Thursday, 8 March 2018

बहती जमीं

बहते से रास्तों पर, मंजिल को ढॣंढता हूं मैं...
आए न हाथ जो, सपने वही ढॣंढता हूं मैं...

आरजुओं के गुल ढूंढता हूं मैं,
बहती सी इस जमीं पर,
शहर-शहर मन्नतों के घूमता हूं मैं....

बस इक धूल सा उड़ता हूं मै,
इन्ही फिजाओं में कहीं,
बेवश दूर राहों पे भटकता हूं मैं.....

इक वो ही निशान ढूंढता हूं मैं,
बह रही जो रास्तों पर,
ख्वाहिशों के मुकाम ढॣंढता हूं मैं...

बहते से रास्तों पर, मंजिल को ढॣंढता हूं मैं...
आए न हाथ जो, सपने वही ढॣंढता हूं मैं...

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

कोरा अनुबंध

कैसी ये संविदा? कैसा यह कोरा अनुबंध? अनुबंधों से परे ये कैसा है बंधन! हर पल इक बंधन में रहता है ये मन! किन धागों से है बंधा ये बंधन! ...

विगत 30 दिनों में ज्यादा लोकप्रिय रचनाएँ