My Proud: Daughter's Contribution

http://meghna-sinhaaaa.github.io

Thursday, 24 December 2015

ओस के बूंदों की प्रीत

आखिर प्रीत जो ठहरी ...बूंदों से!!
इन ओस की
अल्प बूंदों से भी,
बुझ सकती है मेरी प्यास,
जरा ठहरो तो सही।

पर वो तो ओस हैं,
वो भी एक बूंद,
क्षणिक हैं इनका जीवन,
क्या बुझा पाएगी ये प्यास?
सम्पूर्ण धरा है इसकी प्यासी।

ओस की अल्प बूँद,
तुम्हारा लक्ष्य महान,
अपना हश्र जानते हुए भी
बिछ जाती हो हर रात
धरा के 
कण-कण पर,
इसकी प्यास बुझाने,
आखिर प्रीत जो ठहरी ...!!
Post a Comment

"जीवन कलश" जीवन के कुछ लम्हे

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ..... जाने.... कितने ही पलों का... उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ.... तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध...

विगत 30 दिनों की सर्वाधिक चर्चित रचनाएँ