्षी बन, क्या सच में मानव हैं हम?

सद्भाव की सारी बातें लगती हैं तृष्णा सी,
जहर घुल चुके दिलों में सुखचैन हुए मृगतृष्णा सी,
काँटे बोए है खुद ही, काट रहे फसल घृणा की,
निज स्वार्थ से ऊपर कहाँ उठे हम,
बातें करते हैं हम विश्व और जगत कल्याण की।

प्रार्थना है मेरी ईश्वर से कि मानव तो बन सकें हम!
बीज भावना के बोएँ, जीवन के सम्मुख हो सकें हम!

अधूरे सपने

अधूरे सपने ! ये संग-संग ही चलते है जीवन के!

अधूरे ही रह जाते कुछ सपने आँखों में,
कब नींद खुली कब सपने टूटे इस जीवन में,
कब आँख लगी फिर जागे सपने नैनों में।

अधूरे सपने ! सोते जगते साथ साथ ही जीवन में!

सपनों की सीमा कहीं उस दूर क्षितिज में,
पंख लगा उड़ जाता वो कहीं उस दूर गगण में,
कब डोर सपनों की आ पाई है हाथों में।

अधूरे सपने ! पतंगों से उड़ते जीवन के नील गगन में!

पलकों के नीचे मेरी सपनों का रैन बसेरा,
बंद होती जब ये पलकें सपनों का हो नया सवेरा,
अधूरे उन सपनो संग खुश रहता है मन मेरा।

अधूरे सपने ! ये प्यार बन के पलते हैं मेरे हृदय में।

कहाँ मेरी हाला

मेरी हाला है किस मदिरालय में? ढू़ंढ़ता ये मतवाला!

मादक मद का लबालब प्याला,
ढू़ंढ़ता है नित ये मतवाला,
मदिरा पीने को रोज ही,
जाता हूँ मैं मधुशाला,
मदिरा की प्यालों में लेकिन,
मिलती कहाँ मन की हाला।

मेरी हाला है किस मदिरालय में? ढू़ंढ़ता ये मतवाला!

मदिरालय की हर प्याले को,
इन होठों से मैं छू लेता हूँ,
भर-भरकर उन प्यालों को,
घूँट-घूँट मै पी लेता हूँ,
कंठ सूखते ही रहते फिर भी,
प्यासा ही रह जाता ये पीनेवाला।

मेरी हाला है किस मदिरालय में? ढू़ंढ़ता ये मतवाला!

कितने हीे सुंदर प्याले मदिरालय में,
सबसे सुंदर है मेरी प्याला,
उस प्याले मैं तैरता है जीवन,
जी उठता है ये मतवाला,
रख छोरा है मैने किस मधुशाला में,
मैने वो सुन्दर जीवन की प्याला।

मेरी हाला है किस मदिरालय में? ढू़ंढ़ता ये मतवाला!

Monday, 18 April 2016

अब कोई इन्तजार नहीं

अब कोई इन्तजार नहीं करता वहाँ उस ओर......

बँधी थी उम्मीद की हल्की सी इक डोर,
कुछ छाँव सी महसूस होती थी गहराती धूप में भी,
मंद-मंद बयार चल जाती थी यादों की हर पल,
कानों मे अब गुंजता है सन्नाटा चीरता इक शोर....,

अब कोई इन्तजार नहीं करता वहाँ उस ओर......

हजार सपनों संग बंधी थी जीवन की डोर,
तन्हाई मादक सी लगती थी उन यादों की महफिल में,
धड़क जाता था दिल इक हल्की सी आहट में,
जेहन में अब घूमता है विराना सा अंतहीन छोर.....

अब कोई इन्तजार नहीं करता वहाँ उस ओर......

सँवरता था कभी वक्त, मदभरी बातों के संग,
सिलसिले थे शामों के तब, उन खिलखिलाहटों के संग,
मिश्री सी तरंग तैरती थी गुमशुदा हवाओं में तब,
कहीं गुमशुम वो आवाज, क्युँ है अब खामोश दौर....

अब कोई इन्तजार नहीं करता वहाँ उस ओर......

लगन

आच्छादित तुम हृदय पर होते, गर लगन तुझ में भी होती !

मन की इस मंदिर में मूरत उनकी ही,
आराधना के उस प्रथम पल से,
मूरत मेरी ही उनके मन में भी होती,
तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी।
स्थापित तुम ही मंदिर में होते, गर लगन तुझ में भी होती !

नाम लबों पर एक बस उनका ही,
समर्पण के उस प्रथम पल से,
लबों पर उनके भी नाम मेरा ही होता,
तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी।
प्लावित तुम ही लब पर होते, गर लगन तुझ में भी होती !

हृदय के धड़कन समर्पित उनको ही,
चाहत के उस प्रथम पल से,
समर्पित उनका हृदय भी पूरा हो जाता,
तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी।
उन्मादित धड़कन ये तुम करते, गर लगन तुझ में भी होती !

आराधना के फूल अर्पित उनको ही,
पूजन के उस प्रथम पल से,
अर्पित कुछ फूल मुझको भी कर देते,
तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी।
आह्लादित जीवन के पल होते, गर लगन तुझ में भी होती !

Sunday, 17 April 2016

मेरे जज्बात

मैं बार-बार सोचता हूँ! मैं क्युँ न बन पाया उस हृदय और मन सा?

विश्वास की डोर हो या अधिकार या कहें कुछ और,
साथ समय के बदल जाते है यहाँ सब कुछ,
रिश्ते भावनाओं के हों, या हो बेनाम, या कुछ और!

एहसास बदल जाते है, कभी अन्जाने से रिश्तों में,
कभी रिश्ते बदल लेते हैं, जज्बातों के एहसास,
हृदय नही वो पत्थर हैं, बदल लेते है जो जज्बात!

कई बार मन सोचता है! एक ईन्सान के हैं कितने रूप ?

कभी भ्रम पैदा करता वो गहरे एहसासों का,
अपनेपन की बदलते मुखौटों में कभी वो मुस्काता,
जज्बातों को सहलाता अपनी मीठी बोली में तोलकर।

रिश्तों को परिभाषित करता अपनी जरूरतों में हर पल,
जज्बातों की गहराई से खेलता सँवारता अपना आनेवाला कल,
बदलते रिश्तों की इस दुनियाँ में, विश्वास ढ़ूढ़ता अपना ठौर।

वो हृदय! स्वरूप कैसा होगा उस हृदय की कोटरी का?
विश्वास की अधूरी धुन पर जो जानता है बखूबी धड़कना,
उसका मन? कैसा स्वरूप होगा उस इन्सान के मन का?

