Sunday, 14 May 2017

पति की नजर से इक माँ

इक झलक पति की नजर से पत्नी में समाई "माँ"......

कहता है ये मन, स्नेहिल सी माँ है वो बस इक प्रेयसी नहीं,
है इक कोरी सी कल्पना, या है वो इक ममता की छाँव..

वो खूबसूरत से दो हाथ, वो कोमल से दो पाँव,
वो ऊँगलियों पर बसा मेंहदी का इक छोटा सा गाँव,
है वो इक धूप की सुनहरी सी झिलमिल झलक,
या है वो लताओं से लिपटी, बरगद की घनेरी सी छाँव...

कहता है ये मन, वो महज इक कोरी सी कल्पना नहीं,
वो तन, वो मन है इक पीपल की भीनी सी छाँव....

निखरी है मेंहदी, उन हथेलियों पर बिखरकर,
खुश हैं वो कितनी, उन पंखुरी उँगलियों को सजाकर,
ऐ मेरे व्याकुल से मन, तू भी रह जा उनके गाँव,
यूँ ही कुछ पल जो बिखरेगा, क्षण भर को पाएगा ठाँव...

कहता है ये मन, वो है इक कोमल सा हृदय निष्ठुर नहीं,
है किसी सहृदय के हाथों का यह मृदुल स्पर्शाभाव...

14 मई, मातृ दिवस पर विशेष....

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

समय की आगोश में

समय बह चला था और मैं वहीं खड़ा था ...... मैं न था समय की आगोश में, न फिक्र, न वचन और न ही कोई बंधन, खुद की अपनी ही इक दुनियां, बाधा ...

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