उत्सुक हूँ बेहद.....
सफर के, किसी, मोड़ तक,
शायद कहीं दे जाए, कोई, महज एक दस्तक,
आए कोई, मेरे दर तक,
ठहर जाए यहीं, उमर भर तक!
उत्सुक हूँ बेहद.....
बंधनों के, नाजुक, डोर पर,
जताए कोई, पुरकाशिश हक, मेरे वजूद पर,
चले संग, इस सफर पर,
थाम ले दामन, लगें ठोकरें गर!
उत्सुक हूँ बेहद.....
उस अंजान को, दे दूँ हक,
ना हो हद, इस यकीन का, ना हो कोई शक,
मेरी इस, दहलीज तक,
रोज वो दें, महज एक दस्तक!
उत्सुक हूँ बेहद.....
जगाए, यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!
उत्सुक हूँ बेहद.....

अति उत्तम एवं उच्च कोटि के लेखन शैली का लाजवाब प्रदर्शन है यह कविता... मुग्धनीय!
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद अमन जी
Deleteबहुत अच्छी काव्यमय अभिव्यक्ति
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया पाकर आह्लादित हूं। आभार माथुर जी!
Deleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 06 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteहार्दिक आभार
Deleteबहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया पाकर आह्लादित हूं। आभार देवरानी जी!
Deleteउत्सुकता बनी रहे |
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया पाकर आह्लादित हूं। आभार जोशी जी!
Deleteमुझे खास तौर पर “दस्तक” वाला भाव बहुत पसंद आया, क्योंकि उसमें अपनापन और चाह दोनों दिखते हैं। आप हर अंतरे में वही उत्सुकता बनाए रखते हो और वही आपकी कवियता की जान बन जाती है।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
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