Friday, 1 April 2016

स्वार्थ का स्नेह

स्वार्थ सिद्ध कर पुकार अनसुनी वो करते रहे,
पुकारता रहा फिर मैं, पर आवाज सुन भी न वो सके!

जान कर भी अंजान से बने रहे वो,
परवाह स्नेह की तनिक भी कर न सके वो,
बेपरवाह अल्हर मगरूर से बड़े वो,
कत्ल की फितरत उनकी, धोखे से बने वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

हर वक्त भूले भूले से लगते रहे वो,
हर कदम अंजान बनने की कोशिश में वो,
स्वार्थ की सीमा से अधिक स्वार्थी वो,
खोट नियत में उनकी, स्नेह का पर्दा किए वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

असंख्य झूठ के ढ़ेर पर चढ़ते रहे वो,
कई बार झूठ ही अबतक सबसे कहते रहे वो,
फरेब की चाल नित नए चलते रहे वो,
झूठ नियत में उनकी, सच का झंडा लिए वो।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज सुन भी न सके वो!

एतबार बातों पे उनकी हम करते ही रहे,
दौड़ गली के उनकी लगाते हम रहे,
मतलबों के वक्त साथ वो मेरे चलते रहे,
मतलब निकल गई तो अंजान से वो हो लिए।

पुकारता रहा मैं, पर आवाज अनसुनी वो करते रहे!

Thursday, 31 March 2016

वो ठहरा हुआ पल

वो पल अब तलक ठहरा हुआ है यहीं,
मुद्दतों से दरमियाँ ये दूरियाें के रुके हैं वहीं,
खोया है मन उस पल के दायरों में वहीं कहीं!

अपना सा एक शक्ल लगा था इस उम्र में कहीं,
सपनों मे मिलता था वो हमसे कभी-कभी,
हकीकत न बन सका सपनों का वो शक्ल कभी।

एहसास एक पल को कुछ ऐसा हुआ,
हकीकत बन के वो शक्ल सामने खड़ा मिला,
हतप्रभ सा खड़ा बस उसे मैं देखता ही रह गया।

कुछ पल को दूरियों के महल वो गिर गए,
मासूमियत पर उस शक्ल की हम फिर से मर गए,
टूटे भ्रम के महल, जब शक्ल अंजान वो लगने लगे।

वो पल अब फिर से ठहर गया है वहीं,
दरमियाँ ये दूरियाें के मुद्दतों के अब फिर हैं वहीं,
फिर से खोया है मन उस पल के दायरों में ही कहीं!

ऐ मन तू चल कहीं

ऐ मन तू चल अब उस गाँव,
मनबसिया मोरा रहता जिस ठाँव!

निर्दयी सुधि लेता नहीं मेरी वो,
बस अपनी धुन में खोया रहता वो!

निस दिन तरपत ये काया गले,
ऐ मन तू चल अब बैरी से मिल ले!

विधि कुछ हो तो दीजो बताए,
हिय उस निष्ठुर के प्रेम दीजो जगाए!

क्या करना धन जब मन है सूना,
आ जाए वो वापस अब इस अंगना!

ऐ मन तू जा सुधि उनकी ले आ,
पूछ लेना उनसे उस मन में मैं हूँ क्या ?

साँवरे तुम बिसर गए क्युँ मुझको,
विह्वल नैन मेरे अब ढ़ूंढ़ रहे हैं तुझको!

ऐ मन तू ले चल कहीं उन राहों पर,
मनबसिया मेरा निकला था जिन राहों पर ।

चीख निकल आई दर्द की

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

लम्बी श्रृंखला दर्द के मणिकाओं सी,
एक के बाद एक दर्द एक नई सी,
सदियों से चुभन रोज एक नए दर्द की,
खीज चुका मैं देख तमाशा दर्द की,
तोड़ डाला है घर मैने दर्द के उन गाँवो की!

