Wednesday, 8 November 2017

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर.....
जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर,
सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर,
कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर?

बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम...
बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर,
ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर,
मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर?

लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर....
लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर,
अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर,
मन की ये उपज, काटे कौन आकार?

बिन खाद-बीज, बिन पानी...
ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर,
आलोकित ये भाव से, भाव उपजते अन्दर,
भाव की ये फसल, सम्हाले कौन आकर?

जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर,
क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर.....

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

सुख का मुखड़ा

ऐ दु:ख! तू मुझसे फेर जरा मुख! देखूं तो! जरा ये सुख दिखता कैसा है? क्या सुख के ये क्षण, मोह की क्षणिक परछाई के जैसा है? या दुख के साग...