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Friday, 3 April 2026

उत्सुक हूँ बेहद

उत्सुक हूँ बेहद.....

सफर के, किसी, मोड़ तक,
शायद कहीं दे जाए, कोई, महज एक दस्तक,
आए कोई, मेरे दर तक,
ठहर जाए यहीं, उमर भर तक!

उत्सुक हूँ बेहद.....

बंधनों के, नाजुक, डोर पर,
जताए कोई, पुरकाशिश हक, मेरे वजूद पर,
चले संग, इस सफर पर,
थाम ले दामन, लगें ठोकरें गर!

उत्सुक हूँ बेहद.....

उस अंजान को, दे दूँ हक,
ना हो हद, इस यकीन का, ना हो कोई शक,
मेरी इस, दहलीज तक,
रोज वो दें, महज एक दस्तक!

उत्सुक हूँ बेहद.....

जगाए, यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!

उत्सुक हूँ बेहद.....

Monday, 22 March 2021

हक है तुम्हें

क्यूँ कोई झाँके, किसी के सूनेपन तक!
बेवजह दे, कोई क्यूँ दस्तक!

महज, मिटाने को, अपनी उत्सुकता,
जगाने को, मेरी सोई सी उत्कंठा,
देने को, महज, एक दस्तक,
तुम ही आए होगे, मेरे दर तक!

महज झांकने, सूनेपन तक....

वही पहचानी सी, आहट,
हल्की सी, पवन की सुग-बुगाहट,
सूखे पत्तों की, सर-सराहट,
काफी थे, कहने को!
तुम जो कहते,
वो, कह आए थे, चुपके से मुझको,
मन की बातें, इस मन तक!

देने को, महज एक दस्तक.....

अन्जान थे, हमेशा तुम,
सोया ही कब, उत्सुक ये मेरा मन,
हर पल, धारे इक उत्कंठा,
कहने भर, चुप जरा,
पर ओ बेखबर,
तीर पर, उठती ये पल-पल लहर,
सिमटती है, मेरे दर तक!

गूंजती है, दरो-दीवार तक......

हक है तुम्हें, तुम मिटाओ उत्सुकता,
न जगाओ मगर, यूँ मेरी उत्कंठा,
यूँ न दो, महज एक दस्तक,
ठहर जाओ, जरा मेरे दर तक!

या यूँ न झाँको, किसी के सूनेपन तक!
बेवजह दो न तुम यूँ दस्तक!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)