मैं बार-बार सोचता हूँ! मैं क्युँ न बन पाया उस हृदय और मन सा?

मिथ्या अहंकार

बिखरे पड़े हैं कण शिलाओं के उधर एकान्त में,
कभी रहते थे शीष पर जो इन शिलाओं के
वक्त की छेनी चली कुछ ऐसी उन पर,
टूट टूटकर बिखरे हैं ये, एकान्त में अब भूमि पर ।

टूट जाती हैं ये कठोर शिलाएँ भी घिस-घिसकर,
हवाओं के मंद झौकों में पिस-पिसकर,
पिघल जाती हैं ये चट्टान भी रच-रचकर,
बहती पानी के संग, नर्म आगोश मे रिस-रिसकर।

शिलाओं के ये कण, इनकी अहंकार के हैं टुकड़े,
वक्त की कदमों में अब आकर ये हैं बिखरे,
वक्त सदा ही किसी का, एक सा कब तक रहता,
सहृदय विनम्र भाव ने ही, दिल वक्त का भी है जीता।

ये अहम भाव तो, मिथ्या भ्रम होते हैं मन के,
टूट जातेे हैं अहंकार यहाँ हम इन्सानों के,
मृदुलता मन की, सर्वदा ही भारी अहम पर,
कोमलता हृदय की, राज करती सर्वदा इस जग पर।

Saturday, 16 April 2016

ख्वाब की बातें

वो ख्वाब, अाधा अधूरा, न जाने कहाँ इन पलकों में?

कुछ सुनहरे ख्वाब, रख छोड़े थे मैनें सहेज कर,
पलकों के पीछे लिपटे गीले कोरों में रख कर,
सो जाती थी वो, जागी पलकों में रो-रोकर,
फिर कभी जग जाती वो, बंद पलकों में हँस कर।

ख्वाब वो वर्षों से चुप, पलकों के गीले छावन में,
सूख रही हो, टूटी सी टहनी जैसे आँगन में,
जा बैठी हो कोई तितली, एक कटीली झाड़ी में,
अधूूरा ख्वाब वो, तिलमिला सा उठता आँखों में।

सोचता हूँ अब, काँच से ख्वाब पाले थे क्युँ मैंने,
ओस की बूँदें, क्या ठहरी है कभी बादल में?
संगीत अधूरा सा, क्या झंकृत हो पाया है जीवन में?
बरस परती हैं ये आँखें, टूटे ख्वाबो के संसर्ग में।

वो सुनहरा ख्वाब, अब अधूरा, न जाने कहाँ पलकों में?

बोझिल पलकें

धूल मैं उन राहों की, जिन राहों पे है मेरा प्रीतम वो।

नयन अभिराम निहारती हैं, बस अब राह वो,
जिस दुरूह पथ पर, चल पड़ा था मेरा अंजान वो,
छूटे थे दामन जहाँ, छूटा जहाँ था हाथ वो,
निष्पलक नैन निहारते, राह भूली अब दिन रात वो।

अविरल भीगीं से नैन, बोझिल सी पलकें हैं वो,
बस यादों में अंजान की, अनवरत खोई सी है वो,
लग रहा अंजान अब, शक्ल पहचानी सी वो,
दिल मे बसते थे कभी, बेगाने से अब लगते हैं वो।

चुभ रहे कील से अब, याद बनकर दिल में वो,
हसरत फूलों की थी, उजड़ा है अब गुलशन ही वो,
यादों में मूरत है उसकी, अब सपनों मे बस वो,
धूल मैं उन राहों की, जिन राहों पे है मेरा प्रीतम वो।

अंजाना

कुछ अंजान से शक्ल जो, यादों मे ही बस हैं आते!

साँसों में इक आहट सी भरकर,
कहीं खो गया वो, अंजान राहों मे टूटकर,
अब समय ठहरा हुअा है शिला-सा,
निष्पलक लोचन निहारती, साँसों की वो ही डगर।

चल रही उच्छवास, आँधियों की वेग से,
कहीं खोया है अंजान वो, धड़कनों की परिवेश से,
वो क्षण कहाँ रुक सका है, समय की आगोश से,
हृदय अचल थम रहा है, उस अंजान की आहटों से।

शक्ल अंजान एेसे क्युँ हृदय में समाते?
समय हर पल गुजरता, क्षण कहाँ उसमें समाते,
निष्पलक नैन वो जहाँ अब, सपने कभी आते न जाते,
अब अंजान सा शक्ल वो, यादों मे ही सिर्फ आते।

Friday, 15 April 2016

आपके कदम

आप रख दें जो कदम, जिन्दगी हँस दे फिर वहाँ !

कदम आपके पडते हों जहाँ,
शमाँ जिन्दगी की जल उठती हैं वहाँ,
गुजरती हैं तुझसे ही होकर चाँदनी,
आपके साथ ही चला तारों का ये कारवाँ।

चाँद का रथ आपकी दामन के तले,
नूर उस चाँद का आपके साथ जले,
तेरी कदमों के संग निशाँ जिन्दगानी ये चले,
शमाँ जलती ही रहे जब तलक आप कहें।

तम के साए बिखरे हैं बिन आपके,
बुझ रहे हैं ये दिए बिन आस के,
बे-आसरा हो रहा चाँद बिन आपके,
जर्रे-जर्रे की रुकी है ये साँसे बिन आपके।

आप रख दें जो कदम, जिन्दगी हँस दे फिर वहाँ !

तन्हाई के ख्याल

मैं और मेरा मन, तन्हाई मे जाने किन ख्यालो के संग?

ख्यालों के निर्झर सरिता मे वो बहती,
कलकल छलछल पलपल हरपल वो करती,
जाने किन शिखरों से चलकर वो आती,
झिलमिल सांझ ढ़ले किस सागर में मिल जाती,
ख्यालों के विरान महल में बस मैं और मेरी तन्हाई।

टकराती रह रह कर हृदय के इस तट पर,
शिलाओं सा टूटता रहता मैं तिल तिल घिस-घिस कर,
यादों के सैकत बिछ जाते हृदय के तल पर,
गहरा सा मन मेरा शिलाचूर्ण से फिर जाता भर,
कभी रुक जाते वो झील सी ख्यालों में बह बहकर।

खिल उठती कमल सी वो उस ठहरी झील मे,
समेटती अपनी चंचलता पलभर को अपने मन में,
बिखेरती वो सुंदर सी आभा उस उपवन में,
सपनों का वो घन सदियों से मेरे मन प्रांगण में,
इक ख्याल बन कर उभरता हर पल मेरी तन्हाई में।

मैं और मेरा मन, तन्हाई मे जाने किन ख्यालो के संग?

