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Monday, 30 March 2026

कल्पना

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!

ऐसा लगता है, जैसे, वो बैठे हैं मुकर कर,
ओढ़े, स्मृतियों की एक चादर,
और, अपनी ही इक परिप्रेक्ष्य, में घिरकर,
दूर हैं वो, जरा, नाराज होकर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

फेहरिस्त, लंबी शिकायतों की, खोलकर,
बोलती है, कुछ भी न बोलकर,
शिकन माथे की, बयां करती हैं, उभरकर,
यकीन, कैसे करूं मैं तुम पर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

मुक्त हुई कब, कल्पनाओं में कैद होकर,
मुक्त, मैं भी विचरती, यूँ अगर,
होती बन कर हकीकत, राह में साथ गर,
निहारती, खुद को संवार कर !

कल्पनाओं से, गुजर कर......

सुनकर, उसकी बातें, हुआ मैं निरुत्तर,
विलीन थे शब्द मेरे, आह पर,
मैंनें, दुःख ही दिए, उनमें यूं रंग भरकर,
दूर वे कितने, मेरे संग होकर!

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!

Tuesday, 26 January 2021

मन कह न पाए अलविदा

जीवन के क्षणों में,
जीवन, बस रहा, कहीं उन निर्जनों में!

कभी हो जाए, कोई विदा,
फिर भी, मन कह न पाए, अलविदा!
शायद, यही इक सुख-सार,
है यही, संसार,
धागे जोड़ ले मन, 
दुरूह, विदाई के क्षणों में ....

भटके ये मन, बंधे, कहीं उन निर्जनों में!

मन से परे, मन के अवयव,
मन सुने, उस अनसुने, गीतों की रव!
कंप-कंपाते, मन की पुकार,
मन की, गुहार,
दूर, कैसे रहे मन,
कंपित, जुदाई के क्षणों में .....

भटके ये मन, बंधे, कहीं उन निर्जनों में!

ढ़ूँढ़े वहाँ मन अपना साया,
विकल्प सारे, वो, जहाँ छोड़ आया!
क्षीण कैसे, हो जाए मल्हार,
नैनों के, फुहार,
कैसे संभले ये मन,
निष्ठुर, रिहाई के क्षणों में .....

जीवन के क्षणों में,
जीवन, बस रहा, कहीं उन निर्जनों में!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)