Showing posts with label बेसबर. Show all posts
Showing posts with label बेसबर. Show all posts

Saturday, 10 January 2026

ख्वाहिशों के पर

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!
मगर, वही अक्सर, राह में, रहगुजर, होते हैं।

जिंदा हो, तो ख्वाहिशें भी हैं,
इन सांसों के संग, चंद रंजिशें भी हैं,
जिद, और, कोशिशें भी है,
बिन कहां इनके, मंजिलों के, सफर होते है!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

पा जाते अगर, उड़ भी जाते,
ख्वाहिशों को, और, नजदीक लाते,
अनथक, कोशिशें मिन्नतें,
मगर, हसरतें, ख्वाहिशों के, बेखबर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

हसरतें, गर, एक हो तो कहें,
अनगिनत, इन, ख्वाहिशों के मेले,
और, यहां, हम अकेले,
अड़े जिद पे ख्वाहिश, बड़े बेसबर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

चल रहा, कब से, ये कारवां,
दिन-ब-दिन, ये और हो रही जवां,
चाहे, चूम लूं आसमां,
संग उनके ही साए, राह के रहगुजर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!
मगर, वही अक्सर, राह में, रहगुजर, होते हैं।

Tuesday, 23 August 2022

किनारों पर


खड़ा, सागर की, किनारों पर,
इक टक देखता, उस मुसाफ़िर की मानिंद था मैं,
और वो, उस लहर की तरह!

हर बार, छू जाती है, जो, आकर किनारों पर,
और लौट जाती है, न जाने किधर,
फिर उठती है, बनकर इक ढे़ह सी उधर,
देखता हूं, मैं वो लहर,
अनवरत, खड़ा सागर की किनारों पर!

और, छूकर जाती, उफनती वो लहर!

करे क्या! हैरान सा, हारा वो बेवश मुसाफ़िर,
बेपरवाह, उन्हीं लहरों का मुंतजिर,
हर पल, छूकर, करती जाती है जो छल,
लिए, उसी की आस,
प्रतीक्षारत, वहीं सागर की किनारों पर!

और, छूकर जाती, उफनती वो लहर!

झंकृत, हर ओर दिशा, और वो, मंत्रमुग्ध सा,
कोई संगीत सी, बज उठती लहर,
बज उठते, कई साज, उनकी इशारों पर,
वो चुने, वो ही गीत,
कल्पनारत, वहीं सागर की किनारों पर!

और, छूकर जाती, उफनती वो लहर!

उन लहरों से इतर, बे-सबर, जाए तो किधर,
अमिट इक चाह, अमृत की उधर,
और अन्तः, गरल कितने छुपाए सागर,
धारे, वो ही प्यास,
प्रतिमावत, खड़ा सागर की किनारों पर!

और, छूकर जाती, उफनती वो लहर!

खड़ा, सागर की, किनारों पर,
इक टक देखता, उस मुसाफ़िर की मानिंद था मैं,
और वो, उस लहर की तरह!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, 29 June 2021

फिर याद आए

फिर याद आए, वो सांझ के साए....

था कोई साया, जो चुपके से पास आया,
थी वही, कदमों की हल्की सी आहट,
मगन हो, झूमते पत्तियों की सरसराहट,
वो दूर, समेटे आँचल में नूर वो ही,
रुपहला गगन, मुझको रिझाए....

फिर याद आए, वो सांझ के साए....

हुआ एहसास, कि तुझसे मुक्त मैं न था,
था रिक्त जरा, मगर था यादों से भरा,
बेरहम तीर वक्त के, हो चले थे बेअसर,
ढ़ल चला था, इक, तेरे ही रंग मैं,
बेसबर, सांझ ने ही गीत गाए....

फिर याद आए, वो सांझ के साए....

ढ़लते गगन संग, तुम यूँ, ढ़लते हो कहाँ,
छोड़ जाते हो, कई यादों के कारवाँ,
टाँक कर गगन पर, अनगिनत से दीये,
झांकते हो, आसमां से जमीं पर,
वो ही रौशनी, मुझको जगाए....

फिर याद आए, वो सांझ के साए....

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)