Thursday, 14 April 2016

चुरा लुँगा तुमको तुम्ही से

हम सफर में हैं आपके, तू ही इस सफर की है मंजिल।

यूँ चुरा लूँगा तुम्ही से मैं तुमको,
ले जाऊँगा फिर तन्हाईयों में कही तुमको,
पूछेंगी पता तुम्हारा ये दुनियाँ कभी,
मेरे दिल की राहों का पता बता देना तुम उनको।

आऊँगा रोज ही तेरी तन्हाईयों मे मैं,
चुरा लुंगा तेरे ख्वाब सभी तेरी आँखों से मैं,
देखोगे कभी ख्वाब तो नजर आऊँगा मैं,
तेरे दिल की जज्बातों में महल बना जाऊँगा मैं।

कहता है दिल मुझसे आ के कभी मिल,
पूछ ले नजरों से मेरी क्युँ चुराए है तेरा दिल,
रास्ते प्यार के ये तू ही है मेरी मंजिल,
ख्वाबों में रोज मिली अब हकीकत मे आके मिल।

चुरा ले तू मुझसे ही मुझको, हम यहीं जाएँ कहीं मिल।

अनसुना कोई गीत

अनकहा कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी!

यूँ तो आपने सुने होंगे गीत कई,
मिल जाएंगे आपको राहों में मीत कई,
कोई मिलता है कहाँ जो सुनाए अनकहा गीत कोई,
धड़कनों ने छेड़ी है मेरी इक संगीत नई,
आ सुना दूँ वो गजल तुझको, ओ मन मीत मेरी।

अनसुना कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी!

तेरी धड़कनों में बजे होंगे संगीत कई,
कहने वालों ने कहे होंगे गजल-गीत कई,
दिल धड़कता है मेरा गा रहा अनसुना गीत कोई,
गुनगना लूँ मैं आपके सामने संगीत वही,
आ सुना दूँ वो गजल तुझको, ओ मन मीत मेरी।

नग्मा-ए-साज नया गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी!

Wednesday, 13 April 2016

श्रृंगार

श्रृंगार ये किसी नव दुल्हन के, मन रिझता जाए!

कर रही श्रृंगार बहारें,
रुत खिलने के अब आए,
अनछुई अनुभूतियाें के अनुराग,
अब मन प्रांगण में लहराए!

सृजन हो रहे क्षण खुमारियों के, मन को भरमाए!

सजी शाख अमलतास के,
लचकती डाल फूलों के इठलाए,
नार गुलमोहर सी मनभावन,
मनबसिया के मन को लुभाए।

कचनार खिली अब बागों में, खुश्बु मन भरमाए!

यौवन इतराई बहारों के,
सावन के झूलों सा मन लहराए,
निरस्त हो रहे राह दूरियों के,
मनसिज सा मेरा मन ललचाए।

आलम आज मदहोशियों के, मन डूबा जाए!

तू पथ मैं पथिक

पथ घुमावदार,
पथिक इन राहों का मैं अंजाना,
असंख्य मोड़ इन राहों पर,
पा लेता मैं मंजिल जीवन की,
गर छाँव तुम अपनी आँचल का मुझको देते।

पथ रसदार,
जीवन के इस रस से मैं अंजाना,
अनंत मधुरस इस पथ पर,
पी जाता मैं अंजुरी भर भरकर,
गर प्याला तुम अपनी नैनों का मुझको देतेे।

पथ पथरीला,
चुभते इन काटों से मैं अंजाना,
कंकड़ हजार इस पथ पर,
चल लेता मैं नुकीले पत्थर पर,
गर दामन तुम अपना मखमल सा मुझको देते।

पथ एकाकी,
एकाकीपन इस भीड़ का न जाना,
खोया भीड़ मे इस पथ पर,
ढ़ूंढ़ लेता मैं अपने आप को पथ पर,
गर बसंत तुम अपने सासों का मुझको देते।

पथ लम्बा भ्रामक,
जीवन के इस भ्रम से मैं अंजाना,
लम्बे पथ पर छोटा सा जीवन,
जी लेता मै जीवन के पल जी भरकर,
गर मुस्कान तुम अपने जीवन का मुझको देते।

तुम भी गा देते

फिर छेड़े हैं गीत,
पंछियों नें उस डाल पर,
कलरव करती हैं,
मधु-स्वर में सरस ताल पर,
गीत कोई गा देते,
तुम भी,
जर्जर वीणा की इस तान पर।

डाली डाली अब,
झूम रही है उस उपवन के,
भीग रही हैं,
नव सरस राग में,
अन्त: चितवन के,
आँचल सा लहराते,
तुम भी,
स्वरलहर बन इस जीवन पर।

फिर खोले हैं,
कलियों ने धूँघट,
स्वर पंछी की सुनकर,
बाहें फैलाई हैं फलक नें
रूप बादलों का लेकर,
मखमली सा स्पर्श दे जाते,
तुम भी,
स्नेहमयी दामन अपने फैलाकर।

Tuesday, 12 April 2016

बिखरे सपने

मेरे सपनों की माला में, सजते कुछ ऐसे मोती,
खुशियाँ बिखरती चहुँ ओर, प्रारब्ध इक जैसी होती!

जीवन ऐसे भी धरा पर, बिखरे हैं जिनके सपने,
टूटी हैं लड़ियाँ माला की, बस टीस बची है मन में,
चुन चुनकर मोतियों को, सहेज रखे हैं उसनें,
सपने हसीन लम्हों के, पर उनके जीवन से बेगाने।

प्रारब्ध ही कुछ ऐसा, नियति ही कुछ ऐसी,
खुशियों के असंख्य पल बस हाथों को छूकर गुजरी,
बुनते रहे वो लड़ियाँ ही, मोतियाँ सब दामन से फिसली,
माला उस जीवन की खुद ही टूट-टूट कर बिखरी।

ऎसे भी जीवन जग में, साँसें चँद मिली हैं जिनको,
कैसे होते हैं सुख के पल, झलक भी मिल सकी न उनको,
उनके भी तो जीवन थे, फिर जन्म मिली क्युँ उनको?
किन कर्मों की सजा, उस विधाता नें दी है उनको।

मेरे सपनों की माला में सजते कुछ ऐसे ही मोती,
सपने पूरे कायनात की सजती बस इक जैसी,
हसते खेलते सभी जीवन में, कोलाहल क्रंदन ये कैसी?
खुशियाँ बिखरती धरा पर, प्रारब्ध सब की इक जैसी!

Monday, 11 April 2016

मूक प्राण

मूक प्राणों के निर्णय क्या ऐसे तय होते हैं जीवन में?

