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Friday, 6 February 2026

सब्र

क्यूँ हो जाती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
क्यूँ  सांझ ढले, होती है ये किरणें निस्तेज,
क्यूँ होता है, नज़दीकियों में, दूरियों सा एहसास,
क्यूँ खुद ना मिलूँ, तब, कभी मैं अपने पास,
क्यूँ, इन हालातों में, रखूँ कोई आश।

कैसा ये विचलन, कैसी उलझी ये पेचीदगियां,
इन हालातों में, बढ़ाऊं कैसे नजदीकियाँ!
बदलते से पलों के दरमियां, किनसे रखूँ दूरियाँ!
हर ओर उठता धुआं, ओझल होता आसमाँ,
समझाये कौन, मुझको ये बारीकियां!

बस, एक सब्र है, शायद वो भी, न हो हताश,
खुद भी कहाँ, इस पल, मैं अपने पास,
कहीं उन्हीं दूरियों में गुम, कुछ ढूंढता बदहवास,
पाने को आसमाँ, खोने को कुछ न पास,
संभल मन, धर धीर, हो न यूँ निराश!

बन एक सहेली, संग-संग खेले आश निराश,
ज्यूँ एक पहेली, समझ न आये खास,
लुभावन होता, कभी ये सांझ सा ढलता आंगन,
स्मृतियों के क्षण, पुलकित होता ये मन, 
तभी हो प्यारा, वही तन्हा सा घन।

यूँ ही होती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
यूँ ही सांझ ढले, होती ये किरणें निस्तेज,
यूँ फिर होगा, दूरियों में नज़दीकियों का एहसास,
यूँ खुद से मिल लेना, तन्हाईयों में पास,
क्यूँ, इन हालातों में, तू खोये आश।

Monday, 21 June 2021

चाँदनी कम है जरा

उतर आइए ना, फलक से जमीं पर,
यहाँ चाँदनी, कम है जरा!

कब से हैं बैठे, इन अंधेरों में हम,
छलकने लगे, अब तो गम के ये शबनम,
जला दीजिए ना, दो नैनों के ये दिए,
यहाँ रौशनी, कम है जरा!

उतर आइए ना, फलक से जमीं पर,
यहाँ चाँदनी, कम है जरा!

इक भीड़ है, लेकिन तन्हा हैं हम,
बातें तो हैं, पर कहाँ उन बातों में मरहम,
शुरू कीजिए, फिर वो ही सिलसिले,
यहाँ बानगी, कम हैं जरा!

उतर आइए ना, फलक से जमीं पर,
यहाँ चाँदनी, कम है जरा!

नजदीकियों में, समाई हैं दूरियाँ,
पास रह कर भी कोई, दूर कितना यहाँ,
दूर कीजिए ना, दो दिलों की दूरियाँ, 
यहाँ बन्दगी, कम हैं जरा!

उतर आइए ना, फलक से जमीं पर,
यहाँ चाँदनी, कम है जरा!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 13 June 2019

दूरियाँ

असह्य सी हैं, हर पल बढ़ती दूरियाँ!

दर्द ही दे गया, उनसे ये बिछड़न,
पीड़ कैसे सह सकेगा, नाजुक सा ये मन,
तोड़ कैसे पाएगा, उनसे ये बंधन,
जोड़ती है क्यूँ, रिश्ते दूरियाँ!

दुरूह सा है कितना, ये बिछड़न,
उभरते फासलों में, बढ़ता हुआ विचलन,
पल-पल, तेज होती एक धड़कन,
असह्य हैं, ये बढ़ती दूरियाँ!

तड़प, दर्द और उभरता विषाद,
अन्तर्द्वन्द्व, विछोह, जन्म लेता अवसाद,
मन से मन का, हर-पल इक विवाद,
रह-रह के, कुरेदती दूरियाँ!

रिश्तों की, ये नाजुक बारीकियाँ,
दूरियों में, पल-पल बढ़ती नजदीकियाँ,
हर पल ऊँघता, पनपता गठबंधन,
उत्पीड़न, देती हैं दूरियाँ!

क्यूँ न बन जाए, फिर अफसाने,
हुए जो बेगाने, जोड़ ले वो रिश्ते पुराने,
चल रे मन, चल नाप ले फासले,
चलो कर ले तय, दूरियाँ!

असह्य सी हैं, हर पल बढ़ती दूरियाँ!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा

Thursday, 27 April 2017

ये दूरियाँ

क्यूँ रही दिल के बहुत करीब वो सदियों की दूरियाँ?

क्या कोई तिलिस्म है ये
या गहरा है कोई राज ये,
या है ये हकीकत,
या है ये बस इक तसब्बुर की बात।

क्यूँ थम सी गई है धूँध सी चलती हुई ये आँधियाँ?

क्यूँ हवाओं में ललक ये,
या ठहर गई है खुद पवन ये,
या है ये बेताबियाँ,
या है ये बस बदलते मौसमों की बात।

क्या है ये दूरियों में बारीकी से पिरोई नजदीकियाँ?

क्युँ अंधेरों में है चमक ये,
या हैं ये शाम के उजाले,
या है ये सरगोशियाँ,
या है ये दिल उन्हीं दूरियों में आज।

चल संभल ले ऐ दिल, बहकाए न तुझको ये दूरियाँ ।