Saturday, 18 April 2026

महज स्पंदन!

महज, कोरा सा अनुभव है, 
या है, कल्पनाओं में पिरोया, कोई छुअन,
या कहीं, मूर्त होता, कोई सत्य,
या, सिर्फ इक स्पंदन!

कैसे, छिड़ते हैं खुद ये तार,
क्यूँ, उस पल, ये मन, हो उठता है, बेजार,
ये गगन, होता क्यूँ मेघाच्छादित,
क्यूँ, जगता ये स्पंदन!

स्पंदन, ज्यूँ, सहचर हैं मेरे,
यूँ, विरह, मिलन, बिछड़न, तड़पन के घेरे,
ठौर कहीं ना, पल भर पाए मन,
जागे, जब ये स्पंदन!

उजले, उन यादों के पल,
उथले-उथले, बहते, जज्बातों के हलचल,
ज्यूँ बहती, इक सरिता कलकल,
हैरां, करते ये स्पंदन!

संभालूं, किन जज्बातों कोे,
याकि, उन कल्पनाओं से, हो जाऊं रूबरू,
भले थोड़ी ही, उनसे हो गुफ्तगू,
सताए, ना ये स्पंदन!

अनुभव, ना हो महज कोरा,
छुअन, ना हो सिर्फ कल्पनाओं में पिरोया,
और, मूर्त कहीं, हो जाए, सत्य,
मधुर, लगे ये स्पंदन!

8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 21 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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    1. पटल पर स्थान देने हेतु हार्दिक आभार आदरणीय

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  2. जो कहता है यह कल्पना है, वह भी तो कल्पना है, तो क्यूँ न भरोसा करें स्पंदन पर, जिससे यह सारा जगत ओतप्रोत है

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    1. इस सुंदर सी प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया

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    1. निरंतर प्रेरित करते रहने के लिए आभार आदरणीय

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  4. स्पंदन ही है मर्म। अभिवादन ।

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    1. निरंतर प्रेरित करते रहने के लिए आभार आदरणीया

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