उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....
पलकें जम सी गईं, वक्त थम सी गईं,
अपलक, निहारता,
मैं, कोमल सी, उनकी सुष्मिता,
खूबसूरत, हर अदा,
अबोले, हर शब्द उनके, मैं चुनता ही रहा!
उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....
मैं खोया कहीं, इक पवन छू कर गई,
कुछ कह कर गई,
उन डालियों पर, झूलती लता,
पंछियों की, सदा,
अनबुझ से वो इशारे, मैं देखता ही रहा!
उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....
समझ से परे, उनकी कंपित धड़कनें,
कैसे हर पल गिनें,
टेढ़े, पगडंडियों सा वो रास्ता,
है कैसा, वास्ता?
अनगिन उलझनें, मैं सुलझाता ही रहा!
उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....
वो कुनकुनी सी धूप, दुल्हन सी रूप,
मोहक, हर स्वरूप,
मुख पे फैली, इक सुष्मिता,
रोकती थी रास्ता,
विलग इक राह पर, मैं चलता ही रहा!
उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....
संग, अपने ही कहीं, मैं खुद भी नहीं,
यूं, खोया मैं कहीं!
तोड़ कर, इस जग से वास्ता,
छोड़ कर, रास्ता,
खुद अपना ही पता, मैं ढूंढता ही रहा!
उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

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