Thursday, 15 January 2026

शून्य ही बुनता रहा

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

पलकें जम सी गईं, वक्त थम सी गईं,
अपलक, निहारता,
मैं, कोमल सी, उनकी सुष्मिता,
खूबसूरत, हर अदा,
अबोले, हर शब्द उनके, मैं चुनता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

मैं खोया कहीं, इक पवन छू कर गई,
कुछ कह कर गई,
उन डालियों पर, झूलती लता,
पंछियों की, सदा,
अनबुझ से वो इशारे, मैं देखता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

समझ से परे, उनकी कंपित धड़कनें,
कैसे हर पल गिनें, 
टेढ़े, पगडंडियों सा वो रास्ता,
है कैसा, वास्ता?
अनगिन उलझनें, मैं सुलझाता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

वो कुनकुनी सी धूप, दुल्हन सी रूप,
मोहक, हर स्वरूप,
मुख पे फैली, इक सुष्मिता,
रोकती थी रास्ता,
विलग इक राह पर, मैं चलता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

संग, अपने ही कहीं, मैं खुद भी नहीं,
यूं, खोया मैं कहीं!
तोड़ कर, इस जग से वास्ता,
छोड़ कर, रास्ता,
खुद अपना ही पता, मैं ढूंढता ही रहा!

उनको ही, सुनता रहा,
उन वादियों में बैठा, मैं शून्य ही बुनता रहा....

Saturday, 10 January 2026

ख्वाहिशों के पर

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!
मगर, वही अक्सर, राह में, रहगुजर, होते हैं।

जिंदा हो, तो ख्वाहिशें भी हैं,
इन सांसों के संग, चंद रंजिशें भी हैं,
जिद, और, कोशिशें भी है,
बिन कहां इनके, मंजिलों के, सफर होते है!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

पा जाते अगर, उड़ भी जाते,
ख्वाहिशों को, और, नजदीक लाते,
अनथक, कोशिशें मिन्नतें,
मगर, हसरतें, ख्वाहिशों के, बेखबर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

हसरतें, गर, एक हो तो कहें,
अनगिनत, इन, ख्वाहिशों के मेले,
और, यहां, हम अकेले,
अड़े जिद पे ख्वाहिश, बड़े बेसबर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!

चल रहा, कब से, ये कारवां,
दिन-ब-दिन, ये और हो रही जवां,
चाहे, चूम लूं आसमां,
संग उनके ही साए, राह के रहगुजर होते हैं!

ख्वाहिशों के, तो, पर होते है!
मगर, वही अक्सर, राह में, रहगुजर, होते हैं।

Sunday, 4 January 2026

फलक

हो नजरों में, पर कितने अंजान, अब तलक,
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

जी चाहे, छू लूं इन हाथों से,
उन रंगों को, उन पंखों को, उन अंगों को,
हटा दूं, बादलों के वो पर्दे,
तोड़ दूं, हदें,
जगती, कैसी ये ललक!

लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

शायद, बस, दो कदम और,
चलता जाऊं अनथक, पाने को वो ठौर,
उसी, अनजाने की ओर,
उनकी, बातें,
अक्सर, इन होठों तक!

लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

हलक में, बाकी प्यास यही,
बादलें ले आती, अक्सर, बरसात वही,
झांकता, गगन की ओर,
रोककर सांसें,
शायद, दे वो दस्तक!

लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

कल हो, विहान इक ऐसा,
झाकें नैनों में फलक, मिट जाए ललक,
दामन में, सिमटे सपने,
प्रशस्त हो राहें,
ज़मीं से आसमां तक!

हो नजरों में, पर कितने अंजान, अब तलक,
लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

Thursday, 1 January 2026

नववर्ष, कोटि-कोटि अभिनंदन!

2026, आपका अभिनंदन......

हूक भर रहा, मन में, हर आनेवाला क्षण,
उम्मीदों, आशाओं से, जागा यह मन,
अभिलाषाओं,  इच्छाओं से लबालब ये आंगन,
उत्कंठाओं का, नव-स्पंदन,
नववर्ष, तेरा कोटि-कोटि अभिनंदन!

2026, आपका अभिनंदन......

कल्पनाओं का, उफन रहा, इक सागर,
लहरों की धुन पर, झूमता ये गागर,
हर आहट, हर कंपन, अनगिनत से ये स्पंदन,
आह्लाद लिए प्रतीक्षित क्षण,
नववर्ष, तेरा कोटि-कोटि अभिनंदन!

2026, आपका अभिनंदन......

जागेंगे सोए प्राण, जागेंगे सोए अरमान,
सूरज संग, पूरब से जागेंगे विहान,
चूमेंगी किरणें, कलियों के चेहरे खिल आयेंगे,
भर जाएंगे सबके दामन,
नववर्ष, तेरा कोटि-कोटि अभिनंदन!

2026, आपका अभिनंदन......

Wednesday, 31 December 2025

अलविदा 2025

अलविदा 2025,
इतिहास, बन जाओगे, कल तुम भी, 
सिमट जाओगे, उन पन्नों में,
फिर, समीक्षाओं में ही, नजर आओगे!

कितने ही सपनों के, संग जिए तुम,
असंख्य नैनों में, दिखे तुम,
कभी चूमे, सफलताओं के शिखर,
कभी, विफलताओं से गुजरे,
कभी, सुखद एहसासों के आंगन,
कभी, दुखद पलों ने सींचे दामन,
देकर, ऐसे कितने ही क्षण,
आज, गुज़र जाओगे,
सिमट जाओगे, उन नैनों में,
अंकित, उन तस्वीरों में उभर आओगे!

अलविदा 2025,
कल, तुम भी, इतिहास बन जाओगे....

अंत, अवश्यंभावी, हर पल प्रभावी,
क्षण वही, आज पुनः हावी,
इस मानस में, अंकित हो जाओगे,
पुनः, यादों में, उभर आओगे,
शुक्रिया, पल जितने भी दिए तूने,
कल जितने भी, संग जिए हमने,
वो हर क्षण, स्वीकार हमें,
हर पल अंगीकार,
आत्मसात रहोगे, मानस में,
शायद, विवेचनाओं में, उभर आओगे!

अलविदा 2025,
इतिहास, बन जाओगे, कल तुम भी,
सिमट जाओगे, उन पन्नों में,
फिर, समीक्षाओं में ही, नजर आओगे!

Sunday, 28 December 2025

असहज वर्ष

शायद, न होगा दुखों का अंत, इस बसंत!

यूं, दर्द-ए-दस्तान, हो गई है मुकम्मिल,
सितम उन पतझड़ों के, इस कदर हैं शामिल,
बे-असर रह गए, मौसमों के मरहम,
सिल चुके, ये, दो होंठ प्यासे,
कुछ, यूं, टूटा है मन!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

कह कर गुजर गई, इस वर्ष ये पवन,
अबकी खिल न पाएंगे, इन शाखों पर चमन,
खेले हैं पतझड़ों ने, कुछ खेल ऐसे,
सूखे है डाल, बिखरे हैं पात,
टूटा, ये, अंतःकरण!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

बहा ले गई, सब रंग, इक बयार ही,
खबर ही न थी, वक्त लूटेगा माँ का प्यार भी,
दे पाएगी क्या, बसंत की ये बयार,
छेड़ेगी, बस, व्यथा के तार,
और, दुखाएगी मन!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

वर्ष के कगार, टूटा इक और तार,
लूटा वक्त ने, असमय, प्रिय अनुज का प्यार,
मंद-मंद थी चली, कैसी ये बयार,
असहज से हुए ये मौसम,
दुखी, ये अंतःकरण!

शायद, न होगा दुखों का अंत, इस बसंत!

Thursday, 18 December 2025

दुश्वार ये क्षण मुक्कू

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

वक्त, ज्यूँ गया है थम,
संग जो बीते, यूं तो, वो वक्त थे कम, 
तेरे अकस्मात, जाने का ग़म,
गुजरा हो जैसे, क्षण में इक जीवन,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

यूं, क्षणिक ये दुनियां,
सुना था, क्षण में गिरती हैं बिजलियां,
क्षण में, उजड़ती हैं बस्तियां, 
यूं संग, अब मेरे ही, खेल गई क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

विछोह, यही असह्य,
यूं बिखर गई, अपनी जगह से हर शै,
मुक्कू, तुम क्यूं बिछड़ गए,
क्यूं पड़ गए, कम जिंदगी के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

स्नेह भरा, मुख तेरा,
याद बहुत आयेगा, स्नेहिल सा चेहरा,
संग तुम्हारे, जो पल गुजरा,
छोड़ गए पीछे, कुछ यादों के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

Sunday, 14 December 2025

पूर्वज

वो, आसमां पे रब हुए.....

करुण स्वर, जिनके, कर जाते थे सहज,
पूर्वज मेरे, जिनके, हम हैं वंशज,
वो, आसमां पे रब हुए, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

देकर आशीर्वचन, चल पड़े वो इक डगर,
दिया जन्म जिसने, अब वो ही नहीं इस घर,
तस्वीर, उनकी, बस रह गयी, इस नजर,
गूंजते, अब भी उनके मधुर स्वर,
ओझल नैन से वो, पर, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

मन की क्षितिज पर, रमते अब भी वही,
छलक उठते, ये नयन, जब भी बढ़ती नमी,
यूं तो, घेरे लोग कितने, पर है इक कमी,
संग, उनकी दुवाओं का, असर,
वो हैं, इक नूर शब के, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

उनके एहसान का, चुकाऊं उधार कैसे,
दी जो विरासत, उनका, रख लूं मान कैसे,
यूं ही होने दूं, पूर्वजों का अपमान कैसे,
ये कर्ज, हम पर, युग-युगांतर,
सर्वथा, इस ऋण से उबार कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

उन पूर्वजों को, हम, करते नित नमन,
तस्वीर वो ही, बसती मेरे मन,
वो, आसमां पे रब हुए, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

Sunday, 7 December 2025

धुंधली लकीरें

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
फिर उभर आई, वही भूली सी तस्वीरें!

अधर उनके, फिर, छंद कई लिखती गई,
यूं कहीं, अधख़िली सी, चंद कली खिलती गई,
सिमट आए, ख्वाब सारे, बंद पलकों तले,
उभरती रहीं, नींद में, तैरती लकीरें!

शक्ल वो ही पहचानी, लेती रही आकार,
यूं, बंद पलकों तले, धुंधले से, स्वप्न थे साकार,
फिर, धागे वो ही, मोह के स्वतः बंध चले,
ले चली किधर, उभरती वो तस्वीरें!

घिरा अंकपाश में, न कोई आस-पास में,
जड़वत देखता रहा, मैं उनको ही अंकपाश में,
गुजारी पल में सदियां, उस छांव के तले,
बहला गई, नींद में, उभरती लकीरें!

टूटा वो दिवास्वप्न, टूटे सब वो झूठे भ्रम,
ढ़ाए थे नींद ने, दिल पे, बरबस, सैकड़ों सितम,
ख्वाब सारे, बिखर गए, इन पलकों तले,
उभर कर, बिखर गई, तैरती लकीरें!

शुक्रिया करम, नींद के ओ मीठे से भ्रम, 
वहम ही सही, पल भर, जीवन्त कर गए तुम,
ग़म से कोसों दूर, हम कहीं, संग थे चले, 
छल गई भले, धुंधली सी वो लकीरें!

खुली आंख, बहती स्वप्न की नदी कहां!
ग़म से बोझिल पल बिना, बीतती सदी कहां!
पड़ जाती यहां, दिन में, छाले पावों तले,
गर्म सी रेत पर, बनती कहां लकीरें! 

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
उभर आई फिर, वही भूली सी तस्वीरें!

Friday, 28 November 2025

बिछड़ी पात

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

प्रलय ले आई, छम-छम करती बूंदें,
गीत, कर उठे थे नाद,
डाली से, अधूरी थी हर संवाद,
बस, बह चली वो पात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

मौसम ने दी थी, फीकी सी सौगात,
ठंड पड़े, सारे जज्बात,
छूटी पीछे, रिश्तों की गर्माहट,
करती भी क्या, वो पात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

हंसते वो मौसम, ले आए कैसे ग़म,
सर्वथा, खाली थे दामन,
यूं सर्वदा के लिए, टूटा था मन,
बेरंग, कर गई बरसात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

यूं हंसी किसी की, बन जाए अट्टहास,
आस ही, कर दे निराश,
सर्वथा, अपना भी ना हो पास,
पल दिन के, लगे रात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

मौसम तो भर ही जाएंगे, डाली के ग़म,
वृष्टि ही, लगाएगी मरहम,
समाहित, कर जाएगी हर ग़म
इसी सृष्टि में, हर बात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

दास्तां, इक पल की, बन चला पात,
रहा, भीतर एक उन्माद,
इक सफर अधूरी, डाली से दूरी,
पिघलती, इक जज़्बात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

Tuesday, 25 November 2025

32 वर्ष

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

वर्षों, सम्मोहित करते रहे, तेरे बुने सरसों,
प्रफुल्लित करते रहे, मुझे, उन फूलों सा स्पर्श, 
आकर्षित करते रहे, सरसों सा फर्श,
यूं, कटे संग-संग 32 वर्ष,
ज्यूं, संग चले, तुम कल परसों!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

कुछ है कारण, बादल बन आए ये सावन,
रंगों का सम्मोहन, भीगे मौसम के आकर्षण,
खिलते, अगहन में पीले-पीले सरसों,
भीगे, फागुन की आहट,
चाहत के, ये अनगिन रंग वर्षों!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

यूं इन रेखाओं में, मुकम्मल सी तुम हो,
जितना पाया, शायद, अब तक वो कम हो!
शेष बचा जो, वो हर पल हो विशेष,
चल, बुनें फिर से सरसों, 
संग, उसी राह, चले फिर वर्षो!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....


Celebrating 32nd years of togetherness at Chennai on 24.11.2025

Wednesday, 19 November 2025

ऊंघते पल

ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल....

मूंद रहा मैं पलकें, नैनों में सागर सा छलके,
शिथिल पड़ा तन, पर मन क्यूं बहके,
भटकाए उन राहों पर, पल-पल रह-रह के,
नींद, करे अपनी ही बात,
उलझन सा हर पल!

ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल....

अनहद सपनों के पार, जहां, डूबा हो हर शै,
शायद छंट जाए, उन लम्हों में संशय,
इस जीवन को मिल जाए, जीने का आशय,
यहां, अधूरी सी हर बात,
अनबुझ सा हर पल!

ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल....

मुमकिन है, खिल जाए कुम्हलाई ये कलियां,
उन राहों मिल जाएं, उनकी भी गालियां,
शायद हो जाए, उनसे, चंद मिश्री सी बतियां,
यहां, फीकी सी हर बात,
व्याकुल सा हर पल!

ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल....

Monday, 20 October 2025

रौशनी

अंधेरी हैं गलियां, इक दीप तो जलाओ,
यूं गगन पर, टिमटिमाते ओ सितारे, 
जरा, रौशनी ले आओ!

प्रदीप्त हो जलो, बस यूं न टिमटिमाओ,
अवरोध ढ़ले, किरण चहुं ओर जले,
जरा, बांहे तो फैलाओ! 

तू करे इंतजार क्यूं, और कोई बात क्यूं,
डर के यूं, क्यूं जले, चुप, यूं क्यूं रहे,
बस यूं ना टिमटिमाओ!

न होते तुम अगर, ना जगती उम्मीद ये,
रहता जहां पड़ा, यूं ही अंधकार में,
विश्वास, यूं भर जाओ!

विलख रहा जो मन, तू उनको आस दो,
मन के अंधकार को, यूं प्रकाश दो,
इक विहान, बन आओ!

पुकारती हैं राहें, इक दीप तो जलाओ,
यूं गगन के, टिमटिमाते से सितारे, 
जरा, रौशनी ले आओ!

Sunday, 19 October 2025

राह दिखाए रब

आश लिए कितने, गिनता अपनी ही आहें,
घिरा किन विरोधाभासों में, जाने मन क्या चाहे,
कभी उमड़ते, जज्बातों के बादल,
कभी, सूना सा आंचल!

बंधकर, कितनी बातों में, बंधती है आशा,
पलकर, कितनी आशों में, टूटी कितनी आशा,
कभी बुझ जाती, हर इक प्यास,
कभी, रह जाता प्यासा!

उस पल रह जाता, बस इक विरोधाभास,
उसी इक पल, जग जाता, जाने कैसा विश्वास,
कभी, दुविधाओं भरा वो आंगन,
कभी, पुलक आलिंगन!

उम्मीदें ले आती, आवारा मंडराते बादल,
दिलासा दे जाते, सहलाते हवाओं के आंचल,
क्षण भर को, जग उठती उम्मीदें,
फिर, छूटी, सारी उम्मीदें!

बंधा जीवन, मध्य इन्हीं विरोधाभासों में,
कटता हर क्षण, यूं उपलाते इन एहसासों में,
अकस्मात, कोरे पन्नों से जज्बात,
कह उठते, मन की बात!

दोनों ही तीर, उमड़े, जज्बातों के भीड़,
कभी छलक उठते ये पैमाने, बह उठते नीर,
ढ़ाढस, इस मन को, कौन दे अब,
राह दिखाए, वो ही रब!

Wednesday, 1 October 2025

अनुरूप

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं, 
और, गीत वही दोहराऊं!

इक मैं ही हूं, जब तेरी हर आशाओं में,
मूरत मेरी ही सजती, जब, तेरे मन की गांवों में,
भिन्न भला, तुझसे कैसे रह पाऊं,
क्यूं और कहीं, ठाव बसाऊं!

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं...

सपने, जो तुम बुनती हो मुझको लेकर,
रंग नए नित भरती हो, इस मन की चौखट पर,
हृदय, उस धड़कन की बन जाऊं,
कहीं दूर भला, कैसे रह पाऊं!

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं...

बहती, छल-छल, तेरे नैनों की, सरिता,
गढ़ती, पल-पल, छलकी सी अनबुझ कविता,
यूं कल-कल, सरिता में बह जाऊं,
कविता, नित वो ही दोहराऊं!

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं...

मुझ बिन, अधूरी सी, है तेरी हर बात, 
अधूरी सी, हर तस्वीर, अधूरे, तेरे हर जज्बात,
संग कहीं, जज्बातों में, बह जाऊं,
संग उन तस्वीरों में ढल जाऊं!

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं...
और, गीत वही दोहराऊं!

Thursday, 25 September 2025

व्यतीत

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

व्यतीत, हुआ जाता हूं, पल-पल,
अतीत, हुआ जाता हूं,
फलक पर, उगता था, तारों सा रातों में,
कल तक था, सबकी आंखों में,
अब, प्रतीत हुआ जाता हूं! 

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

कल, ये परछाईं भी संग छोड़ेगी,
हर पहलू मुंह मोड़ेगी,
सायों सा संग था, खनकता वो कल था,
सर्दीली राहों में, वो संबल था,
अब, प्रशीत हुआ जाता हूं!

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

जाते लम्हे, फिर लौट ना आयेंगे,
कैसे अतीत लौटाएंगे,
लम्हे जो जीवंत थे, लगते वो अनन्त थे,
अंत वहीं, वो उस पल का था,
इक गीत सा ढ़ला जाता हूं!

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

छिन जाएंगे, शेष बचे ये पहचान,
होगी शक्ल ये अंजान,
आ घेरेंगी शिकन, शख्त हो चलेंगे पहरे,
कल तक, धड़कन में कंपन था,
अब, प्रतीक बना जाता हूं!

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

क्षण, ज्यूं क्षणभंगुर, हुआ व्यतीत,
क्षण यूं ही बना अतीत,
फलक पर, वो तारा ही कल ओझल हो,
ये आंखें सबकी भी बोझिल हों,
यूंही, प्रतीत हुआ जाता हूं! 

अतीत बन, ढ़ला जाता हूं....

Sunday, 21 September 2025

अचानक

न रोकिए, अचानक ही होने दीजिए!

