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Thursday, 15 January 2026

सुष्मिता

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

पलकें जम सी गईं, वक्त थम सी गईं,
अपलक, निहारता,
मैं, कोमल सी, उनकी सुष्मिता,
खूबसूरत, हर अदा,
अबोले, हर शब्द उनके, मैं चुनता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

मैं खोया कहीं, इक पवन छू कर गई,
कुछ कह कर गई,
उन डालियों पर, झूलती लता,
पंछियों की, सदा,
अनबुझ से वो इशारे, मैं देखता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

समझ से परे, उनकी कंपित धड़कनें,
कैसे हर पल गिनें, 
टेढ़े, पगडंडियों सा वो रास्ता,
है कैसा, वास्ता?
अनगिन उलझनें, मैं सुलझाता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

वो कुनकुनी सी धूप, दुल्हन सी रूप,
मोहक, हर स्वरूप,
मुख पे फैली, इक सुष्मिता,
रोकती थी रास्ता,
विलग इक राह पर, मैं चलता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

संग, अपने ही कहीं, मैं खुद भी नहीं,
यूं, खोया मैं कहीं!
तोड़ कर, इस जग से वास्ता,
छोड़ कर, रास्ता,
खुद अपना ही पता, मैं ढूंढता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

Tuesday, 24 March 2020

अद्भुत कोरोना

अद्भुत है, कोरोना!
शायद, जरूरी है, इक डर का होना!
कर-बद्ध,
जुड़े रब से हम,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर है सूना,
है ये स्वार्थ, 
या प्रबल है आस्था!
कहो ना!

कहीं न कहीं, निहित है इक डर,
समाहित है भय,
वर्ना, यूँ न डोलती, मेरी आस्था!
यूँ, न छोड़ते,
हम, मंदिर का रास्ता!
यूँ, न ढूंढते,
तन्हाई में, खुद का पता!

यूँ, ये शहर, न हो जाते वीरान,
ज्यूं, हो श्मशान,
न डरते, आबादियों से इन्सान!
यूँ, न सिमटते,
दूरियों में, हमारे रिश्ते!
यूँ, न करते,
दिल, तोड़ देने की खता!

गली-गली, यूँ न गूंजते ये शंख,
करोड़ों तालियाँ,
असंख्य थालियाँ, बजते न संग!
यूँ, न गुजरते,
कहीं, फासलों से हम!
यूँ, न जागते,
मेरे एहसास, गुमशुदा!

अद्भुत है, कोरोना!
शायद, जरूरी है, इक डर का होना!
कर-बद्ध,
जुड़े रब से हम,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर है सूना,
है ये स्वार्थ, 
या प्रबल है आस्था!
कहो ना!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
  (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Friday, 12 July 2019

किताब

बहते चिनाब से,
मिल गई, इक किताब!

उम्र, जो है अब ढ़ली,
सोचता था,
गुजर चुकी है, अब वो गली,
अब न है राफ्ता,
शायद, अब बन्द हो वो रास्ता,
पर, टूटा न था वास्ता,
रह गईं थी,
कुछ यादें, वही मखमली,
संग-संग चली,
उम्र के इस चिनाब में,
इक किताब सी,
मन में,
ढ़ली वो मिली!

बहते चिनाब से,
मिल गई, इक किताब!

बातें वही, बहा ले गई,
यादें पुरानी,
नई सी लगी, थी वो कहानी,
फिर बना राफ्ता,
पर, अब तो बन्द था वो रास्ता,
रह गया था, इक वास्ता,
वो किस्से पुराने,
यादों में ढ़ले, वो ही तराने,
अब सताने लगे,
वो पन्ने, फरफराने लगे,
बंद किताब की,
हर बात,
तड़पाती ही मिली!

बहते चिनाब से,
मिल गई, इक किताब!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा

Monday, 6 May 2019

अजनबी शहर

अब न खोलता हूँ, मैं दर उधर का,
न जाने वो, रास्ता है किधर का?

कभी उस तरफ, था ये दिल हमारा,
तन्हा सा रहा, वहाँ वर्षों बेचारा!

तृष्णगि थी, दिल में रही ये कमी थी,
मेरे ही काम की, न वो ज़मीं थी!

अन्जाने शक्ल थे, अपना न था कोई,
भीड़ में वहीं, ये आत्मा थी खोई!

वैसे तो रोज ही, कई लोग थे मिलते,
रंगीन थे मगर, ग॔धहीन थे रिश्ते!

छोड़ आया हूँ, कहीं पीछे मैं वो शहर,
मन की गाँव सा, है ना वो शहर!

न कोई जानता, है मुझको अब उधर,
बड़ा ही अजनबी सा, है वो शहर!

अब न खोलता हूँ, मैं दर उधर का,
न जाने वो, रास्ता है किधर का?

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा