Sunday, 21 February 2016

इक लम्हा मधुर चाँदनी

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

फलक पे मुखरित चाँद ने, डाला है फिर से डेरा,
चलो आज तुम भी वहाँ, हम कर लें वहीं बसेरा,
गुजर रही है दिल की कश्ती उस चाँद के पास से,
तुम आज बैठी हों क्युँ, यहाँ बोझिल उदास सी।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

फलक निखर मुखर हुई, चाँद की चाँदनी के संग,
 कह रही है ये क्या सुनो, आओ जरा तुम मेरे संग,
निखर जाए थोड़ी चांदनी भी नूर में आपके सनम,
इक लम्हा मधुर चाँदनी, तेरे मुखरे पे निहारूँ सनम।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

प्रखर चाँदनी सी तुम छाई हो दिल की आकाश पे,
मन हुआ आज बाबरा, छूना चाहे तुझको पास से,
दिल की कश्ती भँवर में तैरती सपनों की आस से,
तुम चाँद सम फलक पे छा जाओ मीठी प्रकाश से।

अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ सनम।

1 comment:

  1. अरमान यही, इक लम्हा चाँदनी तेरे मुखरे पे देखूँ स नम।
    बहुत सुंदर

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