Friday, 11 August 2017

है कहाँ?

है कहाँ अब वो दिन, है कहाँ अब वो बेकरारियाँ?

चैन के वो दिन, अब हो चुके है ग्रास काल के,
वक्त के ये अंधेरे निगल चुके हैं जिसे,
ढूंढते है बस हम उन्हें, थामे चराग हाथ में।

है कहाँ अब वो पल, है कहाँ अब वो तन्हाईयाँ?

गुजर चुके वो सारे पल, जो कभी थे बस मेरे,
सर्द खामोशियों के है बस हर तरफ,
भटक रहे हैं हम, चैनों शुकून की तलाश में।

हैं कहाँ अब वो लोग, है कहाँ अब वो कहानियाँ?

गुम न जाने वे हुए कहाँ, जो थे करीब दिल के,
हैं फलक पर वो बनकर सितारों से टँके,
चुप सी है वो बोलती कहानी, खामोश सी ये रातें।

है कहाँ अब वो दबिश, है दिल के चैन अब कहाँ?

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

समय की आगोश में

समय बह चला था और मैं वहीं खड़ा था ...... मैं न था समय की आगोश में, न फिक्र, न वचन और न ही कोई बंधन, खुद की अपनी ही इक दुनियां, बाधा ...

विगत 30 दिनों में ज्यादा लोकप्रिय रचनाएँ