हो नजरों में, पर कितने अंजान, अब तलक,
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!
जी चाहे, छू लूं इन हाथों से,
उन रंगों को, उन पंखों को, उन अंगों को,
हटा दूं, बादलों के वो पर्दे,
तोड़ दूं, हदें,
जगती, कैसी ये ललक!
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!
शायद, बस, दो कदम और,
चलता जाऊं अनथक, पाने को वो ठौर,
उसी, अनजाने की ओर,
उनकी, बातें,
अक्सर, इन होठों तक!
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!
हलक में, बाकी प्यास यही,
बादलें ले आती, अक्सर, बरसात वही,
झांकता, गगन की ओर,
रोककर सांसें,
शायद, दे वो दस्तक!
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!
कल हो, विहान इक ऐसा,
झाकें नैनों में फलक, मिट जाए ललक,
दामन में, सिमटे सपने,
प्रशस्त हो राहें,
ज़मीं से आसमां तक!
हो नजरों में, पर कितने अंजान, अब तलक,
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

No comments:
Post a Comment