
यूं गए...
वक्त, ज्यूँ गया है थम,
संग जो बीते, यूं तो, वो वक्त थे कम,
तेरे अकस्मात, जाने का ग़म,
गुजरा हो जैसे, क्षण में इक जीवन,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए,
यूं गए...
दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए,
यूं गए...
यूं, क्षणिक ये दुनियां,
सुना था, क्षण में गिरती हैं बिजलियां,
क्षण में, उजड़ती हैं बस्तियां,
यूं संग, अब मेरे ही, खेल गई क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए,
यूं गए...
दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए,
यूं गए...
विछोह, यही असह्य,
यूं बिखर गई, अपनी जगह से हर शै,
मुक्कू, तुम क्यूं बिछड़ गए,
क्यूं पड़ गए, कम जिंदगी के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए,
यूं गए...
दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए,
यूं गए...
स्नेह भरा, मुख तेरा,
याद बहुत आयेगा, स्नेहिल सा चेहरा,
संग तुम्हारे, जो पल गुजरा,
छोड़ गए पीछे, कुछ यादों के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए,
यूं गए...
दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए,
यूं गए...
Yes...same here.
ReplyDeleteहम भी श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
ReplyDeleteनमन।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शनिवार २० दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
विछोह की पीड़ा असह्य होती है
ReplyDeleteनमन
ReplyDeleteविनम्र श्रद्धांजलि
ReplyDeleteआप जिस सादगी से मुक्कू के जाने का दर्द कहते हैं, वह सीधा दिल में उतरता है। हर पंक्ति में अपनापन दिखता है, जैसे कोई भाई सामने बैठकर अपनी पीड़ा सुना रहा हो। “यूं आए, यूं गए” का दोहराव उस खालीपन को और गहरा कर देता है। मुझे यह भी अच्छा लगा कि आप यादों को थामे रखते हैं, क्योंकि वही आगे जीने की ताकत देती हैं।
ReplyDeleteजी, सच कहा अपने।।।।
Deleteमगर मैं आपका नाम नहीं जान पाया