Monday, 27 March 2017

हिस्से की जिंदगी

बहुत ही करीब से गुजर रही थी जिंदगी,
कितना कोलाहल था उस पल में,
मगर बेखबर हर कोलाहल से था वो पथिक,
धुन बस एक ही ! अपने मंजिल तक पहुचने की!

मुड़-मुड़कर उसे देखती रही थी जिन्दगी,
पर उसे साँस लेने तक की फुर्सत नहीं,
अनथक कदम अग्रसर थे बस उस मंजिल की ओर,
पल-पल जिंदगी से दूर होते गए उसके कदम।

निराश हतप्रभ अब हो चली थी जिंदगी,
कचनार हो गई हो जैसे सुगंधहीन,
गुलमोहर की कली ज्युँ सूखकर हुई हो कांतिहीन,
प्रगति के पथ पर जिन्दगी से दूर था वो पथिक।

मंजिलों पर वो अब तलाशता था जिंदगी,
हाथ आई सूखी हुई सी कुछ कली,
रंगहीन गंधहीन अध-खिली सहमी बिखरी डरी सी,
छलक पड़े थे नैनों में दो बूँद नीर की भटकी हुई।

बहुत ही करीब से गुजर चुकी थी उसके हिस्से की जिंदगी।

Saturday, 25 March 2017

आभास

परछाई हूँ मैं, बस आभास मुझे कर पाओगे तुम .....

कर सर्वस्व निछावर,
दिया था मैने स्पर्शालिंगन तुझको,
इक बुझी चिंगारी हूँ अब मैं,
चाहत की गर्मी कभी न ले पाओगे तुम।

अब चाहो भी तो,
आलिंगनबद्ध नही कर पाओगे तुम,
इक खुश्बू हूँ बस अब मैं,
कभी स्पर्श मुझे ना कर पाओगे तुम।

चाहत हूँ अब भी तेरा,
नर्म यादें बन बिखरूँगा मैं तुममें ही,
अमिट ख्याल हूँ बस अब मैं,
कभी मन से ना निकाल पाओगे तुम।

तेरी साँसों में ढलकर,
बस छूकर तुम्हें निकल जाऊँगा मैं,
झौंका पवन का हूँ इक अब मैं,
सदा अपनी आँचल से बंधा पाओगे तुम।

साया हूँ तेरा, बस महसूस मुझे कर पाओगे तुम....

Wednesday, 15 March 2017

अवशेष

अवशेष बचे हो कुछ मुझमें तुम!
विघटित होते अंश की तरह,
कहीं दूर भटक जाता है ये अर्धांशी,
अवशेषों के बीच कभी बज उठती कोई संगीत,
अतीत से आते किसी धुन की तरह...

विखंडित अवशेष लिए अन्तःमन में,
बचा हूँ कुछ अर्धांश सा शेष,
बीते से मेरे कुछ पल, मैं और इक दिवा स्वप्न!
धुंधली सी तेरी झलक के अंश,
और तेरी चुंबकीय यादों के अमिट अवशेष!

संवेदनाओं के अवशेषों के निर्जीव ढेर पर,
कहीं ढूंढता हूँ मैं तेरा शेष,
इक जिजीविषा रह गई है बस शेष,
जिसमें है कुछ व्याकुल से पल,
और तेरे अपूर्ण प्रेम के अमिट अवशेष!

Monday, 13 March 2017

जगने लगे हैं सपने

वो ही सपने, पलकों तले फिर से लगे हैं जगने........

स्वप्न सदृश्य, पर हकीकत भरे जागृत मेरे सपने,
जैसे खोई हुई हो धूप में आकाश के वो सितारे,
चंद बादल विलीन होते हुए आकाश पर लहराते,
वो ही सपने, पलकों तले फिर से लगे हैं जगने........

खामोश सी हो चली हैं अब कुछ पल को हवाएँ,
और रुकी साँसों के वलय लगे हैं तेज धड़कने,
रुक से गए हैं तेज कदमों से भागते से वो लम्हे,
वो ही सपने, पलकों तले फिर से लगे हैं जगने........

गूँजती हैं कहीं जब ठिठकते से कदमों की आहट,
बज उठती है यूँहीं तभी टूटी सी वीणा यकायक,
चुपके से कानों में कोई कह जाता है इक कहानी,
वो ही सपने, पलकों तले फिर से लगे हैं जगने........

