Friday, 18 September 2026

काली चादर

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
उकेर जरा, ये काली चादर,
मुंह फेर इधर, देख तमस के बाहर,
जागी कितनी ये रात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
बातों में, कुछ ताने ही दे,
उमस भरे, सारे अफसाने कह दे,
पिघल पड़े जज्बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
नींद नहीं, तो सपने ही दे,
धड़कन को, सपनों में हंसने तो दे,
रुकी-रुकी हर बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
बिन बातों के, जीवन कैसा,
जीवंत एहसासों बिन,आंगन कैसा,
जगाए, ऐसी ही बात!

कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात।

No comments:

Post a Comment