Wednesday, 24 February 2016

खोह ये अजीब सी

चले जा रहे हैं हम, न जाने किस खोह में,
बढी़ जा रही जिन्दगी, न जाने किस खोज में,
है ये यात्रा अनंत सी, न जाने किस ओर में।

मंजिलो की खबर नहीं, न रास्तों का पता,
ये कौन सी मुकाम पर, जिन्दगी है क्या पता,
यात्री सभी अंजान से, न दोस्तों का है पता।

खोह ये अजीब सी, रास्ते कठिन दुर्गम यहाँ,
चल रहें हैं सब मगर, इक बोझ लिए सर पे यहाँ,
पाँव जले छाले पड़े, पर रुकती नही ये कारवाँ।

एक पल जो साथ थे, साथ हैं वो अब कहाँ,
एक एक कर दोस्तों का, अब साथ छूटता यहाँ,
सांसों की डोर खींचता, न जाने कौन कब कहाँ।

दिशा है ये कौन सी, जाना हमें किस दिशा,
भविष्य की खबर नहीं, गंतव्य का नहीं पता,
असंख्य प्रश्न है मगर, जवाब का नहीं पता।

कण मात्र है तू व्योम का, इतने न तू सवाल कर,
तू राह पकड़ एक चल, उस शक्ति पे तू विश्वास कर,
हम सब फसे इस खोह में, चलना हमें इसी डगर।

मुक्ति मिलेगी खोह से, तू चलता रहा अगर,
ईशारे उस पराशक्ति के, तू समझता रहा अगर,
खिलौने उस हाथ के, जाना है टूट के बिखर।

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