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Tuesday, 17 March 2026

प्रकृति से दूर

कल-कल, निश्छल, सी ये नदियाँ,
छल-छल, अविरल, बहती जाती सदियाँ,
निरंतर, इक प्रवाह यहाँ,
पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!

आंखें मींचें, रह जाता हूँ, खोया सा,
मध्य कहीं, व्यस्तताओं में, बीतता है दिन,
सांझ ढले, व्याप जाती ये रात!

मुलूर- मुलूर, सुबहो, झांकती हमें,
कुछ उदास सी, ताकती शाम की किरणें,
खामोशी में, सुला देती ये रात!

वो प्रस्फुटन, फिर, ले आती घुटन,
अनुत्तरित ही, रह जाते, उनके सारे प्रश्न,
संवादविहीन, कट जाती रात!

खत्म कहां, प्रश्नों का, सिलसिला,
इक मैं ही, प्रथम किरणों से, ना मिला,
प्रश्नोत्तर, भुला जाती ये रात!

कितनी पास, रही मेरे, ये प्रकृति,
मुझको छूकर, गुजरती रही, संस्रीति,
असंवेदन, बनाती रही रात!

पल-पल, इक, हलचल सी यहाँ,
हर-पल, हो विकल, बुलाती रही सदियाँ,
युग करती इंतजार यहाँ,
पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!