जो होती नदिया, मौन कहीं, बह जाती,
उन्मादित सी, क्यूँ बहती मैं?
अंकपाश मेरे, लिपटे पतझड़ के पात कई,
खोई उनसे, फूलों की बात कई!
कौन कहे, उनसे, बिखरे कितने आंगन,
उन्माद ही, ले उजड़े दामन,
उफनते सैलाबों में, जागे ग़म के रात कई,
बेमोल रहे, सोये जज्बात कई!
उस पर, नदियों का उत्श्रृंखल सा बहना,
यूँ विलास, विरहा पर करना,
झकझोर जाती है, टूटे वीणा के तार कई,
उभार जाती है, मन में पीर नई!
जरा रख दे, मरहम, किसी के गम पर,
दे दे किसी के, दुख में साथ,
बज उठेंगी, जर्जर वीणा में, सरगम नई,
यूँ हंस कर, उभरेंगे संवाद कई!
जो होती झौंका, मचल कहीं, बह जाती,
छू जाती, दुखती तन को मैं,
हर लेती, हर व्याधित मन के पीर कई,
फिर सुनती, मन की कूक नई!

No comments:
Post a Comment