धुआं, खुद ही छट जाएगा,
हट जायेगा, धुंध, 
रख कर, खुद को अलग,
इस आग को, होने दीजिए, स्वतः सुलग,
फूटेगी इक रोशनी,
अचानक ही, सब होगा स्पष्ट...

न रोकिए, अचानक ही होने दीजिए! 

स्वतः, जम जाते हैं कोहरे,
कोहरों का क्या?
उमड़ते रहते हैं ये बादल,
बूंदें स्वतः ही संघनित होती है हवाओं में,
सुलगेगी जब आग,
अचानक ही, सब होगा स्पष्ट...

न रोकिए, अचानक ही होने दीजिए! 

धुंधली ना हो जाए यकीन, 
जरा दो भींगने,
विश्वास की सूखी जमीं,
बरसने दो बादलों को, हट जाने दो नमीं,
उभरने दो आकाश,
अचानक ही, सब होगा स्पष्ट...

न रोकिए, अचानक ही होने दीजिए! 

कभी, मन को भी कुरेदिए,
ये परतें उकेरिए,
दबी मिलेंगी, कई चाहतें,
उभर ही उठेंगी, कोमल पलों की आहटें,
बज उठेगा संगीत,
अचानक ही, सब होगा स्पष्ट...

न रोकिए, अचानक ही होने दीजिए! 

Monday, 8 September 2025

चुप जो हुए तुम

चुप जो हो गए, तुम...
खो गए रास्ते, शब्द वो अनकहे हो गए गुम!

रही अधूरी ही, बातें कई,
पलकें खुली, गुजरी न रातें कई,
मन ही रही, मन की कही,
बुनकर, एक खामोशी,
छोड़ गए तुम!

चुप जो हो गए, तुम...
खो गए रास्ते, शब्द वो अनकहे हो गए गुम!

पंछी, करे क्या कलरव!
तन्हा, उन शब्दों को कौन दे रव!
ढ़ले अब, एकाकी ये शब,
चुनकर, रास्ते अलग,
गुम हुए तुम!

चुप जो हो गए, तुम...
खो गए रास्ते, शब्द वो अनकहे हो गए गुम!

शायद, मिल भी जाओ!
हैं जो बातें अधूरी, फिर सुनाओ!
फिर, ये चूड़ियाँ खनकाओ,
यहीं, रख कर जिन्हें,
भूल गए तुम!

चुप जो हो गए, तुम...
खो गए रास्ते, शब्द वो अनकहे हो गए गुम!

Saturday, 6 September 2025

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माननीय पाठकगण,

अब तक 500000 (पांच लाख) से अधिक PAGEVIEW देकर सतत लेखन हेतु प्रेरित करने के लिए कविता "जीवन कलश" के समस्त पाठक-गणों का शुक्रिया व अभिवादन।

कामना है कि जीवन एक यात्रा के समान आपके साथ यूं ही बीतता रहे....
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समस्त Referring साइट्स एवं विश्व भर के पाठकों का अभिवादन।।।।

कोटिशः धन्यवाद, नमन व आभार।

Thursday, 4 September 2025

आत्मश्लाघा

कर, स्मृतियों को, आत्म-साथ, 
मुग्ध होते थे, पल सारे,
कुंठित मन, अब इन विस्मृतियों से हारे,
हुई स्याह, वो, गलियां!

शायद, धूमिल हो रही स्मृतियाँ,
पसर गईं, स्याह परतें,
मुकर गई, स्मृतियों में लिपटी वो गलियां,
बिखर गई, विस्मृतियाँ!

खुल कर, बिखरे, बुने जो धागे,
नैन उनींदें, अब जागे,
बिखरती, आत्मश्लाघा में पिरोई लड़ियां,
पसरती, ये विस्मृतियाँ!

अब उलझाता, मन को, ये द्वंद्व,
बोझिल सा, हर छंद,
उकेर दूं स्याह परतें, उकेरूँ विस्मृतियाँ,
उकेर दूं, विसंगतियां!

शायद, पुनः, मुखर हो स्मृतियाँ,
आत्मश्लाघित दुनियां,
पुनः कर पाऊं, आत्म-साथ उन को ही,
पुनः रौशन हो गलियां!