Friday, 27 February 2026

गिला

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

झांकता, कभी खिड़कियों से,
जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,
शाख की, रंगीनियों से,
पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,
झूलती, उनकी पत्तियों से,
कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!
पता ही ना चला....

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

ठहरा रहा, ये पथिक राह में,
खोया ही रहा, कामनाओं की प्रवाह में,
उस शाम की, चाह में,
समेटे अंतःघुटन को, अपनी आह में,
पास थे, पर दूर कितने,
कब वो संग आए, कब रूठकर वो दूर हो चले!
पता ही ना चला....

व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....

Sunday, 15 February 2026

खोता सुध

सुध, खोता जाता हूँ....

हैरान कर देते हो, इस बुत को,
यूँ, पल पल, बुनते हो, मुझमें खुद को,
उलझता सा, जाता हूँ,
शर्माता हूँ,
फिर, खुद पर इतराता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

समझ सकूं ना, कैसी ये भाषा!
चंचल उन नैनों की, सांकेतिक परिभाषा,
इंगित, क्या अभिलाषा!
कैसी आशा!
जागृत, खुद में पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

फुर्र हो चले, सुधि के वो क्षण,
हो चले अनियंत्रित, हृदय के ये धड़कन,
अंतः, गहराता इक सावन,
लहराता घन,
बरसता, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

इक बुत ही था, अब जिंदा हूँ,
अंजाने, धड़कन और साँसों में बंधा हूँ,
लिपटा, उनकी ही धागों में,
एहसासों में,
सिमटा, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

Friday, 6 February 2026

सब्र

क्यूँ हो जाती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
क्यूँ  सांझ ढले, होती है ये किरणें निस्तेज,
क्यूँ होता है, नज़दीकियों में, दूरियों सा एहसास,
क्यूँ खुद ना मिलूँ, तब, कभी मैं अपने पास,
क्यूँ, इन हालातों में, रखूँ कोई आश।

कैसा ये विचलन, कैसी उलझी ये पेचीदगियां,
इन हालातों में, बढ़ाऊं कैसे नजदीकियाँ!
बदलते से पलों के दरमियां, किनसे रखूँ दूरियाँ!
हर ओर उठता धुआं, ओझल होता आसमाँ,
समझाये कौन, मुझको ये बारीकियां!

बस, एक सब्र है, शायद वो भी, न हो हताश,
खुद भी कहाँ, इस पल, मैं अपने पास,
कहीं उन्हीं दूरियों में गुम, कुछ ढूंढता बदहवास,
पाने को आसमाँ, खोने को कुछ न पास,
संभल मन, धर धीर, हो न यूँ निराश!

बन एक सहेली, संग-संग खेले आश निराश,
ज्यूँ एक पहेली, समझ न आये खास,
लुभावन होता, कभी ये सांझ सा ढलता आंगन,
स्मृतियों के क्षण, पुलकित होता ये मन, 
तभी हो प्यारा, वही तन्हा सा घन।

यूँ ही होती है धूमिल, वक्त की सजीली सेज,
यूँ ही सांझ ढले, होती ये किरणें निस्तेज,
यूँ फिर होगा, दूरियों में नज़दीकियों का एहसास,
यूँ खुद से मिल लेना, तन्हाईयों में पास,
क्यूँ, इन हालातों में, तू खोये आश।