Saturday, 19 March 2016

झील का कोई समुंदर नहीं

कहते हैं कि झील का कोई समुंदर नही होता!
मैं कहता हूँ कि झील सा सुन्दर कोई समुन्दर नही होता!

अपनी ही स्थिरता, विराम, ठहराव है उस झील का,
आभा अद्भुद, छटा निराली, चारो तरफ हरियाली,
प्रकृति की प्रतिबिम्ब को खुद में लपेटे हुए,
अपने आप में पूरी पूर्णता समेटे हुए झील का किनारा।

प्यार है मुझको उस ठहरे हुए झील से,
रमणीक लगती मन को सुन्दरता तन की उसके।

कमल कितने ही जीवन के खिलते हैं इसकी जल में,
शान्त लगती ये जितनी उतनी ही प्रखर तेज उसके,
मौन आहट में उसकी स्वर छुपते हैं जीवन के,
बात अपने मन की कहने को ये आतुर नही समुन्दर से।

झील का अपना ही मन, जो आकर मिलती है मेरे मन से।

Friday, 18 March 2016

कौन हो तुम

कौन हो तुम?
इक सोच हो या बहती समय हो तुम,
या फिजाओं मे घुली हुई इक महक हो तुम,
बादलों का आँचल हो या फैली हुई धुँध हो तुम।

कौन हो तुम?
बहती नदी हो या चंचल सी छवि हो तुम,
घुल रही है वादियों मे जो, क्या वही स्वर हो तुम,
छलकती हुई धार हो या ठहरी हुई नीर हो तुम।

कौन हो तुम?
इस धरा पर कही मिलते नही हैं निशाँ तुम्हारे,
है कहाँ अस्तित्व तुम्हारा? सागर में या आसमान पर,
उस क्षितिज पर या कही और धरती से परे,
अस्तित्व कहीं इस जहाँ में तुम्हारा है भी या नहीं,
या सिर्फ गूँज बनकर आवाज में ढ़लती रही हो तुम।

कौन हो तुम?
ऐसा लगता है कभी महसूस की थी धड़कनें,
कुछ पल के लिए बैठी थी तुम कहीं मेरे सामने,
बहके हुए दिल तब कभी धड़कते भी थे मेरे लिए?

कौन हो तुम?
तुम क्षणिक बूँद, प्यास जिससे बुझती नहीं,
पी भी लूँ जो बूँद लाखों, प्यास अधूरी ज्युँ की त्युँ,
जलधार सी बहती रहो इस मन की आंगन में सदा तुम।

परत दर परत समय

परत दर परत सिमटती ही चली गई समय,
गलीचे वक्त की लम्हों के खुलते चले गए,
कब दिन हुई, कब ढ़ली, कब रात के रार सुने,
इक जैसा ही तो दिखता है सबकुछ अब भी ,
पर न अब वो दिन रहा, ना ही अब वो रात ढ़ले।

रेत की मानिंद उड़ता ही रहा समय का बवंडर,
लम्हों के सैकत उड़ते रहे धुआँ धुआँ बनकर,
अपने छूटे, जग से रूठे, संबंध कई जुड़ते टूटते रहे,
कभी कील बनकर चुभते रहे एहसासों के नस्तर,
धूँध सी छाई हर तरफ जिस तरफ ये नजर चले।

समय का दरिया खामोश सा बह रहा निरंतर ,
कितनी ही संभावनाओं का हरपल गला रेतकर,
कितनी ही आशाओं का क्षण क्षण दम घोंटकर,
पर नई आशाएँ संभावनाओं को नित जन्म देकर,
बह चले हैं हम भी अब जिस तरफ ये समय चले।

Thursday, 17 March 2016

कड़कती धूप मे तड़पती एक जिन्दगी

भाग्य कैसा! कड़कती धूप मे तड़पती एक जिन्दगी वो!

मरुस्थल के सूखी गर्म रेत सी जिन्दगी वो,
मन का आँगन दूर तक विराना,
बालूका तट सी झिलमिल आँखो के कोर,
हृदय में उठती रेत के समुन्दरों के अगनित ज्वर।

प्रारब्ध कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

रेगिस्तान की तपती धूलकण सी जिन्दगी वो,
शरीर रेतकण के ढेर सी ढही हुई,
सैकत ही सैकत दूर तक कोई गीलापन नहीं,
होंठ की कोर में सुलगते दुःखों के असंख्य स्वर।

विधि कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

पिक कहुकिनी वो, पर भूल चुकी थी गाना वो,
सूख चुके थे मन के कानन वन उसके,
अंतर की ध्रुवगंगा सुखी मधुऋतु के इंतजार में,
चेतनतत्व की आसमा से गुजर रहा निर्जल पयोधर।

नियति कैसी! धूप मे तड़पती रही उस जिन्दगी के स्वर!

मनसिज सा मन

मन गुम सुम मृसा जग के कांतार में,
सघन बड़ी ये कांतार कानन जीवन की,
कहुकिनी मन की हुई अब चुप चुप सी,
तकती मुकुर पुलोजमा इस जीवन के प्रांगण में।

धुंधलाई लोचन इस दीप्ति मरीचि मे,
स्वातिभक्त सा मन तकता रहता नभ में,
चाहत उस पियूष का सोम रस जीवन में,
आरसी देखती रहती इन्द्रबधु मन के आंगण में।

मनसिज सा मन मन्मथ अनंता जग में,
परमधाम अपवर्ग ढूढ़ता रहता जीवन में,
विवश प्राण प्रारब्ध नियति विधि भँवर में,
इन्द्रव्रज चपला दामिनी का भय मन प्रांगण में।

रज रेणुका यादों की

रज रेणुका असंख्य तेरी यादों के,
दैवात बिखर आभूषित इस मन पे,
धुल रही रेणुकाएँ प्रभा तुषार तुहिन में,
भीग रही वल्लिका बेलरी शबनम में।

लघु लतिका सी यादों के ये पल,
लतराई दीर्घ वल्लिकाओं सी इस मन पर,
ज्युँ कुसुमाकर की आहट ग्रीष्म ऋतु पर,
प्रभामय दिव्यांश मेरी प्रत्युष वेला में।

अति कमनीय मंजुल रम्य वो यादें,
तृष्णा पिपास नूतन अभिनव सी,
मौन तोड़ बहती तन मे शोनित रुधिर सी,
द्युति सी ये यादें मोद प्रारब्ध जीवन में।

अलौकिक शुचि वल्लिकाओं सी यादें,
मधुऋतु विटप सी आवरित जीवन में,
आख्यायिका कहती ये तेरी गठबंधन के,
कान्ति प्रतिकृति यादों की बिंबित मन में ।

Wednesday, 16 March 2016

उम्र के किस कगार पर जिन्दगी

आहिस्ता आहिस्ता उम्र की किस कगार पर,
खीच लायी है मुझको ये जिन्दगी!

यौवन का शिला बर्फ सा गल गया,
चाहतों का पंछी तोड़ पिंजड़ा उड़ गया,
आशाओं का दीपक बिन तेल बुझ रहा,
जिन्दगी के किस मुकाम पर आज मैं आ गया।

आहिस्ता आहिस्ता पिघलता रहा ये आसमाँ,
बूँदों सी बरसती रही ये जिन्दगी।

जोश पहले सी अब रही नहीं,
उमंग दिलों में अब कहीं दिखती नहीं,
उन्माद मन की कहीं गुम सी गई,
कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल मे ही दब रही ।

आहिस्ता आहिस्ता कट रहा धूँध का ये धुआँ,
राख बन कर सिमट रही ये जिन्दगी।