Monday, 30 March 2026

कल्पना

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!

ऐसा लगता है, जैसे, वो बैठे हैं मुकर कर,
ओढ़े, स्मृतियों की एक चादर,
और, अपनी ही इक परिप्रेक्ष्य, में घिरकर,
दूर हैं वो, जरा, नाराज होकर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

फेहरिस्त, लंबी शिकायतों की, खोलकर,
बोलती है, कुछ भी न बोलकर,
शिकन माथे की, बयां करती हैं, उभरकर,
यकीन, कैसे करूं मैं तुम पर!

कल्पनाओं से, गुजर कर......

मुक्त हुई कब, कल्पनाओं में कैद होकर,
मुक्त, मैं भी विचरती, यूँ अगर,
होती बन कर हकीकत, राह में साथ गर,
निहारती, खुद को संवार कर !

कल्पनाओं से, गुजर कर......

सुनकर, उसकी बातें, हुआ मैं निरुत्तर,
विलीन थे शब्द मेरे, आह पर,
मैंनें, दुःख ही दिए, उनमें यूं रंग भरकर,
दूर वे कितने, मेरे संग होकर!

रिहाई कब मिली, कल्पनाओं को, कैद होकर!
सोचता हूं, जब भी आता हूँ मैं कभी,
कल्पनाओं से, गुजर कर!

12 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति सर।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ३१ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. भावपूर्ण सृजन

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  3. कल्पनाएं ही हमें चाँद - मंगल तक की सैर करवा चुकी हैं, कल्पनाएं ही कई दफा वेदनाओं को भी जन्म देती हैं। कल्पनाएं पल में मिलन भी कराती हैं .. शायद ...

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    1. सच कहा आपने। सृजनशीलता, कल्पनाओं को कुरेदने के बाद ही उत्पन्न होती है।

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