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Thursday, 14 August 2025

ताना

कभी-कभी, खुल जाते वक्त के तहखाने...

यूं ही, छिड़ जाते, बिसरे कई तराने,
शिकायतें अनगिनत पलों के, अंतहीन से ताने,
कर भी ना पाऊं, अब उनको अनसुना,
समझ भी न पाऊं, क्यूं उसने बूना!

उधेड़-बुन इक, फिर, बुनता ये मन,
वक्त के, किस पहलू से, थी मेरी क्या अनबन!
छूआ ही कब, मैने, संवेदनाओं के तार,
बीते वो पल, हैं क्यूं इतने बेजार!

अनकही, रह गई मेरी ही अनसुनी,
शिकायतें, एकाकी से, इस मन की ही थी दूनी,
शब्दहीन ही रह गए थे, वो शिकवा सारे,
गवाह अब भी, वो गगन के तारे!

ठहरे कुछ पल, चुभ जाते कांटों से,
बनकर कुछ बूंदें, जब-तब, बह आते आंखों से,
चलता कब वश, जब करते वो बेवश,
खींच ले जाते, उसी ओर बरवस!

मन कब चाहे, फिर, उस ओर जाना,
कंपित-गुंजित पल में, जी कब चाहे, मर जाना,
ठहरा, इक दरिया सा, पर वो ही पल,
संग रहता, एक साया सा हरपल!

काश! दफन हो जाते, सारे अफसाने,
फिर कभी ना खुलते, वक्त के वो बंद तहखाने,
संतप्त रह पाती, सोई मेरी संवेदना,
उधेड़-बुन, न बुनती कोई वेदना!

कभी-कभी, खुल जाते वक्त के तहखाने...