Tuesday, 6 March 2018

इक परिक्रमा

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

है कई सवाल, पर जवाब एक ही!
कई रास्तों पर सफर, बसर है बस वहीं!
थक गए अगर, मुड़ गए कदम वहीं,
नींद में, नाम वही लेती जिन्दगी!
अविराम परिक्रमा सी, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

सौ-सौ शिकवे, शिकायतें उनसे ही,
मुहब्बत की हजारों, रवायतें उनसे ही,
हकीकत में ढलती, रवानी वही!
परिक्रमा करती, इक कहानी वहीं,
अहद-ए-वफा निभाती, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

इक छोर है यहाँ, दूजा छोर कहीं
विश्वास के डोर की, बस धूरी है वही,
उसी धूरी के गिर्द, ये परिक्रमा,
ज्यूं तारों संग, नभ पर वो चन्द्रमा!
कोई प्रेमाकाश बनाती, ये इक बन्दगी!

कुछ वादों के इर्द-गिर्द, परिक्रमा करती ये जिन्दगी...

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