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

अब अंजाना सा है हर दर्द मुझसे,
दंश दर्द का होता क्या समझा है दर्द नें,
तिरस्कार जी भरकर झेला है दर्द नें,
दर्द की झोली में रख डाले हजार दर्द मैंनें,
अवहेलना की है मैने दर्द के उच्च-आदेशों की!

दर्द को दर्द हुआ तब चीख निकल आई दर्द की!

क्या लोग कहेंगे

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

झूठी गिरह मन की बंधन के,
बेवजह संकोच लिए फिरता हूँ मन में,
अनिर्णय की स्थिति है, असमंजस में बैठा हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

घुट चुकी है दम प्रतिभाओं की,
खुद को पूर्णतः कहाँ खोल सका हूँ,
पूर्णविराम लगी है, कपाल बंद किए सोया हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

सपने असंख्य पल रहे इस मन में,
शायद कवि महान बन जाता जीवन में,
शब्द घुमड़ रहे है पर, लेखनी बंद किए बैठा हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

ग्यान का कोष मानस में,
अभिव्यक्ति मूक किए बस सुनता हूँ,
विवेचना की शक्ति है, पर दंभ लिए फिरता हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

चाहत खुशियों की पल के जीवन में,
खुशियों की लम्हों में कुछ कहने से डरता हूँ,
जिन्दा हूँ लेकिन, जीवन की लम्हों को यूँ खोता हूँ,

क्या लोग कहेंगे? यही सोचकर चुप रहता हूँ ?

एक मधुर कहानी का अन्त

क्या मधुर कहानी का अन्त ऐसा हीे होता है जग में?

नजदीकियाँ हद से भी ज्यादा दोनों में,
बेपनाह विश्वास पलता धा उनके हृदय में,
सीमा मर्यादाओं की लांघी थी दोनों नें,
टीस विरह की रह रह कर उठते थे मन में,
फिर भी बिछड़े-बिछड़े से थे दोनों ही जीवन में!

क्या ऐसी कहानी का अन्त ऐसा हीे होना है जग में?

आतुरता मिलने की पलती दोनो के मन में,
सपनों की नगरी ही पलती थी मन में,
विवश ज्वाला सी उठती थी रह रह कर तन में,
सुख मिलन के क्षणिक दोनों ही के जीवन में,
विरह की अगन धू-धू कर जलती फिर भी मन में!

क्या प्रेम कहानी का अन्त ऐसा हीे होना है जग में?

क्युँ मिल नहीं पाते दो प्रेमी हृदय इस जग में?
रंग प्रेम के क्यों सूखे हैं उनके जीवन में?
विरानियाँ मन के क्या लाएंगे कलरव खुशियों के?
सूखे पेड़ क्या फल पाएंगे जग के आँगन में?
गर्म हवाएँ लू सी चलती अब उनके मृदुल सीने में!

क्या प्रेमी हृदय ऐसे ही जलते हैं जग के प्रांगण में?

विष के घूँट पी रहे अब दोनो ही जीवन के,
चुभन शूल सी सहते पल पल विरह के,
कलकल सरिता से नीर बहते उनकी नैनों से,
कंपन भूचाल सी रह रह कर उठते हृदय में,
पलकें पथराईं सी आँचल भीगे भीगे अब जीवन में!

क्या मधुर कहानी का अन्त ऐसा हीे होता है जीवन में?

Wednesday, 30 March 2016

बेजुबाँ हृदय

मूक हृदय की पीड़ा कभी कह नही पाए वो लब!

सुलगती रही आग सी हृदय के अंतस्थ,
तड़पती रही आस वो हृदय के अंतस्थ,
झुलसती रही उस ताप से हृदय के अंतस्थ,
दबी रही बात वो हृदय के अंतस्थ!

बेजुबाँ हृदय की भाषा कब समझ सके हैं सब!

धड़कनों की जुबाँ कहता रहा मूक हृदय सदा,
भाव धड़कनों की लब तक न वो ला सका,
पीड़ा उस हृदय की नैनों ने लेकिन सुन लिया,
बह चली धार नीर की उन नैनों से तब!

मूक हृदय की पीड़ा कभी कह नही पाए वो लब!