वो जो, गुजर रहा था लम्हा,
वो जो कुछ भी घटित हो रहा था वहां,
वही कह गया, ये इक दास्तां,
क्या मुझसे था वास्ता?
वो जो, गंध-विहीन हो रही थी उपवन,
वहीं, शून्य को ताकते नयन,
क्या था, ये कथन?
शायद, सब हो रहे थे तन्हा,
ले चला था सब, वो जाता सा लम्हा,
उकेर कर, वो कदमों के निशाँ,
कुछ रख गया वहां?
वो जो, कहीं मोड़ ले रुख,
वो जो, बता जाए, क्या था वो रुत?
बने हैं कैसे, इतने सारे बुत!
कैसा था, वो दुःख?
वो जो, दे दे कोई विवरण,
वो जो, छूकर, यूँ गुजर जाए पवन,
समझ पाए, ये गमगीन मन,
क्या कुछ था कारण?
वो जो, गुजर रहा ये लम्हा,
वो जो, पुनः घटित हो रहा ये यहां,
उकेरेगी मन पर कोई निशाँ,
कल वे, बनेंगी दास्तां!

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 26 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय दिग्विजय जी
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय जोशी ji
Deleteबहुत सुन्दर सृजन ।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया सुधा देवरानी जी
Deleteअच्छी और सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय खरे जी
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