Saturday, 27 January 2018

इक दुर्घटना

विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...

दुर्घटना! आह वो विवश क्षण!
कराहता तड़पता विवशता का क्षण,
तम में डूबता, प्रिय का तन!
सनकर लहू में, वो पिघलता सा बदन......

विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...

क्षण भर में टूटता वो अवगुंठन,
अकस्मात हाथों से छूटता वो दामन,
विघटित सासें, बढ़ती वो घुटन,
विकर्षित होता, जीवन का वो आकर्षण....

विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...

निढाल हुआ, जैसे वह जीवन,
लथपथ रक्तरंजित, दुखदाई वो क्षण,
डूबते नैनों में, करुणा के घन,
इक पल में छूटता, साँसों से ये जीवन....

विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...

कैसी वो दुर्घटना, वो कैसा क्षण?
अन्तिम क्षण में, बढता वो आकर्षण,
पल पल टूटती, साँसों का घन,
आँखों में टूटकर, उमड़ता सा वो सावन....

अब याद न मुझको आना, ओ विघटन के क्षण....

(कविता "जीवन कलश" पर यह मेरी 800वीं रचना है, शायद 22 अक्टूबर 2017 की उस भीषण कार दुर्घटना के बाद, यह संभव न हो पाता । ईश्वर की असीम कृपा सब पर बनी रहे।)

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