जागृत हकीकत है ये, स्वप्न सदृश्य मगर है लगते,
परियों की देश से, तुम आए थे मुझसे मिलने,
हर वक्त हो पहलू में मेरे, जेहन में हैं तेरी ही बातें,
वो ही सपने, पलकों तले फिर से लगे हैं जगने........

Monday, 6 March 2017

एकांत प्रतीक्षा

एकांत सदैव स्नेह भरा मेरा ये प्रतीक्षित मन,
ज्युँ एकांत सा है ये सागर,
किसी विवश प्रेमी की भाँति युगों से प्रतीक्षारत.....
प्रतीक्षा के मेरे ये युग तुम ले लो!
चैनो-सुकून के मेरे पल मुझको वापस दे दो!

एकांत मेरे स्वर में है क्रंदन सा स्नेह गायन,
ज्युँ दहाड़ता है ये सागर,
बार बार इन गीतों को जग कर गाता है ये मन.....
प्रतीक्षा के मेरे ये गीत तुम ले लो!
उनींदी नींदों के मेरे पल मुझको वापस दे दो!

एकांत साँसो में अवरोधित हैं प्राणों के घन,
ज्युँ शांत हुआ है ये सागर,
निष्प्राण हुई हैं साँसे, विरान बाहों का आलिंगन.....
प्रतीक्षित ये आलिंगन तुम मेरा ले लो!
अवरुद्ध सांसो के मेरे घन मुझको वापस दे दो!

प्रतीक्षा के इन एकांत पलों में तुम साथ मेरा दे दो.....

Sunday, 5 March 2017

मैं सौदागर

मैं खुशियों का व्योपारी, कहते मुझको सौदागर।

बेचता हूँ खुशियों की लड़ियाँ,
चँद पिघलते आँसुओं के बदले में,
बेचता हूँ सुख के अनगिनत पल,
दु:ख के चंद घड़ियों के बदले में।

सौदा खुशियों की करने आया मैं सौदागर।

सौदा मेरा है बस सीधा सरल सा,
सुख के बदले अपने दुख मुझको दे दो,
मोल जोल की भारी गुंजाईश इसमें,
जितना चाहो उतनी खुशियाँ मुझसे लो।

सौगात खुशियों की लेकर आया मैं सौदागर।

खुलती दुकान मेरी चौबीसो घंटे,
सौदा सुख का तुम चाहे जब कर लो,
स्वच्छंद मुस्कान होगी कीमत मेरी,
बदले में मुस्कानों की तुम झोली ले लो।

मैं खुशियों का व्योपारी कहते हैं मुझको सौदागर।

सुख दुख तो इक दूजे के संगी,
लेकिन संग कहाँ कहीं पर ये दिखते हैं,
इक जाता है तो इक आता है,
साथ साथ दोनो इस मन में ही बसते हैं।

सौगात जीवन की लेकर आया हूँ मैं सौदागर।

मन की दीवारों को टटोलकर देखो
सुख के गुलदस्ते अभी तक वहीं टंके हैं,
हृदय के अंदर तुम झाँककर देखो,
सुख का सौदागर तो रमता तेरे ही हृदय है।

ढ़ूंढ़ों तुम अपने हृदय में वही बड़ा है सौदागर।

उत्कंठा और एकाकीपन

दिशाहीन सी बेतरतीब जीवन की आपाधापी में,
तड़प उठता मन की उत्कंठा का ये पंछी,
कल्पना के पंख पसारे कभी सोचता छू लूँ ये आकाश,
विवश हो उठती मन की खोई सी रचनात्मकता,
दिशाहीन गतिशीलताओं से विलग ढूंढता तब ये मन,
चंद पलों की नीरवता और पर्वत सा एकाकीपन...

जीवन खोई सी आपधापी के अंतहीन पलों में,
क्षण नीरव के तलाशता उत्कंठा का ये पंछी,
घुँट-घुँट जीता, पल-पल ढूंढता अपना खोया आकाश,
मन की कँवल पर भ्रमर सी डोलती सृजनशीलता,
तब अपूर्ण रचना का अधूरा ऋँगार लिए ढूंढता ये मन,
थोड़ी सी भावुकता और गहरा सा एकाकीपन.....

रचनाएँ करती ऋँगार एकाकीपन के उन पलों में,
पंख भावना के ले उड़ता उत्कंठा का ये पंछी,
कोमल संवेदनाओं को मिलता अपना खोया आकाश,
नीरव सा वो पल देती उत्कंठाओं को शीतलता,
विविध रचनाओं का पूर्ण संसार बन उठता ये मन,
सार्थक करते जीवन, ये पर्वत से एकाकीपन....