Thursday, 24 March 2016

हिचकियों का दौर

क्युँ सरक रहा हूँ मैं! क्या बेवसी में याद किया उसने मुझे?

शायद हो सकता है........
रूह की मुक्त गहराईयों में बिठा लिया है उसने मुझे,
साँसों के प्रवाह के हर तार में उलझा लिया है उसने मुझे,
सुलगते हुए दिलों के अरमान में चाहा है उसने मुझे,

क्या बरबस फिर याद किया उसनेे? आई क्युँ फिर हिचकी!

या फिर शायद..........
दबी हुई सी अनंत चाह है संजीदगी में उनकी,
जलप्रपात सी बही रक्त प्रवाह है धमनियों में उनकी,
फिजाओं में फैलता हुआ गूंज है आवाज में उनकी।

फिर हुई हिचकी! क्या चल पड़ी हैं वो निगाहें इस ओर ?

शायद हो न हो.......
तल्लीनता से वो आँखे देखती नभ में मेरी ओर,
मशरूफियत में जिन्दगी की ध्यान उनका है मेरी ओर,
या हिज्र की बात चली और आ रहे वो मेरी ओर।

सरक रहा हूँ मैं, रूह में अब बस गया ये हिचकियों का दौर ।

ये क्या कह गया तुमसे नशे में

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

जाम महुए की पिला दी थी किसी नें,
उस पर धतूरे की भंग मिलाई थी किसी ने,
मुस्कुराकर शाम शबनमी बना दी थी आप ने,
उड़ गए थे होश मेरे, मन कहाँ रह गया था वश में।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

यूँ तो मैं पीता नही जाम हसरतों के,
पिला दी थी दोस्तों नें कई जाम फुरकतों के,
मुस्कुराए आप जो छलके थे जाम यूँ ही लबों पे,
होश में हम थे कहाँ, देखकर आपको सामने।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

ये दो नैन मयखाने से लग रहे आपके,
जाम कई हसरतों के छलकाए है यूँ आपने,
लड़खड़ाए मेरे कदम आपकी मुस्कुराहटों में,
उड़ चुके हैं होश मेरे, मन विवश आपके सामने।

ओह! आज मैं ये क्या कह गया तुमसे नशे में?

Wednesday, 23 March 2016

वो कौन

वो कौन जो पुकार रहा क्षितिज की ओर इशारों से।

पलक्षिण नृत्य कर रहा आज जीवन के ,
बौराई हैं सासें मंजरित पल्लव की खुशबु से,
थिरक रहीं हैं हर धड़कन चितवन के,
वो कौन जो भर लाया है मधुरस आज उपवन सेे।

जीर्णकण उल्लासित चहुंदिस उपवन के,
जैसे घूँट मदिरा के पी आया हो मदिरालय से,
झंकृत हो उठे है तार-तार इस मधुबन के,
वो कौन जो बिखेर रहा उल्लास मन के आंगन में।

मधुकण अल्प सी पी गया मैं भी जीवन के,
बज उठे नवीन सुरताल प्राणों के अंतःकरण से,
गीत नए स्वर के छेर रहे तार मन वीणा के,
वो कौन जो पुकार रहा क्षितिज की ओर इशारों से।

वक्त ही नही है

वक्त ठहरता ही नही,

आशाएं बढती ही जाती जीवन की इस गतिशीलता में,

भावनाएं! या तो पंख पा लेती या फिर कुंठित हो जाती,

आंखे जीवन भर तलाशती रह जाती हैं उन्हे,

जिनसे भावनाओं को समझने की उम्मीद हों बंधी,

वो मिल भी गया तो ........

वक्त ही नही उसके पास भी ।

उसे यह फ़िक्र है हरदम : स्व. भगत सिंह, 1931

अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को शत-शत नमन।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपनी जंग को कुछ यूँ बयाँ किया था,

उसे यह फ़िक्र है हरदम : भगत सिंह (मार्च 1931)

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

रचनाकाल: मार्च 19319

(यह रचना अपने ब्लाग के माध्यम से आपलोगों के साथ साझा करने में मुझे गर्व महसूस हो रहा है। क्रान्ति की इस मशाल को नमन।)

Tuesday, 22 March 2016

रुत मिलने की आई (होली विशेष)

रुत मिलने की आई आँचल को लहराने दो।

बरसी है आग इन घटाओं से आज,
छलके हैं जाम इन बूदों के साथ,
भीगा भीगा सा तन सुलग रहा क्युँ आज,
बहका सा मन होली में आँचल को भीग जाने दो।

रुत मिलने की आई जुल्फों को बिखर जाने दो।

मस्त हवाएँ गुजर रही हैं तुमको छूकर,
बिखरे है ये लट चेहरे पर झूमकर,
आँखों में उतरा है जाम आज छलक कर,
उलझा हूँ मैं जुल्फो में जाम नजरों से पी लेने दो।

रुत मिलने की आई आज मुझको बहक जाने दो।

बेमतलब कोई बात बने

बेमतलब ही आँचल स्नेह का मिल जाए तब कोई बात बने!

वो कहते कुछ अपनी कह लूँ तब कोई बात बने!
साथ कहाँ कोई देता जग में यूँ ही,
यूँ बिन मतलब के बात यहाँ करता क्या कोई?
सबकी अपनी धुन सबकी अपनी राह,
मतलब की है सब यारी मतलब की सब बात,

बेमतलब की बातें दिल की कोई सुन ले तब बात बने।

वो कहते दो चार कदम मैं चल लूँ तब साथ बने!
क्या कदमों का चलना ही जीवन है?
दो चार कदम संग ढ़लना ही क्या जीवन है?
सबकी अपनी चाल सबका अपना रोना है,
जीवन बस इक राग, साथ-साथ जिसको गाना है।

बेमतलब ही कोई संग गीत गुनगुना ले तब कोई बात बने।

बेमतलब ही साया प्यार का मिल जाए तब कोई बात बने!