गुमसुम सी सजनी वो हाथों में मेंहदी रचकर,
इक सशंक जिज्ञासा पलती मन के भीतर,
अपरिचित सी आहट हर पल मन के द्वारे पर,
क्या वो हल्दी निखरेगी सजनी के तन पर?

द्वार हृदय के बरबस खोल रखें हैं उस सजनी नें,
कठिन परीक्षा देनी है उसे इक अनजाने को,
अपनेपन की परिभाषा इक नई लिखनी है उसको,
क्या वो अपरिचित अपनाएगा उस भाषा को?

मुक्ति भाव खोए से है सजनी की जड़ आँखों में,
भविष्य धुमिल है उसकी घनघोर कुहासों में,
पाँव थमें है स्तंभ शेष से, असमंजस है उसके मन में,
क्या मूक प्राणों के निर्णय ऐसे होते हैं जीवन में?

अनबुझे प्यास

है हाथों मे भरी गिलास,
पर इन अधरों पे अनबुझे से प्यास,
कुछ घूँट पी लेता हूँ मैं,
अधरों को नम कर लेता हूँ मैं,
पर अनबुझी सी फिर भी है वो प्यास।

प्यास कहाँ बुझती है इन प्यालों सें,
बढ़ जाती ये और इन प्यालों से,
प्यास छुपी पानी के अन्दर,
पानी के उपर ही तो ये प्याला तैरा है,
ये प्याला क्या अबतक अधरों पे ठहरा है?

सोचता हूँ मै भी तर जाऊँ,
इन प्यालों के संग लब को रंग डालूँ,
पहेली इस प्यास की मैं भी हल कर डालूँ,
प्यासे ये अधर क्ब तक रह पाएंगे,
जीवन की ये हाला हम पूरा पीकर जाएंगे।

अर्थ

इंतजार.....!

कैसा इन्तजार?
अर्थहीन हैं ....
इंतजार की बातें सभी!

हर शख्स....!

तन्हा यहाँ,
अब किसी को
किसी का इंतजार नहींं!

हर लम्हा ....!

जुदा है यहाँ ....
दूसरे लम्हे से.........
लम्हा जीता खुद में ही!

पल......!

आने वाला पल...
किसी का
तलबगार नहीं!

अर्थ....!

ढू़ढ़ता है हर पल,
खुद से खुद मेंं....
बस अपने आप में ही!

Sunday, 10 April 2016

तन्हाईयाँ मेरी कविता

तन्हाई मे ही कविता है, तन्हाई जीवन का दर्पण है!

कई बार हम तन्हा होते हैं,
तन्हाईयों से हम तब बातें करते हैं,
सच कहुँ तो, तन्हाईयों सा साथ जग कहाँ देते हैं।

ऊबती नहीं कभी वो मुझसे,
बातें मन की लाख तन्हाईयों से कर लो,
चुपचाप सुनती रहती हैं, मेरी अनाप-सनाप बातें।

विचलित पलभर को ना होती,
तन्हाई मे वो मेरे मन की गहराई तोलती,
झकझोरती मन के तार, फिर विस्मित कर देती।

मन का कवि फिर बोलता है,
ऐ तन्हाई तू तो कोलाहल से अच्छा है,
तन्हाईयों मे कल फिर मिलना, तू ही तो कविता है।

प्यार में तन्हाई के हम होते हैं,
तन्हाईयों में तब हम खुद से मिलते हैं,
खुद से मिलना गैरों से मिलने से तो ज्यादा अच्छा है।

तन्हाई मे ही कविता है, तन्हाई जीवन का दर्पण है।

उम्र के साथी

आ गई अब उम्र वो, तलाशता हूँ जिन्दगी को,
उम्र की इस दहलीज पे, साथ मेरे कोई तो हो।

कभी मगन हो लिए हम, खुद अपने ही आप में,
फिर कभी तलाशता हूँ, खुद में अपने आप को।

कहते हैं जिन्हे अपना हम, दिखते हैं वो दूर से,
पास अपनी इक जिन्दगी, क्युँ रहें हम मायूश से।

जिन्दगी की प्यारी सी धुन, हर घड़ी बजती रहे,
साए सी तुम संग-संग रहो, जिन्दगी चलती रहे।

तन्हा हैं जो इस सफर में, हम उनकी जिन्दगी बनें,
कुछ लम्हें जिन्दगीे, संग उनके भी हम गुजार लें।

खिल-खिलाएगी ये जिन्दगी, जहाँ तेरे कदम पड़े,
तलाशेंगी ये तुमको खुशी, उठकर आप कहाँ चले।

उम्र गुजर जाएगी ये, जिन्दगी के आस-पास ही,
साथी तेरे कहलाएंगे ये, इस जिन्दगी के बाद भी।

लब्जों मे बयाँ

लब्जों में बयाँ जो हम कर न सके,
अल्फाज वो ही दिलों में दबी रह गई,
वो फसाना बहुत खूबसूरत सा था,
बात गुजरे जमाने की अब वो हो गई।

वो अल्हड़ सी उनकी नादानियाँ,
शब्दों में लिखी जैसे अनकही कहानियाँ,
लब्जों पे रुकी लहर सी कहीं,
अब गुनगुनाती हुई कोई गजल बन गईं।

जुल्फ खुल के कभी लहराए थे,
खुली गेसुओं में कुछ धुंधले से साये भी थे,
सीरत-ए-बयाँ ये लब्ज कर न सके,
वो लहराते से मंजर अब यादों में बस गईं।

छलके नैनों में अब अक्श एक ही,
उन खुले नैनों में उभरी है इक तस्वीर वही,
नीर नैनों के लब्जों पे बह न सके,
वो छलकते से नैन अब जाम में ढ़ल गई।

मोहब्बत चीज क्या?

ये मोहब्बत है या ये नशा है कोई?
पल दो पल तो इस जाम में डूबे है सभी,
है चीज क्या ये मोहब्बत सिखा दे कोई?
क्युँ बिखरे है प्यार में दिल ये बता दे कोई?

क्युँ गुनगुनाता है भँवरा कलियों पे कहीं?
क्युँ खिल जाती है कलियाँ बाग में फिर वहीं?
क्युँ जान देते है पतंगे उन दियों पे कहीं?
क्युँ मरते हैं प्यार मे जवाँ दिल ये बता दे कोई?

उधर शाख पर पत्तियाँ लहलहाती हैं क्युँ?
उन कटीली टहनियों पर फूल मुस्कुराती है क्युँ?
धूप की ओर सुरजमुखी घूम जाती है क्युँ?
क्युँ जल उठते है दिए प्यार में ये बता दे कोई?

