Showing posts with label हैरान. Show all posts
Showing posts with label हैरान. Show all posts

Sunday, 15 February 2026

खोता सुध

सुध, खोता जाता हूँ....

हैरान कर देते हो, इस बुत को,
यूँ, पल पल, बुनते हो, मुझमें खुद को,
उलझता सा, जाता हूँ,
शर्माता हूँ,
फिर, खुद पर इतराता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

समझ सकूं ना, कैसी ये भाषा!
चंचल उन नैनों की, सांकेतिक परिभाषा,
इंगित, क्या अभिलाषा!
कैसी आशा!
जागृत, खुद में पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

फुर्र हो चले, सुधि के वो क्षण,
हो चले अनियंत्रित, हृदय के ये धड़कन,
अंतः, गहराता इक सावन,
लहराता घन,
बरसता, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

इक बुत ही था, अब जिंदा हूँ,
अंजाने, धड़कन और साँसों में बंधा हूँ,
लिपटा, उनकी ही धागों में,
एहसासों में,
सिमटा, खुद को पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

Sunday, 29 January 2017

पत्थर दिल

न जाने कब पत्थर हुआ, मासूम सा ये दिल मेरा.....

हैरान हूँ मैं, न जाने कहां खोई है मेरी संवेदना?
आहत ये दिल जग की वेदनाओं से अब क्यूँ न होता?
देखकर व्यथा किसी कि अब ये बेजार क्यूँ न रोता?
व्यथित खुद भी कभी अपने दुखों से अब न होता!
बन चुका है ये दिल, अब पत्थर का शायद!
न तो रोता ही है ये अब, न ही ये है अब धड़कता!

न जाने कब पत्थर हुआ, मासूम सा ये दिल मेरा.....

हैरान हूँ मै, न जाने कहां खोई दिल की मासूमियत?
महसूस क्यूँ न अब ये उमरते से संवेदनाओं को करता?
मासूम सी अपनी हँसी क्यूँ लबों पे अब न बिखेरता?
दर्द के पल समेटकर क्यूँ चुपचाप खुद ही घुटता?
अपनाकर किसी ने, तोड़ा है ये दिल शायद!
न ही मुस्कुराता है ये अब, न ही अब ये संभलता!

न जाने कब पत्थर हुआ, मासूम सा ये दिल मेरा.....