Saturday, 27 January 2018

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप, खींच लाई दामन में मुझको...

कई दिनों के सर्द मौसम में,
मखमली एहसास दिला गई थी धूप,
ठिठुरते कांपते बदन को,
तपिश ने दी थी राहत थोड़ी सी...

हरियाली निखरी पात पात में,
बसंत की थपकी ले, खिली थी फूल,
रूप मिला था कलियों को,
रुख बदली थी हवाओं ने अपनी....

रंग कई भर आए थे बागों में,
कितने रांझे, बैठे थे राहों को भूल,
स्वर मिले थे कोयल को,
बदले थे आस्वर फिजाओं के भी....

निरन्तर कहर ढ़ाते मौसम में,
सृजन का आभास दे गई थी धूप,
संकुचित सी वातावरण को,
तपिश ने दी थी राहत थोड़ी सी...

शब्द शब्द हुए मुखर नेह में,
अक्षर अक्षर दे रही सुगंध देह की 
फ़ैली है सुरभि अन्तर्मन की,
सजल नयन है इक पाती प्रेम की....

मौसम की ये गुनगुनी धूप, भा गई मुझको...

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फासले

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