ये मोहब्बत है या ये नशा, ये मुझको बता दे कोई?

रात

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

वो रात के साए,
खामोश गुजरते रहे,
लगी रही बस एक चुप सी,
सन्नाटे मगर गुनगुनाते रहे रात भर।

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

वो रात टूटी सी,
रात रोती रही रात भर,
काली कफन में लिपटी सी,
झिंगुर मगर गुनगुनाते रहे रात भर।

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

वो रात गुमसुम सी,
कुछ कह गई थी कानों में,
सुन न पाए सपन में डूबे हम,
तारे मगर गुनगुनाते रहे रात भर।

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

वो रात खोई-खोई सी,
जाने किन उलझनों में फसी सी,
बरसती रही ओस बन के गुलाब पर,
कलियाँ मगर गुनगुनाती रही रात भर।

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

वो रात विरहन सी,
मिल न पाई कभी भोर से,
रही दूर ही उजालों के किरण से,
दीपक मगर गुनगुनाती रही रात भर।

डराती रही रात, मगर हम गुनगुनाते रहे रात भर!

Saturday, 9 April 2016

शब्द

फैले हैं जाल शब्द के, मायने उलझती ही रहीं!

शब्द बच गए थे पोटली में,
बातें इक तरफा ही रहीं,
शेष बातों के लिए शब्द तड़पती ही रहीं!

अब बिन मायनों के शब्द वे,
इकहरे दुबले पतले से,
पोटली के दायरों में शब्द सिमटती ही रही!

उस शब्द की विसात क्या,
सुन न पाए हम जिन्हे,
जज्बात विखरते रहे शब्द विलखती ही रही!

खोल दी है मैनें उस पोटली को,
खुल के साँस शब्द लें सकें,
व्यक्त हो रहे भाव अब शब्द हँसती ही रही!

पर ये क्या?

शब्द ही उलझे है शब्द से,
जाल शब्दों के बने,
एहसास शिथिल हैं अब शब्द बिखरती रही!

इस सफर की मंजिल

उम्र के सफर की इस पड़ाव पर कौन सी मंजिल है ये?

कट चुकी आधी सफर, सिर्फ आधी ही बची,
ये किस मुकाम पर ले चली, आज मुझको ये जिन्दगी,
ये सफर है कौन सी, मंजिल है क्यों अंजान सी?

क्या अंधेरा ही मिलेगा, जिन्दगी की मंजिलो पर?
रुक कर सोचता यही है मन, जीवन के इस पड़ाव पर,
हासिल अनुभव हजार, पर मंजिलों से क्युँ बेखबर?

संग ले चलूँ मै कुछ दिए,अंजानी उन मंजिलों पर,
कुछ उजाले भर सकुँ मैं, इक दीप बन के मंजिलों पर,
अंजानी रही है ये सफर, मंजिल न हो अंजानी मगर!

उम्र के इस सफर की, हमसफर मेरी मंजिल वही,
हमसफर की तलाश में, भटकते रहे सारी उम्र युँ हीं,
गुजरुँ इन राहों से मैं, रह जाऊँ यादों में आपकी!

मिल सकी न इक नजर

सजल नैनों से सजदा करता रहा मैं उम्र भर...........!

बुनते रहे धागे उम्मीदों के युँ ही उम्र भर,
झुकते रहे सजदे में उनके, सर युुँ ही उम्र भर,
इक झलक पाने को बैठे रहे, सजदे किए युँ उम्र भर,
आह निकली! पर मिल सकी ना बस तुम्हारी इक नजर!

इबादत बन सकी ना, सजदों का वो सफर,
तन्हाईयों मे उम्र गुजरी, खामोशियों में लम्बा सफर,
पूछ लूँगा मैं खुदा से मिल गया वो मुझको अगर,
आह निकली! पर मिल सकी ना क्युँ तुम्हारी इक नजर!

अब सजल हो चले हैं नैनों के अधखुले डगर,
बह रहे अविरल जलधार, डूबे हुए अब शामो शहर,
इन सजल नैनों से सजदा, युँ ही करता रहा मैं उम्र भर,
आह निकली! पर मिल सकी ना बस तुम्हारी इक नजर!

चल संभल ले एे दिल

चल संभल ले एे दिल,यहीं कहीं खो न जाए मन तेरा।

खोया-खोया सा मन, ये किन वादियों में आज,
लग रहा यूँ मिल रहा दिल, आपसे सपनों में आज,
सामने बैठी हो तुम और मैं देखता हुँ चुपचाप।

दूर झिलमिल रौशनी में, बस मुस्कुराते हों आप,
बंद पलकें लिए मैं देखता, हर तरफ बस आप ही आप,
तसब्बुर में खोए हैं आपके, सामने बैठे हों आप।

तिलिस्म है ये कौन सा, गहरा हुआ अब ये राज,
क्या है वो हकीकत? या है वो बस तसब्बुर की बात,
लग रहा खो रहा मन, फिर उन्हीं सपनों में आज।

किन अंधेरों मे भटकता, बावरा ये मन मेरा,
सपनों की उन वादियों में, हर तरफ बस इक अंधेरा,
चल संभल ले एे दिल, कहीं खो न जाए मन तेरा।

Friday, 8 April 2016

फुहार

इक लहर बन के लहराते अगर मन की इस बाग पे!

फुहार बन के बरसे थे वो एक दिन,
खिल उठी थी विरानियों में गुलशन वहीं,
चमन की हर शाख पर बूँदें छलक आई थी,
गर्म पत्तो की साँसे भी लहराई थी।

फिर वही ढूंढ़ता है दिल फुहारों के दिन,
वो बरसात किस काम की जब बहारें न हों,
बूँदें छलकती रहें चमन की हर शाख पर,
हरी पत्तियों की साँसें कभी गर्म न हों।

वादियों के ये दामन पुकारती हैं तुम्हें,
ये खुला आसमाँ फलक पे ढ़ूंढ़ती हैं तुम्हें,
गुम हुए तुम कहाँ चमन की शाख से,
इक लहर बन के लहराओ मन की इस बाग पे।

रूप लावण्य

कैसी ये कशिश, कैसा ये तड़प न जाने उस रूप में?

उभरा है रूप वही फिर इक बार सामने,
तड़प कई जगा गई है वो रूप इन धड़कनों में,
आईने की तरह रूबरू वो रूप इस मन में,
दबी चाहतों के स्वर निखरे हैं फिर से चमन में।

कैसी ये कशिश, कैसा ये तड़प न जाने उस रूप में?

