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Sunday, 7 December 2025

धुंधली लकीरें

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
फिर उभर आई, वही भूली सी तस्वीरें!

अधर उनके, फिर, छंद कई लिखती गई,
यूं कहीं, अधख़िली सी, चंद कली खिलती गई,
सिमट आए, ख्वाब सारे, बंद पलकों तले,
उभरती रहीं, नींद में, तैरती लकीरें!

शक्ल वो ही पहचानी, लेती रही आकार,
यूं, बंद पलकों तले, धुंधले से, स्वप्न थे साकार,
फिर, धागे वो ही, मोह के स्वतः बंध चले,
ले चली किधर, उभरती वो तस्वीरें!

घिरा अंकपाश में, न कोई आस-पास में,
जड़वत देखता रहा, मैं उनको ही अंकपाश में,
गुजारी पल में सदियां, उस छांव के तले,
बहला गई, नींद में, उभरती लकीरें!

टूटा वो दिवास्वप्न, टूटे सब वो झूठे भ्रम,
ढ़ाए थे नींद ने, दिल पे, बरबस, सैकड़ों सितम,
ख्वाब सारे, बिखर गए, इन पलकों तले,
उभर कर, बिखर गई, तैरती लकीरें!

शुक्रिया करम, नींद के ओ मीठे से भ्रम, 
वहम ही सही, पल भर, जीवन्त कर गए तुम,
ग़म से कोसों दूर, हम कहीं, संग थे चले, 
छल गई भले, धुंधली सी वो लकीरें!

खुली आंख, बहती स्वप्न की नदी कहां!
ग़म से बोझिल पल बिना, बीतती सदी कहां!
पड़ जाती यहां, दिन में, छाले पावों तले,
गर्म सी रेत पर, बनती कहां लकीरें! 

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
उभर आई फिर, वही भूली सी तस्वीरें!

Friday, 4 March 2022

जीवटता

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
खुद ही, खिल उठेंगी, ये फिर सँवर कर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
शायद, लम्बा है जरा, पतझड़ों का ये मौसम!
रोके रखी हैं, सांसें थामकर अन्दर,
ये हवाएं, बस जरा जाएं गुजर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
ग़म के समुन्दर, बहे जा रहे, अन्दर ही अन्दर!
छाले, जो पत्तियां, दें गईं बदन पर,
उठती हैं, कभी, टीस बन कर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
चुप ही चुप, आँकती हैं, मौसमों का मिजाज!
सोंचती हैं, मूंद कर अपनी पलकें,
गुजर जाए, वक्त के ये भंवर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
उनकी ये जीवटता, मिटने भी कहां देगी उन्हें!
जगाएंगे, पलकों तले पलते सपने,
नीरवता भरी, उन राहों पर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
संघर्ष एक लम्बा, इस जिन्दगी का है अधूरा!
लौट ही आएंगे, आस के वो पंछी, 
चहक उठेंगे, इसी डाल पर!

सूखी नहीं हैं, ये शाखें, अभी....
खुद ही, खिल उठेंगी, ये फिर सँवर कर!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)