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Tuesday, 24 March 2026

गुजरते हुए लम्हे

वो जो, गुजर रहा था लम्हा,
वो जो कुछ भी घटित हो रहा था वहां,
वही कह गया, ये इक दास्तां,
क्या मुझसे था वास्ता?

वो जो, गुजर रही थी पवन,
वो जो, गंध-विहीन हो रही थी उपवन,
वहीं, शून्य को ताकते नयन,
क्या था, ये कथन?

शायद, सब हो रहे थे तन्हा,
ले चला था सब, वो जाता सा लम्हा,
उकेर कर, वो कदमों के निशाँ,
कुछ रख गया वहां?

वो जो, कहीं मोड़ ले रुख,
वो जो, बता जाए, क्या था वो रुत?
बने हैं कैसे, इतने सारे बुत!
कैसा था, वो दुःख?

वो जो, दे दे कोई विवरण,
वो जो, छूकर, यूँ गुजर जाए पवन,
समझ पाए, ये गमगीन मन,
क्या कुछ था कारण?

वो जो, गुजर रहा ये लम्हा,
वो जो, पुनः घटित हो रहा ये यहां,
उकेरेगी मन पर कोई निशाँ,
कल वे, बनेंगी दास्तां!

Monday, 12 February 2024

दास्तां

ना थी खबर, ये दो किनारे हैं अलग,
सर्वथा, समानांतर और पृथक,
पाट पाएं, कब इन्हें,
गुजरती सदी और उम्र की नदी,
अब जो है ये इल्जाम....

न ये था पता, पल में बनती है दास्तां,
गुजरती हैं, पलकों में सदियां,
भरता, ये ज़ख्म कहां!
बदलती हैं कहां, पल के दास्तां,
और, किस्से वो तमाम.... 

अब ये दास्तां, यही राह और रास्ता,
उन्हीं सदियों से, इक वास्ता,
कैसे हों भला, पृथक,
सदी और गुजरती उम्र की नदी,
पिघलता सा हर शाम....