सम्मोहन है कैसी न जाने उस रूप में,
असंख्य तार जुड़े है तड़प के उस स्वरूप में,
हो न हो उस तरफ मैं ही हुँ उनके मन में,
लावण्य रूप का वो बस चुकी है मेरे हृदय में।

कैसी ये कशिश, कैसा ये तड़प न जाने उस रूप में?

आईना रूप का वो न टूटे कभी इस मन में,
लावण्य चाहतों का कभी कम न हो उस रूप में,
कतारें बहारों की ढ़लती रहे उनके ही संग में,
बीते ये जीवन उस रूप के आँचलों के साये तले में।

कैसी ये कशिश, कैसा ये तड़प न जाने उस रूप में?

खनकती हँसी

वो खनकती हँसी बहुत दिनों बाद सुन सका था मैं....!

इक हँसी जिसमें रहती थी खनखनाहट,
वो सिर्फ हँसी नहीं एहसास की खनक सी थी वो,
कई दिनों से कहीं गुम और चुप सी थी वो,
दबी हुई थी वो खनक न जाने किन दिशाओं में,
आज मुस्कुराहटों के साथ उभरी है फिर उन लबों पे।

महसूस हुई वो खनकती हँसी कुछ दबी हुई सी लबों पे!

एहसासों के मंजर कुछ बिखरे से थे हँसी में,
शायद झुलस रही थी कहीं वो समय की जलन में,
खुल के जी न पाई थी वो चुप सी लम्हों में,
दबी सी दर्द जगी थी कहीं उस हँसी की खनक में,
अब वही खनखनाहट फिर दिख रही उन धड़कनों में।

वो खनकती हँसी बहुत दिनों बाद सुन सका था मैं....!

Thursday, 7 April 2016

स्पर्श रूह तक

स्पर्श कर गया वो लम्हा, तन्हाईयों में मचलकर!

रूह में उठती रही लहरें,
रूह को कोमल स्पर्श मिला,
तन्हा वो गुजरते रहे, रूह की साहिलों से होकर!

तरन्नुम की बात चली,
शब्दों को इक नया मोड़ मिला
भीगते रहे पाँव उनके, रूह की लहरों में चलकर!

मन में घुलते रहे शब्द वो,
रूह को शब्दों का कंपन मिला,
रूह तक भीगे हैं अब वो, इन लहरों में उलझकर!

रूह भींगती रही हदों तक,
मन कों एहसास-ए-शुकून मिला,
मन चाहता मिल जाएँ वो, तन्हाईयों से निकलकर!

काश! स्पर्श उन लम्हों के, साथ-साथ हों यूँ ही उम्र भर!

Wednesday, 6 April 2016

कल मिले ना मिले

 
दरमियाँ जीवन के इन वयस्त क्षणों के,
स्वच्छंद फुर्सत के एहसास भी हैं जरूरी! ..सही है ना?

दरमियाँ इन धड़कते दिलों के,
धड़कनों के एहतराम भी हैं जरूरी !
कही खो न जाएँ यहीं पे हम,
खुद से खुद का पैगाम भी है जरूरी!

तुम सितारों मे घुमती ही रहो,
नजरों से जमीं का दीदार भी है जरूरी!
आईने मे खुद का दीदार कर लो,
तारीफ चेहरे को गैरों की भी है जरूरी!

जिन्दगी में कितना ही सफल हो,
खुशी पर अपनों की खुशी भी है जरूरी!
जिन्दगी में तुम मिलो न मिलो,
मिलते रहने की कशिश भी है जरूरी!

मौसमों की तरह रंग बदल लो,
मौसम रिमझिम फुहार के भी हैं जरूरी!
कल वक्त ये फिर मिले ना मिले,
आज जी भर के जी लेना भी है जरूरी!

दरमियाँ जीवन के इन वयस्त क्षणों के,
स्वच्छंद फुर्सत के एहसास भी हैं जरूरी! ..सही है ना?

पिता

विलख रहा, पिता का विरक्त मन,
देख पुत्र की पीड़ा, व्यथा और जलन,
पुत्र एक ही, कुल में उस पिता के,
चोट असंख्य पुत्र ने, सहे जन्म से दर्द के।

सजा किस पाप की, मिली है उसे,
दूध के दाँत भी, निकले नही उस पुत्र के,
पिता उसका कौन? वो जानता नही!
दर्द उसके पीड़ की, पर जानता पिता वही।

दौड़ता वो पिता, उसके लिए गली गली,
साँस चैन की, पर उसे कहाँ मिली,
आस का दीप एक, जला था उस पुत्र से,
बुझने को अब दीप वो, बुझ रहा पिता वहीं।

अभिसार

ये घर मेरा है तेरे लिए, पर यह तेरा संसार नहीं,
बनी है तू मेरे लिए, पर मैं तेरा सार नही,
हुए पू्र्ण तुम मेरे ही संग, पर मैं तेरा अभिसार नहीं।

जिस रूप का अक्श है तू, जीता था वो मेरे लिए,
जिस नक्श में ढ़ली है तू, वो रूप है मेरे लिए,
मन मे तेरे रहता हूँ मैं, भटकती ये आत्मा तेरे लिए।

कुछ लेख विधि का ऐसा, लकीर हाथों मे वो नहीं,
मन ढ़ूंढ़ता है जिसे, मिलता नही वो शख्स कहीं,
नक्श एक दफन हो रही, फिर उस हृदय में ही कहीं।

हर शख्स फिरता यहाँ, पनघट पे ही प्यासा यूँ हीं,
कुछ बूँद के मिल जाने से, प्यास वो बुझी नहीं,
अनजान सी प्यास की, तलाश में मन अतृप्त हैं कहीं।

काश! मन चाहता है जिसे, संसार भी मिलता वही,
बूंदों की बौछार में, भटकता कोई प्यासा नही,
पूर्ण होती वो संग-संग, फूलों से हम खिल जाते यहीं।

Tuesday, 5 April 2016

मैं मेरे जैसा

मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो?

पत्नी देवी ताने देती मुझको रोज-रोज ही.......
कवर फिसल जाती है जब सोफे पे बैठो तो,
चादर मुड़ जाती है जब बिस्तर पे लेटो तो,
बस पूछो मत, बिगर जाती है तकिए की हालत तो...

मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो?

गिन-गिन कर ताना देती फिर आदतों पर......
बिस्तर पर ही रख छोड़ेंगे, गीले तौलिए को,
कपड़े गंदे कर ही लेंगे जब खाना खाए तो,
लेटे-लेटे ही बस फरमाएंगे, ए जी चाय पिलाओ तो...

मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो?

छोटी-छोटी आदतें भी देवी जी को खलती.......
अपनी ही धुन के पक्के होते, जब देखो तो,
दिन भर बस पलंग तोड़ते, गर छुट्टी हो तो,
शर्ट-पैंट कहीं पर रखकर पूछेंगे, जरा सा देखो तो....

मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो?

बदला कहाँ मैं अब भी पहले ही जैैसा हूँ,
लड़कपन थी पहले मैं अब भी वो ही लड़का हूँ.,
पत्नी की उलझनों, मुश्किलों से मैं मुह फेरे बैठा हूँ,
समझा ही नही कि वो लड़की है और मैं भी लड़की का पिता हूँ...,

सोचता हूँ क्युँ कहता हूँ थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो?

आकृति

कहीं खयालों में कैद तस्वीर इक सलोनी सूरत की!

कहीं खयालों में उभरी है इक तस्वीर,
कुछ धुंधली सी अबतक मानस पटल पर अंकित,
ठहरे झील में नजर आई थी वो मुस्काती,
लहर ये कैसी? कही गुम हुई वो झिलमिल आकृति।

कहीं खयालों में कैद तस्वीर इक सलोनी सूरत की!

नभ पर घटाओं में उभरी है वो तस्वीर,
पल पल रूप बदलती चंचल बादलों में मुस्काती,
लट काले घुँघराले ठिठोली बूँदों संग वो करती,
हवा ये कैसी? कही गुम हुई बिखरी नभ में वो आकृति।

कहीं खयालों में कैद तस्वीर इक सलोनी सूरत की!

मन के सूने महल में अंकित वो तस्वीर,
खाली घर की दीवारों पर उभर आती वो रंगों सी,
स्नेहिल पलकों से अपलक वो निहारती,
आहट ये कैसी? कही गुम हुई नजरों में वो आकृति!

कहीं खयालों में कैद तस्वीर इक सलोनी सूरत की!

यादें

प्रशस्त हो रही सामने संथ्या जीवन की,
कुछ भीनीं यादें ख्यालों में पल रही सपनों सी,

सपने ही होते वो जो सच ना बन पाते,
बोझल होती साँसों मे कभी खुश्बु बिखराते,
बैठे-बैठे उन आँखो में आँसू भर आते,
रिश्ते ही तो हैं वे भी जो अपने ना बन पाते!

संथ्या जीवन की पल-पल प्रशस्त होते ही जाते....,

इक सुखी फूल किताबों में कहीं गुम सी,
यादों में अबतक वो, चुभती मन में काटों सी,
सिमट आई यादें वो साँसों में बन कंपन सी,
पंखुड़ियाँ बिखर रही, अब उन सूखे फूलों की!

प्रशस्त हो रही हर पल सामने संध्या जीवन की.....
कुछ भीनी-भीनी यादें संग चल रही सपनों सी........

Monday, 4 April 2016

शायद भरम था वो

क्या खुशबु थी वो जो मेरी साँसों में उतर गई?

शायद कचनार खिली हैं कहीं?
क्यों बिखरे है इतर हवाओं में यूँही?
कहीं रजनीगंधा ने छेड़ी गजल तो नहीं?
साँसों में ये मादक महक सी है क्युँ?

क्या हवा थी वो जो मुझको छूकर गुजर गई?

अनायास रुक गया था मैं क्युँ?
पुकार गुंजी थी किन सदाओं की?
सिहर सी गई थी क्युँ साँसे मेरी?
सरसराहट उन पत्तियों में है क्युँ?

क्या सपना था वो जो मुझको बेखबर कर गई?

एतबार क्युँ मेरे मन को नही?
कहीं है वो मेरे करीब या कि नहीं?
कही भ्रम वो मेरे मन का तो नहीं?
आँखों में उलझे हैं जाल से क्युँ?

शायद भरम था वो जो मुझको गुमराह कर गई!

असंख्य फूल

काश! मन की वादियों में फूल खिलते हजार!

हृदय की धड़कनें कह रहीं हैं बार-बार,
कहीं साहिलों पर खड़ा मन है कोई बेकरार,
गुजर रहें वो फासलों से करते हुए इंतजार।

काश! सुन ले कोई उस हृदय की पुकार,
साहिलों के कोर पे टकरा रही विशाल ज्वार,
बावरा वो मन हुआ धुएँ सा उठ रहा गुबार।

बार-बार वो हृदय कलप कर रहा पुकार,
स्पंदनें धड़कनों की कुहक रही होकर अधीर,
काश! इन वादियों में आ जाती वही बहार।

मन और हृदय दोनों साथ हो चले हैं अब,
अधीर मन पुलक हृदय को संभालता है अब,
उस फलक पे कहीं मिल जाएगा वो ही रब।

मन की वादियों में असंख्य फूल खिल जाएंगे तब!

Sunday, 3 April 2016

घर

घर एक चाहतों का ले सका आज मैं,
मगर घर नही मेरा वो, जिसमें तुम न रहती हो!

घर मेरा वो जहाँ बाल तुम्हारे गीले हों,
मैं देखता हुँ आईना और तुम देख सँवरती हो,
मांग मे तेरी सिंदूर हो और सिंन्दूरी शाम ढ़लती हो,
बिंदिया की जगमगाहट तेरी माथे पे सजती हो,
घर चाहतों का वही जिसे तुम सजाती हो.......

घर मेरा वही जहाँ सपने सजते हों तेरे,
भोर के गीत बज उठते हो मधुर स्वरों में तेरे,
दिन ढ़ल जाती हो रंगीन साये में आँचल के तेरे,
गुँजती हो किलकारियाँ कई स्वरूपों के मेरे,
घर चाहतों का वही तुम सँवारती हो जिसे .......

घर वही जहाँ संग बाल सफेद हों तेरे,
गुजरते लम्हों में सफेद बाल चमकीले हों तेरे,
वक्त की बारीकियाँ झुर्रियों में उभरे तेरे,
कमजोर आँखें तेरी मदहोशियों से देखे मुझे,
घर चाहतों का ये गर जिन्दगी मे तू साथ हो मेरे......

साथ हर कदम रहे जीवन मे तू मेरे,
डूबता ही रहूँ तेरी फूल सी खुशबुओं के तले,
बंद होने से पहले ये आँखे बस देखती हों तुझे,
साँस जीवन की आखिरी बस यही पे हम संग लें,
घर मेरा वो बने जब एक दूसरे की यादों में हम पलें......

घर एक चाहतों का ले सका आज मैं,
मगर घर नही मेरा वो, जिसमें तुम न रहती हो!

