Monday, 25 December 2017

क्षणिक अनुराग

कर क्षणिक अनुराग, वो भँवरा ले उड़ा पराग....

दो छंदों का यह कैसा राग?
न आरोह, न अनुतान, न आलाप,
बस आँसू और विलाप.....
ज्यूँ तपती धरती पर,
छन से उड़ जाती हों बूंदें बनकर भाफ,
बस तपन और संताप....
यह कैसा राग-विहाग, यह कैसा अनुराग?

कर क्षणिक अनुराग, वो भँवरा ले उड़ा पराग....

गीत अधुरी क्यूँ उसने गाई,
दया तनिक भी फूलों पर न आई,
वो ले उड़ा पराग....
लिया प्रेम, दिया बैराग,
ओ हरजाई, सुलगाई तूने क्यूँ ये आग?
बस मन का वीतराग.....
यह कैसा राग-विहाग, यह कैसा अनुराग?

कर क्षणिक अनुराग, वो भँवरा ले उड़ा पराग....

सूना है अब मन का तड़ाग,
छेड़ा है उस बैरी ने यह कैसा राग!
सुर विहीन आलाप....
बे राग, प्रीत से विराग,
छम छम पायल भी करती है विलाप,
बस विरह का सुहाग.....
यह कैसा राग-विहाग, यह कैसा अनुराग?

कर क्षणिक अनुराग, वो भँवरा ले उड़ा पराग....

No comments:

Post a Comment

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

स्पर्श....छू कर जरा सा

छू कर, जरा सा... बस, गुजर सी गई थी इक एहसास! थम सा चुका था, ये वक्त, किसी पर्वत सा, जड़! यथावत! गुजरती ही नहीं थी, आँखो से वो तस्वीर...

विगत वर्ष की मेरी कुछ लोकप्रिय रचनाएँ