Wednesday, 4 May 2022

घेरे


आ घेरती हैं, हजारों ख्वाहिशें हर पल,
कहां होता हूं अकेला!

भले ही,भीड़ से खुद को बचाकर,
मींच लूं आंखें,
ये प्यासी ख्वाहिशें, बस रखती हैं जगा के,
दिखाती हैं, अरमानों का मेला,
कहां होता हूं अकेला!

म‌न ही जिद्दी, जा बसे उस नगर,
यूं लेकर, संग,
ख्वाहिशों के, बहकते चटकते-भरमाते रंग,
हर पल, फिर वही सिलसिला,
कहां होता हूं अकेला!

उनकी इनायत, उनसे शिकायत,
उनके ही, घेरे,
सुबहो और शाम, यूं लगे ख्वाहिशों के डेरे,
वहीं दीप, अरमानों का जला,
कहां होता हूं अकेला!

आ घेरती हैं, हजारों ख्वाहिशें हर पल,
कहां होता हूं अकेला!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

6 comments:

  1. भले ही,भीड़ से खुद को बचाकर,
    मींच लूं आंखें,
    ये प्यासी ख्वाहिशें, बस रखती हैं जगा के,
    दिखाती हैं, अरमानों का मेला,
    कहां होता हूं अकेला! बहुत सुंदर
    शकुंतला

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  2. भले ही,भीड़ से खुद को बचाकर,
    मींच लूं आंखें,
    ये प्यासी ख्वाहिशें, बस रखती हैं जगा के,
    दिखाती हैं, अरमानों का मेला,
    कहां होता हूं अकेला!
    बहुत बहुत सुन्दर रचना

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5-5-22 को चर्चा मंच पर चर्चा - 4421 में दिया जाएगा | चर्चा मंच पर आपकी उपस्थिति चर्चाकारों का हौसला बढ़ाएगी
    धन्यवाद
    दिलबाग

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  4. बहुत सुंदर रचना।

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  5. सही बात है, मन किसी को पल भर के लिए भी अकेला नहीं रहने देता तभी तो हर कोई सत्य से दूर रहता है

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  6. किसी के अहसासों के साथ वक़्त गुजरना सुखद है परन्तु उससे भी ज्यादा सुख मिलता है खुद के साथ गुजरे लम्हों में।
    बहुत ही सुंदर सृजन,सादर नमन आपको

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