Tuesday, 14 November 2023

मध्य कहीं


मध्य कहीं, हर बातों में ......

ये किसके चर्चे, कर उठता है मन,
ले कर इक, अल्हरपन!
महसूस कराता, बिन मौसम इक सावन,
मध्य कहीं....
ठहराव लिए, जज्बातों में!
 
अब तो, बह आती इक खुश्बू सी,
छा उठता, इक जादू सा,
नज़रें टिक जाती, उस विस्तृत नभ पर,
मध्य कहीं....
इक इंतजार लिए, रातों में!

खोए वो पल, सपनों सी रातों में,
आए ही कब, हाथों में,
अल्हरपन में, बस उन्हीं पलों के चर्चे,
मध्य कहीं....
करता ये मन, हर बातों में!

शायद, ढूंढे, मन अपना मनचाहा,
अंजाना सा, इक साया,
डूबते-उपलाते, निरर्थक बहते पल के,
मध्य कहीं....
अर्थ कोई, बहकी रातों में!

मध्य कहीं, हर बातों में ......

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, 5 November 2023

नन्हीं दीप


हो चला एहसास, बंध चली उम्मीद,
मद्धिम सी जल रही, यूं कहीं,
नन्हीं सी, इक दीप!

यूं तो कम न थे, झौंके,
उमरते धूल, और चुभते शूल राह के,
दबी सी इक घुटन,
खौफ, उन अंधेरों के!
पर कहीं, जलकर हौसला देती रही,
नन्हीं सी, इक दीप!

खोए, उजालों में कहीं,
हर नजर, ढूंढ़ती है अपनी ही जमीं,
टूटे वो सारे सपने,
बिखरे, नैनों की नमीं!
पर, छलके प्यालों संग, जलती रही,
नन्हीं सी, इक दीप!

विलगते, सांझ के साए,
बिछड़ते, मद्धम रात के वो सरमाए,
टूटे तारों सा गगन,
कौन सिमेट कर लाए!
पर, जलती रही, मन की गलियों में,
नन्हीं सी, इक दीप!

हो चला एहसास, बंध चली उम्मीद,
मद्धिम सी जल रही, यूं कहीं,
नन्हीं सी, इक दीप!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 21 October 2023

छूटते लम्हे

प्यार यूं तो, बहुत है इस ज़िन्दगी से,
पर ये लम्हे, हैं कम कितने!

लरी खुशियों की, यूं ही, हम बुनते,
कली ये सारे, यूं ही हम चुनते,
क्या करें!
यूं तो, गम भी हैं कितने!

प्यार यूं तो.....

जल उठे, यूं दिये बंद एहसासों के,
धुवें कितने, यूं गर्म सांसों के,
क्या करें!
नमीं आंखों में, हैं कितने!

प्यार यूं तो.....

यूं कहें किससे, ये किस्से अनकहे,
यूं जलजले से उठते ही रहे,
क्या करें!
गुम से साहिल हैं कितने!

प्यार यूं तो, बहुत है इस ज़िन्दगी से,
पर ये लम्हे, हैं कम कितने!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 4 October 2023

मद्धिम रात

हौले-हौले, मद्धिम होती रही रात,
सुबह तक, अधूरी हर बात!

स्वप्न सरीखी, अनुभूतियां,
कंपित होते, कितने ही पल,
उलझे हैं, इन आंखों पर,
ज्यूं, जागी है रात!

हौले-हौले, मद्धिम होती रही रात,
सुबह तक, अधूरी हर बात!

सुलझे कब, ऐसे उलझन,
विस्मित, दो तीर, खड़ा मन,
अपना लूं, सुबह के पल,
या, मद्धिम सी रात!

हौले-हौले, मद्धिम होती रही रात,
सुबह तक, अधूरी हर बात!

भ्रमित करे, ये मृगतृष्णा,
खींचे स्वप्न भरे कंपित पल,
सहलाए, भूले मन को,
हौले-हौले, ये रात!

हौले-हौले, मद्धिम होती रही रात,
सुबह तक, अधूरी हर बात!

सुबह के, ये भीगे पात,
अलसाई, उंघती हर छटा,
वो नन्हीं सी, इक घटा,
कहती अधूरी बात!

हौले-हौले, मद्धिम होती रही रात,
सुबह तक, अधूरी हर बात!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, 29 August 2023

फरमाईश

दरिया, इक ठहरा सा मैं,
चंचल हो, 
उतने ही तुम!

है इक, चुप सा पसरा,
झंकृत हो उठता, वो सारा पल गुजरा,
सन्नाटों से, अब कैसी फरमाईश,
शेष कहां, कोई गुंजाइश!

समय, कोई गुजरा सा मैं,
विह्वल हो,
उतने ही तुम!

उठती, अन्तर्नाद कभी,
मुखरित हो उठते, गूंगे फरियाद सभी,
कर उठते, वे भी इक फरमाईश,
क्षण से, रण की गुंजाइश!

बादल, इक गुजरा सा मैं,
अरमां कई,
भीगे-भीगे तुम!

गुजरुंगा, इक चुप सा,
हठात्, उभरता, ज्युं अंधेरा घुप सा,
रहने दो, अधूरी इक फरमाईश,
उभरने दो, इक गुंजाइश!

इक अंत हूं, गुजरा सा मैं,
पंथ प्रखर,
उतने ही तुम!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
  (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 24 June 2023

जीत

मन में लिए, कई उलझन,
पहली बार, विदा हो आई जब मेरे आंगन,
शंकाओं भरा, 
था बड़ा ही, वो तेरा मन!

पर, कहीं, थी इक लगन,
मध्य उलझनों के, विहँसता रहा तेरा मन,
उम्मीदों भरा, 
था बड़ा ही, वो तेरा मन!

झौंक जाते, तप्त पवन,
चौंक जाते हर आहटों पर, तेरे हृदयांगन,
ममत्व भरा, 
था बड़ा ही, वो तेरा मन!

बिता चुके, इक जीवन,
हर वक्त, संग मेरे इसी देहरी इसी आंगन,
निस्वार्थ सा,
स्वत्व से परे, तेरा मन!

जाने कब हारा ये मन,
तेरे ही नैनों की गलियों में, बेचारा ये मन,
मैं हैरान सा,
छू लूं, प्यारा तेरा मन!

तुम बिन सूना जीवन,
अब तुम बिन, राहों में कितने हैं उलझन,
सब मैं हारा,
जीत चला, तेरा मन!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, 18 June 2023

आशाओं तक

दो तीर, चले मन,
अधीर,
अन्तः कोई पीर लिए मन!

इक तीर, ठहराव भरा,
विस्तृत, आशाओं का द्वार हरा,
दूजे, धार बड़ा,
पग-पग, इक मझधार खड़ा,
आशाएं, बांध चले मन!

छिछली सी, राहों पर,
अन्तहीन, उथली सी चाहों पर,
उस ओर चले,
जिस ओर, सन्नाटों सा शोर,
अल्हड़, मौन रहे मन!

सांझ, किरण कुम्हलाए,
‌निराशाओं के, बादल ले आए,
चले मौन पवन,
बांधे कब ढ़ाढ़स, तोड़ चले,
बंध, तोड़ बहे ये मन!

धूमिल सी, वो आशाएं,
छिछली सी, ये अंजान दिशाएं,
खींच लिए जाए,
थामे, धीरज का इक दामन,
सरपट, दौड़ चले मन!

दो तीर, चले मन,
अधीर,
अन्तः कोई पीर लिए मन!

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
   (सर्वाधिकार सुरक्षित)