उत्सुक हूँ बेहद.....
सफर के, किसी, मोड़ तक,
शायद कहीं दे जाए, कोई, महज एक दस्तक,
आए कोई, मेरे दर तक,
ठहर जाए यहीं, उमर भर तक!
उत्सुक हूँ बेहद.....
बंधनों के, नाजुक, डोर पर,
जताए कोई, पुरकाशिश हक, इस वजूद पर,
चले संग, इस सफर पर,
थाम ले दामन, लगें ठोकरें गर!
उत्सुक हूँ बेहद.....
उस अंजान को, दे दूँ हक,
ना हो हद, इस यकीन का, ना हो कोई शक,
मेरी इस, दहलीज तक,
रोज वो दें, महज एक दस्तक!
उत्सुक हूँ बेहद.....
जगाए यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!
उत्सुक हूँ बेहद.....

अति उत्तम एवं उच्च कोटि के लेखन शैली का लाजवाब प्रदर्शन है यह कविता... मुग्धनीय!
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