हाँ, जिन्दगी लम्हा-लम्हा

हाँ, बस यूँ गुजरती गई ये जिन्दगी,
कभी लम्हा-लम्हा हर कतरा तृष्णगी,
कभी साँसों के हर तार में है रवानगी,
बस बूँद-बूँद यूँ पीता रहा मैं ये जिन्दगी।

हाँ, कभी ये डूबी छलकती जाम में,
विहँसते चेहरो के संग हसीन शाम में,
रेशमी जुल्फों के तले नर्म घने छाँव में,
अपने प्रियजन के संग प्रीत की गाँव में।

हाँ, रुलाती रही उस-पल कभी वो,
याद आए बिछड़े थे हमसे कभी जो,
सिखाया था जिसने जीना जिन्दगी को,
कैसे भुला दें हम दिल से किसी को?

हाँ, पिघलते रहे बर्फ की सिल्लियों से,
उड़ते रहे धूल जैसे हवाओं के झौंकों से,
तपते रहे खुली धूप में गर्म शिलाओं से,
गुजरती रही है ये जिन्दगी हर दौर से।

हाँ, बदले हैं कई रंग हरपल जिन्दगी नें,
कभी सूखी ये अमलतास सी पतझड़ों में,
खिल उठे बार-बार गुलमोहर की फूलो में,
उभरी है जिन्दगी समय के कालचक्र से।

400 वीं कविता....सधन्यवाद "जीवन कलश" की ओर से...

Saturday, 2 April 2016

धुन एक ही

यह शरीर नश्वर तर जाए भव सागर जीवन की!

धुन एक ही लगी बस सागर पार जाने की,
तड़ जाऊँ सब बाधा विघ्न दुनियाँ की,
जोगी सा रमता मन धुन बस रम जाने की।

मन मस्त कलंदर बावरा दिल रमता जोगी,
लगन लगी अथाह सागर तर जाने की,
कागद के टुकड़ों सा तन बस गल जाने की।

धुन में रमता मन परवाह नही कुछ तन की,
पल आश-निराश के समय अवसान की,
पल पल गलता जीवन हिमखंड शिलाओं सी।

शरण आया तेरे ईश्वर आस लिए मोक्ष की,
कुछ बूँद छलका दे अपनी अनुकंपा की,
ये शरीर नश्वर तर जाए भव सागर जीवन की।

इबादत की शिद्दत

ख्यालों में उनके है तस्वीर कोई!
मगर कौन वो? दिखती कहाँ लेकिन सूरत है उसकी?

शिद्दत तो दिखती है इबादत में उनकी,
एहसास भी कुछ भीगे से जज्बातों मे उनकी,
पर शोहबत कहाँ है हकीकत में उनकी।

उमरता हुआ इक लहर उधर दिख रहा है,
बेकरारी भी दिखती उमरते लहर की रवानियों में,
पर साहिल से मिलने की नीयत कहाँ है।

उन फूलों में दिखती है खिलने की चाहत,
खुशबु भी कुछ भीनी कोमल पंखुड़ियो में उसकी,
पर कुचली सी पूजा की चाहत है उसकी।

हो न हो, शिद्दत तो दिखती है इबादत में उनकी......!

Friday, 1 April 2016

कहानियाँ

जीवन के विविध जज्बातों से जन्म लेती हैं कहानियाँ।

कहानियाँ लिखी नहीं जाती है यहाँ,
बन जाती है खुद ही ये कहानियाँ,
हम ढ़ूंढ़ते हैं बस अपने आप को इनमे यहाँ,
यही तो है तमाम जिंदगी की कहानियाँ।

किरदार ही तो हैं बस हम इन कहानियों के,
रंग अलग-अलग से हैं सब किरदारों के,
कोई तोड़ता तो कोई बनाता है घर किसी के,
नायक या खलनायक बनते हम ही जिन्दगी के।

भावनाओं के विविध रूप रंग में ये सजे,
संबंधों के कच्चे रेशमी डोर में उलझे,
पल मे हसाते तो पल मे आँसुओं मे डुबोते,
मिलन और जुदाई तो बस पड़ाव कहानियों के।

आँखों मे आँसू किसी के यूँ ही नहीं छलकते,
जज्बात दिलों के कुछ कहते हैं रो रो के,
कहानियाँ कह जाती है ये व्यथा इस मन के,
खुशी और गम में ही छुपे कहानियाँ जिन्दगी के।

कहानियाँ लिखी नहीं जाती बनती है खुद ही कहानियाँ।

ये अलग बात है कि...!

ये अलग बात है कि.............

दुनियाँ की इस भीड़ मे एक हम भी हैं,
ये अलग बात है कि हम दिखते नही हैं इस भीड़ में।

अंजान शक्लों के ढ़ेर सी है ये दुनियाँ,
ये अलग बात है कि हम ढ़ूंढ़ते है कोई अपना यहाँ ।

अलग अलग से शक्ल हैं इस भीड़ में,
कौन किसको देखता है यहाँ अंजान सी इस भीड़़ में।

उतरे हुए से शक्ल हर शख्श के हैं यहाँ,
अपना कोई मिल गया तो खिल जाते हैं चेहरे यहाँ ।

नाम रिश्तों का देकर भूल जाते है सब,
ये अलग बात है कि हम रिश्ते निभा रहे हैं अबतक।

मतलब की बात न हो तो सुनते कहाँ हैं सब,
ये अलग बात है कि हम यहाँ सुने जा रहे बेमतलब।

इस भीड़ की तन्हाईयों मे घुट चुके हैं दम,
ये अलग बात है कि अब तलक यहाँ जी रहे हैं हम।

ये अलग बात है कि.............

स्वार्थ का स्नेह

स्वार्थ सिद्ध कर पुकार अनसुनी वो करते रहे,
पुकारता रहा फिर मैं, पर आवाज सुन भी न वो सके!

जान कर भी अंजान से बने रहे वो,
परवाह स्नेह की तनिक भी कर न सके वो,
बेपरवाह अल्हर मगरूर से बड़े वो,
कत्ल की फितरत उनकी, धोखे से बने वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

हर वक्त भूले भूले से लगते रहे वो,
हर कदम अंजान बनने की कोशिश में वो,
स्वार्थ की सीमा से अधिक स्वार्थी वो,
खोट नियत में उनकी, स्नेह का पर्दा किए वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

असंख्य झूठ के ढ़ेर पर चढ़ते रहे वो,
कई बार झूठ ही अबतक सबसे कहते रहे वो,
फरेब की चाल नित नए चलते रहे वो,
झूठ नियत में उनकी, सच का झंडा लिए वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

एतबार बातों पे उनकी हम करते ही रहे,
दौड़ गली के उनकी लगाते हम रहे,
मतलबों के वक्त साथ वो मेरे चलते रहे,
मतलब निकल गई तो अंजान से वो हो लिए।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज अनसुनी वो करते रहे!